- Hindi News
- राष्ट्रीय
- पश्चिम बंगाल में टूटा वोटिंग का रिकॉर्ड: बंपर मतदान से 'दीदी' की सत्ता बरकरार रहेगी या खिलेगा कमल?
पश्चिम बंगाल में टूटा वोटिंग का रिकॉर्ड: बंपर मतदान से 'दीदी' की सत्ता बरकरार रहेगी या खिलेगा कमल?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान ने इस बार राजनीतिक विश्लेषकों और पार्टियों को चौंका दिया है। पहले चरण से आए मतदान के आंकड़ों ने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। 152 सीटों पर 92 प्रतिशत से अधिक मतदान दर्ज हुआ है।
2021 विधानसभा चुनाव के पहले चरण में दर्ज 83.2 प्रतिशत मतदान की तुलना में लगभग 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। मतदान में यह बढ़ोतरी अब एक बड़ा राजनीतिक सवाल बन गई है कि क्या यह ‘दीदी’ (ममता बनर्जी) के पक्ष में गया है या फिर ‘दिल्ली’ यानी भाजपा के लिए अवसर पैदा कर रहा है?
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में मतदान समाप्त होने के बाद, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने एक बयान जारी कर अपने मताधिकार का उपयोग करने वाले हर मतदाता और उनके उत्साह को सलाम किया। उन्होंने कहा कि यह भारत की स्वतंत्रता के बाद दर्ज सबसे ऊँचा मतदान ग्राफ है।
देशभर में हुई पिछली 45 विधानसभा चुनावों में, जब भी मतदान प्रतिशत पिछली बार से कम रहा या लगभग समान रहा, तब अधिकांश राज्यों में सत्तारूढ़ सरकार को फायदा हुआ। उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश में जब मतदान प्रतिशत 75 से 76 प्रतिशत हुआ, तब भाजपा सरकार ने सफलतापूर्वक सत्ता बरकरार रखी। उत्तर प्रदेश में जब मतदान 61 से घटकर 60 प्रतिशत हो गया, तब भी भाजपा सत्ता हासिल करने में सफल रही। इसी तरह गोवा में मतदान 4 प्रतिशत घटा, फिर भी भाजपा सरकार सत्ता में लौट आई।
हालांकि, इस रुझान में कुछ अपवाद भी हैं। छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना और पंजाब जैसे राज्यों में भले ही मतदान एक-दो प्रतिशत कम रहा हो, लेकिन सरकारें बदल गईं। फिर भी व्यापक तौर पर देखा जाए तो मतदान पैटर्न यह संकेत देता है कि 7 प्रतिशत या उससे अधिक की वृद्धि दो अलग अर्थ रखती है, या तो मतदाता पूरी ताकत से मौजूदा सरकार को वापस लाना चाहते हैं, या पूरी ताकत से उसे सत्ता से हटाना चाहते हैं। ऐसे मतदान पैटर्न में चुनाव परिणाम उलझते नहीं बल्कि स्पष्ट और निर्णायक हो जाते हैं।
16 जिलों में मतदान प्रतिशत: कहां और कितना?
गुरुवार को पश्चिम बंगाल के 16 जिलों की 152 सीटों पर मतदान हुआ; इनमें से 12 जिलों में 90 प्रतिशत या उससे अधिक मतदान दर्ज किया गया। इनमें सबसे अधिक मतदान दक्षिण दिनाजपुर में हुआ, जहाँ 94.4 प्रतिशत मतदाताओं ने वोट डाला। सरल शब्दों में, हर 100 मतदाताओं में से लगभग 95 लोगों ने मतदान किया। दक्षिण दिनाजपुर में कुल 6 विधानसभा सीटें हैं, जहाँ मुस्लिम आबादी लगभग 25 प्रतिशत और हिंदू आबादी 73.5 प्रतिशत है। यानी जहाँ हिंदू मतदाता निर्णायक हैं, वहाँ सबसे अधिक मतदान हुआ है।
