दूर-दराज के आदिवासी गांव: विकास के दीये तले अंधेरा, जहां दीपक जलाना जरूरी है

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सरकार को शहरों के विकास की बात करने वाले नेताओं को दूर-दराज के आदिवासी गांवों में भेजना चाहिए। यह एक आसान लेकिन ज़रूरी रिक्वेस्ट है। आज जब मेट्रोपॉलिटन शहरों में स्मार्ट सिटी, मेट्रो और लग्ज़री प्रोजेक्ट्स की बात होती है, तो गुजरात के डांग, छोटा उदयपुर, दाहोद, वलसाड और तापी जैसे आदिवासी इलाके आज भी अंधेरे में डूबे हुए हैं। इन इलाकों में रहने वाले आदिवासी भाई-बहनों की हालत देखकर विकास के माहौल में सरकार और नेताओं की अंतरात्मा जाग जाएगी। विकास सिर्फ़ शहरों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि जहां अंधेरा है, वहां भी हमें दीया जलाकर विकास की रोशनी फैलानी चाहिए।

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सोचिए एक गांव जो दूर-दराज के जंगल में बसा है। सुबह सूरज उगता है, तो बच्चे चार से पांच किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाते हैं। स्कूल? सिर्फ़ एक टीचर, कोई बेंच, टेबल नहीं, बारिश में छत टपकती है। गुजरात में आदिवासी आबादी 14.8 परसेंट है, यानी करीब 89 लाख लोग, लेकिन डेटा के मुताबिक, उनकी लिटरेसी रेट सिर्फ़ 62.5 परसेंट है, जबकि राज्य का एवरेज 78 परसेंट है। दाहोद और छोटा उदयपुर जैसे ज़िलों में यह अंतर ज़्यादा चिंता की बात है। NFHS-5 के मुताबिक, आदिवासी बच्चों में स्टंटिंग 40.9 परसेंट, अंडरवेट 39.5 परसेंट और वेस्टिंग 23.2 परसेंट है। महिलाओं में एनीमिया 65 परसेंट तक पहुँच जाता है। एक माँ अपने बच्चे को लेकर टूटी टांगों पर अस्पताल पहुँचने के लिए एक लंबी सड़क पार करती है। बिजली? यह आधी रात तक नहीं आती। पानी? सरकार ने हैंडपंप बनवाए थे, लेकिन अगर वे चालू हालत में न हों, तो पास की नदी या कुएँ से पानी लाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। सफ़ाई की सुविधाएँ लगभग अनप्रेडिक्टेबल हैं।

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आदिवासियों की ज़िंदगी जंगल से जुड़ी हुई है। भील, राठवा, कोकना जैसी जनजातियों की संस्कृति बहुत समृद्ध है और वे प्रकृति की रक्षक हैं, लेकिन आज भी फॉरेस्ट राइट्स एक्ट (FRA) का लागू होना अधूरा है। ज़मीन बेची जाती है, डैम और माइनिंग प्रोजेक्ट्स में विस्थापन होता है, पुनर्वास की बातें सिर्फ़ कागज़ों तक ही सीमित रह जाती हैं। आदिवासियों में गरीबी दर 43 प्रतिशत है जबकि आम आबादी में यह 25 प्रतिशत है। युवा काम के लिए शहरों की ओर पलायन करते हैं, संस्कृति नहीं बची है। महिलाएं सुबह-सुबह जंगल से जलाने की लकड़ी और महुदा के फूल लाती हैं, लेकिन जंगल के उत्पादों से होने वाली कमाई बहुत कम है। हेल्थ सेंटर बहुत दूर हैं, मोबाइल मेडिकल यूनिट की कमी है। एक बूढ़ा आदमी कहता है, “हम जंगल के बच्चे हैं लेकिन विकास हमारे बिना होता है।”

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सरकार ने वनबंधु कल्याण योजना, प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान (PM-JANMAN), प्रधानमंत्री आदि आदर्श ग्राम योजना जैसी कई योजनाएं चलाई हैं। सड़क, बिजली, पानी और आंगनवाड़ी केंद्रों के लिए करोड़ों रुपये दिए गए हैं। लेकिन, ज़मीन पर लागू होना अधूरा है। एक टीचर कहता है, “योजना तो आती है लेकिन यहां तक ​​नहीं पहुंचती।” आदिवासी इलाकों में सिर्फ़ एक टीचर वाले स्कूल ज़्यादा हैं। हेल्थ सेंटर में PHC और CHC हैं भी तो ठीक से काम नहीं कर रहे। बेघर हुए लोगों को सही मुआवज़ा नहीं मिल रहा। यह हालत देखने के लिए शहरों के नेताओं को इन गांवों में जाना चाहिए। शहर के कॉन्फ्रेंस हॉल में बैठकर डेवलपमेंट की बातें करना आसान है, लेकिन यहां की कीचड़ भरी सड़कों पर चलकर और बच्चों के भूखे चेहरे देखकर अंदर की आत्मा जाग जाएगी।

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अगर नेता इन गांवों में जाएंगे तो उन्हें समझ आएगा कि डेवलपमेंट का मतलब सिर्फ़ कंक्रीट नहीं बल्कि ऑल-राउंड डेवलपमेंट है। सड़कें बनवाएं ताकि हॉस्पिटल तक पहुंचा जा सके। बिजली और पानी की सुविधा दें। स्कूलों में गुजराती के साथ आदिवासी कल्चर भी सिखाएं। हेल्थ सेंटर में लोकल आयुष डॉक्टरों को जोड़ें। जंगल के अधिकार का हल निकालें, ज़मीन का अधिकार दें। PM जनमन जैसी स्कीम लागू करने से पहले नेताओं को खुद वहां जाना चाहिए। ऐसा करने से स्कीम कागज़ पर नहीं बल्कि असल ज़िंदगी में आएंगी। आदिवासी हमारी कल्चर के रक्षक हैं, वे नेचर के साथी हैं। अगर हम उन्हें नज़रअंदाज़ करेंगे तो डेवलपमेंट अधूरा रह जाएगा।

सच्चा डेवलपमेंट तभी पूरा होगा जब आखिरी गांव तक रोशनी पहुंचे। जहां अंधेरा है, वहां हमें दीया जलाकर विकास की रोशनी फैलानी चाहिए। शहरों के नेताओं को एक बार इन गांवों में जाना चाहिए। बच्चों के सपने देखिए, महिलाओं के संघर्ष को समझिए, बुजुर्गों का दर्द महसूस कीजिए, तभी आपकी अंतरात्मा जागेगी और असली विकास की दिशा बदलेगी। आदिवासियों की जिंदगी में सिर्फ योजनाएं नहीं, विकास का दीया जलाइए। इसे ही गुजरात की सच्ची तरक्की कहेंगे।

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