क्या अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के लोग ट्रंप से नाराज हैं?

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क्या अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के लोग डोनाल्ड ट्रंप से नाराज हैं? हालिया सर्वे का जवाब हां की ओर झुकता है। भारतीय समुदाय के बड़े हिस्से में उनके कामकाज को लेकर असंतोष देखने को मिल रहा है। हालांकि, यह कहना गलत होगा कि भारतीय मूल के सभी लोग ट्रंप के विरोधी हो गए हैं। इस समुदाय में उनके समर्थक भी हैं और ऐसे लोग भी हैं, जो किसी एक पार्टी से स्थायी रूप से जुड़ना नहीं चाहते। इसलिए असंतोष का स्तर समझने के साथ-साथ उसके कारणों और सीमाओं को समझना भी जरूरी है।

कार्नेगी और YouGov के फरवरी 2026 में प्रकाशित अध्ययन में 71 प्रतिशत लोगों ने ट्रंप के कामकाज के प्रति असंतोष जताया था, जबकि 29 प्रतिशत लोग उनके कामकाज से संतुष्ट थे। यह सर्वे नवंबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच भारतीय मूल के 1,000 वयस्कों के बीच किया गया था। इसलिए इस आंकड़े को नवंबर की ताजा लोकप्रियता के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए। यह ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के पहले वर्ष को लेकर लोगों की राय दर्शाता है।

इससे जुड़ी ताजा जानकारी 2 नवंबर 2026 को जारी कार्नेगी की रिपोर्ट में मिलती है। अक्टूबर में 1,000 लोगों के बीच किए गए सर्वे में अमेरिकी नागरिकता रखने वाले 62 प्रतिशत लोगों ने प्रतिनिधि सभा के लिए डेमोक्रेटिक उम्मीदवार को चुनने की बात कही थी। वहीं, रिपब्लिकन उम्मीदवार के पक्ष में यह आंकड़ा 19 प्रतिशत था। हालांकि, यह मतदान से पहले की पसंद थी। इसे चुनाव का नतीजा या ट्रंप की व्यक्तिगत लोकप्रियता का सीधा पैमाना मानना उचित नहीं होगा।

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इस असंतोष के पीछे रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े मुद्दे अहम हैं। साल की शुरुआत में किए गए अध्ययन में महंगाई और रोजगार लोगों की प्रमुख चिंताएं थीं। इमिग्रेशन नीति को लेकर भी बहुमत ने असंतोष जताया था। भारत के साथ संबंधों को लेकर असंतोष होने के बावजूद ज्यादातर लोगों के लिए अमेरिका के घरेलू मुद्दे ज्यादा महत्वपूर्ण थे। इसलिए यह समझना अधूरा होगा कि भारतीय मूल के मतदाता अमेरिकी राजनीति को केवल भारत के हितों के नजरिए से देखते हैं। वे वहां अपने जीवन की गुणवत्ता को भी महत्व देते हैं।

इमिग्रेशन के मुद्दे को समझना जरूरी है। अमेरिकी नागरिकता रखने वाले व्यक्ति और काम या पढ़ाई के लिए वीजा पर रहने वाले व्यक्ति की स्थिति एक जैसी नहीं होती। हालांकि, एक ही परिवार में अलग-अलग स्थिति वाले सदस्य हो सकते हैं। ऐसे में किसी नीति का सीधा असर किसी व्यक्ति पर न भी पड़े, फिर भी परिवार के भविष्य को लेकर चिंता हो सकती है। राजनीतिक चर्चा में कानून लागू करने के साथ-साथ उसके मानवीय प्रभाव को समझना भी उतना ही जरूरी है।

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दूसरी ओर, ट्रंप को मिलने वाले समर्थन को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। साल की शुरुआत में किए गए अध्ययन में खुद को रिपब्लिकन बताने वाले भारतीय मूल के लोग ज्यादातर उनकी नीतियों का समर्थन कर रहे थे। इसलिए समुदाय के असंतोष को एकतरफा विरोध के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा। कोई मतदाता किसी नीति से असहमत होने के बावजूद अपनी पूरी राजनीतिक पसंद बदलने के लिए तैयार नहीं हो सकता। किसी पार्टी के प्रति भरोसा और उसके नेता के कामकाज को लेकर राय हमेशा एक जैसी नहीं होती।

अक्टूबर के सर्वे में यह अंतर दिखाई देता है। डेमोक्रेट्स को वोट देने की इच्छा रखने वाले लोगों में से 35 प्रतिशत ने बताया कि उनकी पसंद की मुख्य वजह रिपब्लिकन उम्मीदवार या पार्टी का विरोध था। इसका मतलब है कि डेमोक्रेट्स की ओर जाने वाला हर वोट उनकी नीतियों के प्रति उत्साह नहीं दर्शाता। कई बार मतदाता उपलब्ध विकल्पों में से कम नापसंद विकल्प चुनता है। यह स्थिति दोनों पार्टियों के लिए विचार करने का विषय है। एक पार्टी के सामने अपना समर्थन बनाए रखने की चुनौती है, तो दूसरी के सामने लोगों का भरोसा जीतने की।

इस मुद्दे को भारत के नजरिए से देखते समय भी सावधानी जरूरी है। भारतीय मूल का होने का मतलब यह नहीं है कि सभी लोगों की राजनीतिक सोच एक जैसी होगी। भारत में किसी लोकप्रिय नेता के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति की दोस्ती वहां रहने वाले हर भारतीय का वोट तय करती है, ऐसा नहीं माना जा सकता। जब बात अपने बच्चों के भविष्य और आर्थिक सुरक्षा की आती है, तो मतदाता नेताओं की व्यक्तिगत मित्रता के बजाय नीतियों के नतीजों को ज्यादा महत्व दे सकता है। इसे अपने मूल देश के प्रति भावनाओं से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा।

उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर कहा जा सकता है कि भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों के एक बड़े वर्ग में ट्रंप के प्रति असंतोष है। हालांकि, इसका मतदान पर असर सभी लोगों के बीच एक जैसा नहीं है। नाराजगी का मतलब यह भी नहीं है कि मतदाता स्थायी रूप से अपना राजनीतिक पक्ष बदल लेंगे। ट्रंप के सामने अपने समर्थकों को उत्साहित रखने के साथ-साथ असंतुष्ट लोगों का भरोसा दोबारा हासिल करने की चुनौती है। वहीं, डेमोक्रेट्स के सामने विरोध के वोटों को अपने समर्थन में बदलने की चुनौती है। किसी भी पार्टी को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि भारतीय मूल के समुदाय का समर्थन उसे अपने आप मिलता रहेगा।

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