दक्षिण दिनाजपुर के बाद कूचबिहार में 94 प्रतिशत, बीरभूम में 93.2 प्रतिशत, जलपाईगुड़ी में 92.7 प्रतिशत और मुर्शिदाबाद में भी लगभग 92.7 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। मुर्शिदाबाद में 22 विधानसभा सीटें हैं। यहाँ हिंदू अल्पसंख्यक हैं; मुस्लिम आबादी 65 प्रतिशत से अधिक है, जबकि हिंदू केवल 33 प्रतिशत हैं। अब तक यह जिला ममता बनर्जी की TMC का गढ़ रहा है। हालांकि, हुमायूं कबीर अब पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं।
हुमायूं कबीर वही नेता हैं जो मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद का निर्माण कर रहे हैं और उन्होंने अपनी स्वतंत्र पार्टी के तहत चुनाव लड़ा है। अगर वे मुस्लिम वोट बैंक को विभाजित करने में सफल होते हैं, तो कम से कम 13 सीटों पर समीकरण बदल सकते हैं। उनके और TMC के बीच टकराव से भाजपा को रणनीतिक लाभ मिलने की संभावना है। उदाहरण के लिए, रेजीनगर सीट पर 2021 में 85.5 प्रतिशत मतदान हुआ था, जो इस बार 91.2 प्रतिशत हो गया है। नउदा सीट पर पहले 86.2 प्रतिशत मतदान था, जो अब 93 प्रतिशत तक पहुँच गया है। अब पूरा खेल इस बात पर निर्भर है कि हुमायूं कबीर मुस्लिम वोट बैंक में कितनी सेंध लगाते हैं और भाजपा को कितना फायदा मिलता है।
पहले चरण की एक और खास बात यह है कि जिन क्षेत्रों में सबसे अधिक मतदान हुआ है, वे ज्यादातर मिश्रित सीटें हैं—जहाँ हिंदू और मुस्लिम दोनों की उल्लेखनीय उपस्थिति है। उदाहरण के लिए, भागबंगोला में 96.5 प्रतिशत मतदान हुआ, जहाँ मुस्लिम 85 प्रतिशत और हिंदू केवल 14.2 प्रतिशत हैं।
रघुनाथगंज में 96.3 प्रतिशत, लालगोला में 96 प्रतिशत, फरक्का में 95.7 प्रतिशत और जंगीपुर में 94.8 प्रतिशत मतदान हुआ—इन सभी क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी बहुमत में है।
जहाँ हिंदू बहुमत है, वहाँ भी अच्छा मतदान हुआ, लेकिन मुस्लिम बहुल क्षेत्रों की तुलना में औसतन 2–2.5 प्रतिशत कम रहा। यही अंतर चुनाव के नतीजों की कुंजी हो सकता है। सवाल यह भी है कि क्या यह उच्च मतदान भाजपा के लिए फायदेमंद है, क्योंकि भाजपा लंबे समय से आरोप लगाती रही है कि TMC के डर से लोग पहले खुलकर वोट नहीं डाल पाते थे।
इस बार 2,40,000 केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती और शांतिपूर्ण मतदान के चलते यह सवाल उठता है कि क्या लोग वास्तव में बिना डर के वोट डाल पाए—और अगर ऐसा है, तो क्या इसका लाभ भाजपा को मिलेगा?
इस बार चुनाव का माहौल अलग था। छिटपुट घटनाओं को छोड़कर हिंसा लगभग नदारद रही। न बम धमाके, न बूथ कैप्चरिंग का डर। चुनाव आयोग ने राज्य को किले में बदल दिया था। पहले की तुलना में हिंसा काफी कम रही।
राजनीतिक हलकों में ‘साइलेंट वोटर’ सबसे बड़ा विषय है। विशेषज्ञ मानते हैं कि जब मतदान बिना डर के होता है, तो सत्ता विरोधी लहर स्पष्ट दिखती है। अगर आम लोग बिना झिझक वोट डालते हैं, तो यह बड़े बदलाव का संकेत हो सकता है। अब सवाल है—क्या यह लहर भाजपा को बहुमत तक ले जाएगी? इसका जवाब 4 मई को मिलेगा।
2021 में भाजपा को सिर्फ 77 सीटें मिली थीं, जबकि TMC को 215। इस बार स्थिति बदलने के लिए भाजपा को लगभग 100 अतिरिक्त सीटें जीतनी होंगी। पहले चरण में 152 सीटों पर मतदान हुआ, जहाँ पिछली बार भाजपा ने 59 और TMC ने 92 सीटें जीती थीं।
अगर इस बार भाजपा 92 और TMC 59 सीटें जीतती है, तो भाजपा 170 सीटों तक पहुँच सकती है। इसके लिए दूसरे चरण में भी 141 में से 78 सीटें जीतनी होंगी। हालांकि, यह लक्ष्य हासिल करना आसान नहीं होगा।

