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सीजेआई का बड़ा सुझाव- फैमिली कोर्ट में वकील-जज, पुलिस यूनिफॉर्म न पहनें, बच्चे डरते हैं; फैमिली कोर्ट में 11 लाख से ज्यादा केस
नई दिल्ली। भारत के मुख्य न्यायाधीश ने फैमिली कोर्ट को लेकर एक बेहतरीन सुझाव दिया है। उनका कहना है कि फैमिली कोर्ट में अक्सर बच्चे भी आते हैं जिनकी समझ उस अवस्था में नहीं होती है कि उनका कोमल मन चीजों को बेहतर तरीके से समझ पाएं। माता-पिता के झगड़े या अन्य किसी पारिवारिक विवाद की वजह से उन पर पहले से ही तनाव रहता है, ऐसे में जब वे फैमिली कोर्ट में पहुंचते हैं और यहां का माहौल देखते हैं तो उनका डर और बढ़ जाता है। इसलिए अब यह जरूरी हो गया है कि बच्चों के मन से मनोवैज्ञानिक डर को दूर करें। इसको लेकर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कुछ सुझाव दिये हैं। उन्होंने कोर्ट के पारंपरिक कामकाज में कुछ बदलाव करने की बात कही है। सीजेआई सूर्यकांत ने ये बातें दिल्ली के रोहिणी में एक फैमिली कोर्ट की आधारशिला रखने के कार्यक्रम में कहीं। बता दें कि अभी फैमिली कोर्ट में 11 लाख से ज्यादा केस चल रहे हैं।
उन्होंने कहा- ‘यह बहुत जरूरी है कि फैमिली कोर्ट बच्चों के मन से मनोवैज्ञानिक डर को खत्म करें। इसके लिए कोर्ट के पारंपरिक कामकाज में कुछ बदलाव किए जाएं। उन्होंने पूछा कि क्या फैमिली कोर्ट में काले चोंगे होने चाहिए? जब हम फैमिली कोर्ट के लिए एक नई सोच और अवधारणा बना रहे हैं तो क्या इससे बच्चे के मन में कोई मनोवैज्ञानिक डर पैदा नहीं होगा?’
सीजेआई ने इस प्रकार के सुझाव दिये हैं
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने सुझाव दिया कि फैमिली कोर्ट में पीठासीन जज और वकील को यूनिफॉर्म में नहीं आने चाहिए। उन्होंने कहा कि फैमिली कोर्ट में आप सभी पीठासीन अधिकारी कोर्ट की पोशाक में नहीं बैठेंगे। बार के सदस्य भी काले और सफेद चोंगे में नहीं आएंगे। पुलिस अधिकारी भी वर्दी में नहीं आएंगे, क्योंकि यह पूरा माहौल बच्चों के मन में डर पैदा करता है, खासकर तब जब वे किसी भी व्यवस्था के सबसे ज्यादा पीड़ित होते हैं। ऐसे में बच्चों को एक बेहतर माहौल की जरूरत होती है। ऐसे कुछ कदम उनका मनोवैज्ञानिक डर दूर कर सकता है।
जस्टिस सूर्यकांत बोले- हर कोई कोर्ट आना नहीं चाहता है
अपने स्पीच के दौरान उन्होंने कहा कि हर कोई कोर्ट आना नहीं चाहता है। जब हम सुधारों की बात करते हैं और जब हम फैमिली कोर्ट की अवधारणा को विवादों को सुलझाने के एक मंच के रूप में देखते हैं तो यह सिविल संपत्ति विवादों जैसा मामला नहीं है। फैमिली कोर्ट का मकसद मानवीय रिश्तों को सुधारना, उन पर विचार करना और उन्हें ठीक करना है।
फैमिली कोर्ट में आने वाले विवाद के भावनात्मक परिणाम होते हैं
फैमिली कोर्ट के सामने आने वाले विवादों के भारी भावनात्मक, सामाजिक और वित्तीय परिणाम होते हैं जो तात्कालिक कानूनी विवाद से कहीं आगे तक जाते हैं। इसलिए इन्हें फैमिली कोर्ट की बजाया क्या हम इन्हें ‘पारिवारिक समाधान केंद्र' नहीं कह सकते? फैमिली कोर्ट में अन्य कोर्ट के मुकाबले ज्यादातर मुकदमे परिवारों के भीतर से ही आते हैं।
अभी भारत में 953 फैमिली कोर्ट काम कर रहे हैं
अप्रैल 2022 तक, भारत के 26 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 715 फैमिली कोर्ट कार्यरत थे। हालांकि 2025 के आंकड़ों की बात करें तो इनकी संख्या बढ़कर 953 हो गई है। फैमिली कोर्ट अधिनियम, 1984 के तहत स्थापित किया गया है। ये न्यायालय वैवाहिक विवादों, बाल अभिरक्षा और भरण-पोषण से संबंधित मामलों की सुनवाई करते हैं, जिनका उद्देश्य त्वरित समाधान और सुलह को बढ़ावा देना है। यानी देखा जाए तो पारिवारिका विवादों को तेजी से निपटाने के लिए इनकी संख्या बढ़ाई गई है। वहीं गुजरात की बात करें तो अभी तक यहां 109 फैमिली कोर्ट कार्यरत हैं।

