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अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में करारी हार के बाद ट्रंप का क्या होगा?
अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा है। डेमोक्रेट्स ने संसद के दोनों सदनों यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट पर कब्जा कर लिया है। इन नतीजों ने ट्रंप के राजनीतिक वर्चस्व को बड़ा झटका दिया है। चुनाव में मतदाताओं ने ट्रंप की ईरान नीति, बढ़ती महंगाई, सख्त इमिग्रेशन नीति, प्रशासन के कामकाज और सत्ता के इस्तेमाल को लेकर अपना फैसला सुना दिया है।
ट्रंप ने 2024 में कीमतें कम करने और अमेरिका को नए युद्धों में नहीं उलझाने का वादा करके सत्ता में वापसी की थी। लेकिन, दो साल के भीतर ही उनकी पार्टी ने कांग्रेस के दोनों सदनों में बहुमत गंवा दिया है। अब सवाल है कि इस हार के बाद ट्रंप का क्या होगा? वे क्या करेंगे? क्या वे अपनी नीतियों में बदलाव करेंगे या फिर डेमोक्रेट्स के साथ टकराव का रास्ता अपनाएंगे? आने वाले दो साल अमेरिकी राजनीति के लिए काफी अहम रहने वाले हैं।
मिडटर्म चुनाव में मिली हार के बाद ट्रंप के सामने सबसे बड़ी चुनौती डेमोक्रेटिक पार्टी के नियंत्रण वाली कांग्रेस होगी। नए साल में जब नई कांग्रेस काम शुरू करेगी, तब उसके पास प्रशासन के फैसलों की जांच करने और उनसे जवाब मांगने का अधिकार होगा। डेमोक्रेट्स ट्रंप प्रशासन, ईरान संघर्ष से जुड़े मुद्दों और व्हाइट हाउस में भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच शुरू कर सकते हैं।
इसके अलावा, ट्रंप और उनके परिवार के कारोबारी हित भी जांच के दायरे में आ सकते हैं। खास तौर पर क्रिप्टोकरेंसी, सरकारी ठेकों और विदेशों में कथित तौर पर कारोबारी फायदे के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करने के आरोपों की जांच हो सकती है। ट्रंप के करीबी सहयोगियों और प्रशासनिक अधिकारियों को भी कांग्रेस की समितियों के सामने पेश होकर गवाही देनी पड़ सकती है।
सीनेट पर नियंत्रण हासिल करने के बाद डेमोक्रेट्स के पास ट्रंप के लिए और मुश्किलें खड़ी करने की ताकत होगी। अगर सुप्रीम कोर्ट में कोई पद खाली होता है, तो वे नए जज की नियुक्ति रोक सकते हैं। इसके अलावा, वे ट्रंप की ओर से प्रस्तावित नए कैबिनेट मंत्रियों की नियुक्तियों को मंजूरी मिलने से रोक सकते हैं। इसका मतलब है कि भले ही ट्रंप के पास राष्ट्रपति पद की शक्तियां रहेंगी, लेकिन प्रशासन चलाने और अपनी नीतियों को आगे बढ़ाने में उन्हें अधिक राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ेगा।
ट्रंप की हार के पीछे सबसे अहम कारणों में ईरान नीति और महंगाई को माना जा रहा है। 2024 के चुनाव में ट्रंप ने अमेरिका को नए युद्धों से दूर रखने और आम नागरिकों को महंगाई से राहत दिलाने का वादा किया था। लेकिन, ईरान के साथ युद्ध और इसके कारण ईंधन की कीमतों में हुई बढ़ोतरी ने उनके लिए बड़ी चुनौतियां खड़ी कर दीं।
चुनाव से पहले पेट्रोल की कीमतों में करीब 40 फीसदी का उछाल आया, जबकि डीजल के दाम लगभग दोगुने हो गए। इसका सीधा असर अमेरिकी परिवारों पर पड़ा। लोग पहले से ही खाने-पीने की चीजों, पेट्रोल, आवास और स्वास्थ्य सेवाओं के बढ़ते खर्च को लेकर चिंतित थे। ऐसे में युद्ध के कारण ईंधन की कीमतों में हुई तेज बढ़ोतरी ने ट्रंप प्रशासन के प्रति नाराजगी और बढ़ा दी।
कई राज्यों में ट्रंप की टैरिफ नीति भी रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए नुकसानदायक साबित हुई। कनाडा की सीमा से लगे राज्यों में रिपब्लिकन उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा। कृषि और विनिर्माण क्षेत्र पर निर्भर राज्यों के मतदाता भी पार्टी के खिलाफ हो गए। चीन में बीफ और सोयाबीन के निर्यात बाजार को हुए नुकसान ने किसानों और कारोबारियों की नाराजगी बढ़ा दी।
मेन की रिपब्लिकन सीनेटर सुसान कॉलिन्स ने चुनाव से कुछ समय पहले कुछ टैरिफ हटाने की कोशिश की थी, लेकिन उन्हें इसका कोई फायदा नहीं मिला। उनके प्रतिद्वंद्वी ट्रॉय जैक्सन ने इस कदम का मजाक उड़ाते हुए कहा था कि सड़क पर बिखरा नमक खाने के काम नहीं आता।
