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सूरत : PM मोदी का सूट 4.31 करोड़ रुपये में खरीदने वाले धर्मनंदन डायमंड के मालिक लालजी पटेल ने बताई सफलता की कहानी, कभी 500 रुपये लेकर आए थे सूरत
‘मन हो तो माळवे जाया’ यानी अगर मन में ठान लिया जाए तो मंजिल हासिल की जा सकती है। आपने यह कहावत तो सुनी ही होगी। आज इस कहावत को सच साबित करने वाले सूरत के जाने-माने कारोबारी लालजी पटेल की कहानी लेकर आए हैं, जिसे पढ़कर आपको काफी प्रेरणा मिलेगी। लालजी पटेल ने 1970 में 10वीं कक्षा पास की थी।
लालजीभाई पटेल का जन्म 28 नवंबर 1955 को भावनगर जिले की गढ़ड़ा तहसील के उगामेड़ी गांव में हुआ था। उस समय उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बिल्कुल अच्छी नहीं थी। उनके पिता किसान थे। उन्होंने कक्षा 1 से 8 तक की पढ़ाई उगामेड़ी गांव में ही की और 9वीं-10वीं की पढ़ाई राजकोट गुरुकुल में रहकर पूरी की। उनकी शिक्षा केवल 10वीं कक्षा तक ही हुई है। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, इसलिए दूसरी सुविधाओं के बारे में सोचना भी संभव नहीं था। हालांकि, बचपन में ही शायद ईश्वर ने उन्हें एक खास तोहफा दिया था और वह था कुछ कर गुजरने का जुनून।
10वीं कक्षा पूरी करने के बाद उनके पिता ने कहा कि उन्हें हीरे के कारोबार में जाना चाहिए। इसके बाद वह भावनगर में हीरे तराशना सीखने गए। जिस काम को सीखने में दूसरे लोगों को चार महीने लगते थे, उसे उन्होंने केवल एक महीने में सीख लिया। उस समय उन्होंने हीरों को आकार देना सीखा और शायद वहीं से उनकी जिंदगी भी एक नया आकार लेने लगी। करीब नौ महीने भावनगर में रहने के बाद उन्होंने अपने गांव उगामेड़ी के एक कारखाने में काम किया। इसके बाद 1973 में उन्होंने सूरत को अपनी कर्मभूमि बनाया और सैयदपुरा इलाके की बोरडी शेरी में एक कारखाने में हीरे तराशने का काम शुरू किया।
उस दौर में सूरत में हीरे के ज्यादा कारखाने नहीं थे। केवल सैयदपुरा, हरिपुरा और महिधरपुरा इलाके में कुछ कारखाने हुआ करते थे। उस समय वराछा, कतारगाम और अश्विनीकुमार जैसे इलाकों में कारखानों की शुरुआत भी नहीं हुई थी। उन्होंने बोरडी शेरी के कारखाने में करीब दो साल तक काम किया। इसके बाद महिधरपुरा की थोभा शेरी में दो घंटियों के साथ अपना कारखाना शुरू किया। फिर काछिया शेरी और उसके बाद पांडोल इंडस्ट्रियल एस्टेट में हीरे का कारखाना शुरू किया।
1985 में उनके कारखाने का नाम श्रीजी जेम्स रखा गया था। इसके बाद 1993 में इसका नाम बदलकर धर्मनंदन डायमंड रखा गया। वर्ष 2004 में उन्होंने कतारगाम इलाके में हीरों की आधुनिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर की फैक्ट्री स्थापित की। सूरत के प्रमुख उद्योगपतियों और परोपकारी व्यक्तित्वों में शामिल लालजीभाई तुलसीभाई पटेल डायमंड कंपनी 'धर्मनंदन डायमंड्स' के संस्थापक और चेयरमैन हैं। लालजीभाई ने दशकों की मेहनत और ईमानदारी के दम पर हीरा उद्योग में वैश्विक स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाई है। इसके साथ ही सौराष्ट्र में जल संरक्षण अभियान और सामाजिक कल्याण से जुड़ी गतिविधियों में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चर्चित सूट की नीलामी में 4.31 करोड़ रुपये की सबसे ऊंची बोली लगाकर देशभर में चर्चा में आए थे। उनके परिवार की बात करें तो उनकी पत्नी और बेटे हितेशभाई व भावेशभाई समेत पूरा परिवार उनके सामाजिक और व्यावसायिक सफर में सक्रिय रूप से जुड़ा हुआ है। उनके बेटे धर्मनंदन डायमंड का कारोबार संभाल रहे हैं।
एक समय सामान्य हीरा कारीगर के रूप में काम शुरू करने वाले लालजी पटेल की कंपनी आज 7,000 करोड़ रुपये का सालाना टर्नओवर करती है। उनके पास प्राइवेट डबल इंजन जेट और बेंटले-रेंज रोवर जैसी 15 से 20 लग्जरी कारों का काफिला है। संपत्ति बनाने और पैसा कमाने का गुरुमंत्र बताते हुए उन्होंने कहा कि संपत्ति निर्माण का जीता-जागता उदाहरण नरेंद्रभाई मोदी हैं, जो 24 घंटे में से 18 घंटे अथक परिश्रम करते हैं। अगर कोई भी व्यक्ति कारोबार या समाजसेवा में इसी जुनून के साथ मेहनत करे तो उसे सफलता जरूर मिलती है। गीता का सूत्र है- 'कर्म किए जा, फल की इच्छा मत कर'। मेहनत करना हमारे हाथ में है और उसका फल ईश्वर के हाथ में है।
