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दिलीपभाई देशमुख युवाओं के लिए प्रेरणा का झरना
(उत्कर्ष पटेल)
आज के युवाओं के जीवन में प्रेरणा की भारी जरूरत है। कोई ऐसी शख्सियत चाहिए जो कहे कि सेवा करने से ही जीवन सार्थक बनता है। ऐसी ही एक प्रेरणादायी शख्सियत हैं दिलीपभाई देशमुख। उनका जीवन युवाओं के लिए खुली किताब की तरह है जिसमें सीखने को बहुत कुछ है और अनुसरण करने को और भी ज्यादा।
दिलीपभाई की यात्रा एक साधारण स्वयंसेवक के रूप में शुरू हुई थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बनकर उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। घर परिवार और व्यक्तिगत सुख को पीछे छोड़कर वे निरंतर समाज सेवा में जुटे रहे। यह यात्रा आसान नहीं थी। इसमें त्याग संघर्ष और अटूट प्रतिबद्धता भरी थी। लेकिन उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनके इस कदम ने अनेक युवाओं को प्रभावित किया और वे भी सेवा के रास्ते पर आगे बढ़े। आज वे विभिन्न क्षेत्रों में सफल नेतृत्व कर रहे हैं।

2001 के कच्छ के विनाशकारी भूकंप के समय दिलीपभाई का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता। जब भूकंप प्रभावित इलाका दुख और अंधेरे से भर गया था तब वे सीधे मैदान में पहुंच गए। लोगों की मदद करना घायलों को अस्पताल पहुंचाना राहत सामग्री बांटना और लोगों में आशा की किरण जगाना यह सब उन्होंने बिना थके किया। उनके इस कार्य ने कच्छ के लोगों के दिल में उनके लिए स्थायी जगह बना ली। इस घटना ने एक बात साफ कर दी कि संकट के समय सेवा ही सही रास्ता है।

दिलीपभाई प्रधानमंत्री नरेंद्रभाई मोदी के निकटवर्ती भी रहे। यह संबंध केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि विचार और कर्म का संबंध है। दोनों के बीच सेवा और राष्ट्र निर्माण की समान भावना रही। दिलीपभाई की सबसे बड़ी खासियत युवाओं को सेवा के मार्ग पर ले जाने की है। वे कई युवाओं का हाथ थामकर उन्हें सेवा की दिशा में मार्गदर्शन देते हैं। केवल भाषण देकर नहीं बल्कि अपने जीवन से उदाहरण पेश करके। युवा जब उनके पास आते हैं तो वे उन्हें समझाते हैं कि सेवा कोई काम नहीं है बल्कि जीवन का अभिन्न अंग है।

एक समय उनके जीवन में भी कठिन दौर आया। वर्ष 2020 के 10 जुलाई को अहमदाबाद के इंस्टीट्यूट ऑफ किडनी डिजीज एंड रिसर्च सेंटर में उनका लीवर ट्रांसप्लांट हुआ। अंगदान से मिले लीवर से उनकी तबीयत सुधरी और उन्हें नया जीवन मिला। सर्जरी के बाद वे अंगदान जागरूकता के पूर्णकालिक सक्रिय सेवक बन गए। अंगदान चैरिटेबल ट्रस्ट के जरिए वे पूरे गुजरात में जागरूकता फैलाते हैं और युवाओं को समझाते हैं कि मृत्यु के बाद भी शरीर के अंग दूसरे लोगों को जीवन दे सकते हैं। उनके इस अनुभव ने युवाओं को सिखाया कि संघर्ष को भी सेवा में बदला जा सकता है।
आज वर्ष 2026 में भी दिलीपभाई का जीवन निरंतर सेवा में लगा हुआ है। कोई विराम नहीं कोई अपेक्षा नहीं केवल सेवा और सेवा। आज जब युवा मोबाइल धन संपदा और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं में खो जाते हैं तब उनका जीवन एक ज्योतिपुंज बनकर रह जाता है। वे कहते हैं कि सेवा करने से ही इंसान सच्चे अर्थ में जीता है।

दिलीपभाई देशमुख जैसी शख्सियत हमें याद दिलाती है कि जीवन का सच्चा अर्थ सेवा में है। युवाओं के लिए वे प्रेरणा का झरना हैं। कोई भी उनके जीवन को करीब से देखेगा तो जान जाएगा कि आज भी इस देश में सेवाभावी लोग हैं जिनसे हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। दिलीपभाई का जीवन एक ही बात कहता है सेवा करो सेवा करते रहो और जीवन को सार्थक बनाओ।
(लेखक एक प्रतिष्ठित उद्योगपति, समाजसेवी और khabarchhe.com के संस्थापक हैं।)