चुनाव में हार के बाद ट्रंप ने संकेत दिया है कि वे हर मुद्दे पर डेमोक्रेट्स से टकराव नहीं चाहते। उन्होंने कहा कि वे विपक्षी पार्टी के साथ मिलकर देश के लिए काम करना चाहते हैं। चुनाव नतीजों के बाद उन्होंने कहा कि वे यह सुनिश्चित करने के लिए डेमोक्रेट्स के साथ काम करेंगे कि देश के लिए चीजें बेहतर रहें।
हालांकि, उनके पुराने बयानों और मौजूदा रुख को देखते हुए ऐसा सहयोग कितने समय तक चलेगा, यह बड़ा सवाल है। चुनाव से कुछ समय पहले ट्रंप ने खुद को 'मिस्टर वीटो' बताया था। इसका मतलब है कि अगर डेमोक्रेट्स कोई ऐसा कानून लाते हैं, जिससे वे सहमत नहीं हैं, तो वे उसे रोकने के लिए राष्ट्रपति के तौर पर अपनी वीटो शक्ति का इस्तेमाल कर सकते हैं।
ऐसे में बजट, ईरान युद्ध और प्रशासन की नीतियों को लेकर दोनों पार्टियों के बीच टकराव बढ़ने की आशंका है। डेमोक्रेट्स जांच और संसदीय समन के जरिए प्रशासन पर दबाव बना सकते हैं, लेकिन ट्रंप राष्ट्रपति पद के अपने अधिकारों का इस्तेमाल करके इन कोशिशों को रोकने का प्रयास कर सकते हैं।
रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ को पद से हटाने की मांग भी टकराव का मुद्दा बन सकती है। हालांकि, कैबिनेट के किसी सदस्य को पद से हटाने के लिए जरूरी समर्थन हासिल करना आसान नहीं होगा। ट्रंप के सामने एक और चुनौती अपनी विदेश नीति और ईरान युद्ध को लेकर विपक्ष के दबाव का सामना करने की होगी।
मिडटर्म चुनाव में मिली हार का असर सिर्फ ट्रंप के मौजूदा कार्यकाल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका सीधा प्रभाव 2028 के राष्ट्रपति चुनाव की तैयारियों पर भी पड़ सकता है। रिपब्लिकन पार्टी में ट्रंप के बाद नेतृत्व कौन संभालेगा, इसे लेकर चर्चाएं तेज होने की संभावना है।
उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को अब तक ट्रंप के संभावित राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जाता रहा है। हालांकि, चुनाव में मिली इस हार के बाद उनके लिए आगे की राह मुश्किल हो सकती है। उन्हें तय करना होगा कि वे कब तक ट्रंप की नीतियों और राजनीतिक शैली से जुड़े रहेंगे और साथ ही अपनी अलग पहचान कैसे बनाएंगे।
विदेश मंत्री मार्को रुबियो भी रिपब्लिकन पार्टी के संभावित चेहरों में शामिल हो सकते हैं। वे पुराने रिपब्लिकन नेताओं और मौजूदा MAGA समर्थकों के बीच नया राजनीतिक गठबंधन बनाने की कोशिश कर सकते हैं। फ्लोरिडा के गवर्नर रॉन डेसेंटिस जैसे नेताओं को भी लगता है कि ट्रंप प्रशासन से दूरी बनाकर पार्टी के लिए एक नई पहचान पेश करने का मौका मिल सकता है।
इस चुनाव में टेक्सास जैसे पारंपरिक रिपब्लिकन गढ़ में भी डेमोक्रेट्स को बड़ी जीत मिली है। जेम्स तलारिको ने सीनेट की सीट जीतकर करीब चार दशक बाद इस राज्य में डेमोक्रेट्स को जीत दिलाई है। वहीं, गवर्नर ग्रेग एबॉट भी चौथी बार चुनाव जीतने में नाकाम रहे हैं। इससे रिपब्लिकन पार्टी के सामने अपने पारंपरिक मतदाता आधार को बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई है।
डेमोक्रेट्स के लिए यह जीत बड़ी राजनीतिक वापसी है, लेकिन उनके सामने भी कई चुनौतियां हैं। कांग्रेस के दोनों सदनों पर नियंत्रण होने के बावजूद जब तक ट्रंप राष्ट्रपति हैं, तब तक वे अपने एजेंडे के सभी पहलुओं को लागू नहीं कर पाएंगे, क्योंकि ट्रंप के पास किसी भी विधेयक को वीटो करने की शक्ति है।
मतदाताओं ने महंगाई और जीवनयापन की बढ़ती लागत को लेकर नाराजगी जाहिर की है। ऐसे में डेमोक्रेट्स को यह साबित करना होगा कि वे जनता को राहत देने के लिए ठोस कदम उठा सकते हैं। अगर वे महंगाई और जीवनयापन के खर्च जैसे मुद्दों पर नतीजे नहीं दे पाए, तो 2028 में उन्हें भी मतदाताओं की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है।
कुल मिलाकर, मिडटर्म चुनाव ने ट्रंप की राजनीतिक ताकत को सीमित कर दिया है, लेकिन राष्ट्रपति पद की उनकी शक्तियां बरकरार हैं। आने वाले दो साल में व्हाइट हाउस और डेमोक्रेटिक पार्टी के नियंत्रण वाली कांग्रेस के बीच जांच, बजट, ईरान युद्ध और सरकारी नीतियों को लेकर लगातार टकराव देखने को मिल सकता है। इस हार के बाद ट्रंप अपनी रणनीति में बदलाव करेंगे या और आक्रामक रुख अपनाएंगे, यह अमेरिकी राजनीति की दिशा तय करेगा। इस चुनाव का सबसे बड़ा संदेश यही है कि अमेरिका का राष्ट्रपति कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, मतदाताओं का फैसला उसे भी चुनौती दे सकता है।