लालजीभाई ने बताया कि शुरुआती दिनों में कारोबार के लिए कोई भी उन्हें कर्ज देने को तैयार नहीं था। जब वह किसी की ऑफिस में जाते थे तो उन्हें दो-दो लोगों की पहचान बतानी पड़ती थी। मन में यह विचार आता था कि अगर पूंजी मिल जाए तो कारोबार को और बढ़ाया जा सकता है, लेकिन कोई उन पर भरोसा नहीं करता था। ऐसी परिस्थितियों में उन्होंने एक ही नियम अपनाया- 100 प्रतिशत नैतिकता और समय पर भुगतान। धीरे-धीरे बाजार में उनकी साख बनती गई और सफलता के रास्ते अपने आप खुलते गए।
लालजीभाई ने बताया कि 10वीं पास करने के बाद वह अपने पिता के साथ काला-कपास के कारोबार में भी जुड़े थे। वर्ष 1975 में वह पहने हुए कपड़ों में ही, जेब में टिकट के किराये और लॉज में रहने के खर्च के लिए केवल 500 रुपये लेकर सूरत आए थे। सूरत में उन्होंने दो से तीन साल तक हीरा तराशने की घंंटियों पर काम किया। तीन साल मजदूरी करने के बाद उनके मन में अपना कुछ शुरू करने का विचार आया और 1977 में केवल दो घंटियों के साथ उन्होंने अपना कारोबार शुरू किया। धीरे-धीरे उन्होंने हीरा बाजार में अपनी जगह बनाई और आज धर्मनंदन डायमंड वैश्विक स्तर पर पहचान बना चुकी है।
घर की 'लकी लक्ष्मी' के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति का नाम लेने के बजाय वह कहेंगे कि उनके घर की लकी लक्ष्मी केवल और केवल 'नीतिमत्ता' है। अगर आपके पास नैतिकता है तो लक्ष्मीजी अपने आप आपके घर आएंगी। वर्ष 2000 तक उनका सफर सामान्य रहा, लेकिन 2000 के बाद उन्होंने खूब पैसा कमाया। नैतिकता के रास्ते से आने वाली लक्ष्मी के साथ अच्छे विचार भी आते हैं और समाज के लिए उपयोगी काम करने का आत्मसंतोष मिलता है।
उन्होंने कहा कि पैसा व्यवस्था चलाने के लिए जरूरी है, लेकिन यह जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं है। कोई व्यक्ति कितना भी बड़ा अमीर क्यों न हो, जब वह बीमार पड़ता है तो पैसा नहीं, बल्कि नैतिकता और पुण्य के काम ही काम आते हैं। आज के युवाओं को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि युवाओं को सबसे पहले हर तरह के नशे से दूर रहना चाहिए। शॉर्टकट खोजने के बजाय नैतिकता के साथ काम करना चाहिए और अपना लक्ष्य तय करके दिन-रात मेहनत करनी चाहिए। अगर परिश्रम ईमानदारी से किया जाए तो सफलता 100 प्रतिशत आपके कदम चूमेगी।
संपत्ति और सफलता को कैसे संभालना चाहिए, इस बारे में उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि जब आम के पेड़ पर फल आते हैं तो उसकी डालियां अपने आप नीचे झुक जाती हैं। ठीक उसी तरह जब किसी व्यक्ति के पास संपत्ति आती है तो उसे जमीन से जुड़े रहना सीखना चाहिए। सफलता मिलने के बाद कभी घमंड नहीं करना चाहिए और न ही किसी छोटे व्यक्ति का अपमान करना चाहिए। इंसान जब अपनी पुरानी परिस्थितियों को भूल जाता है, तभी वह रास्ते से भटकता है। बचपन में सौराष्ट्र में एक समय ऐसा भी था जब एक वक्त का खाना जुटाना मुश्किल होता था। उन दिनों को याद रखने से मन कभी भटकता नहीं है।
पैसे की असली कीमत के बारे में बात करते हुए लालजीभाई ने बताया कि जब वह 28 साल के थे और 1977 में उन्होंने कारोबार शुरू किया था, तब उनका सपना केवल एक लाख रुपये जमा करने का था। पांच साल की मेहनत के बाद 1980-81 में जब उनके पास एक लाख रुपये की पूंजी जमा हुई तो उन्हें लगा कि अब पूरी जिंदगी कोई परेशानी नहीं होगी। इसके बाद उन्होंने और मेहनत की और जब एक करोड़ रुपये जमा हुए, तब भी उन्हें काफी संतोष था।
उन्होंने कहा कि सच बताऊं तो आज उनके पास जितनी संपत्ति है, उससे कहीं कम संपत्ति होने के बावजूद उस समय खुशी ज्यादा थी। एक लाख रुपये कमाने पर जो खुशी मिली थी, वैसी खुशी आज अरबों रुपये की संपत्ति होने पर भी नहीं मिलती।

