पितृ पक्ष शुरू, अब 15 दिनों तक श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान, लेकिन दान का खास महत्व; इन दिनों क्या सावधानी रखें, क्या खाएं?

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अनंत चतुर्थी के साथ ही गणेशोत्सव का समापन हो गया। भादौ मास की पूर्णिमा के साथ ही पितृ पक्ष की शुरुआत भी हो गई। अब 10 अक्टूबर तक मांगलिक कार्यों पर रोक रहेगी। इन दिनों पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे कर्म किए जाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से पितरों का श्राद्ध करने से परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। वहीं, भाद्रपद यानी भादौ मास की पूर्णिमा पर उन मृत परिजनों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु किसी भी महीने की पूर्णिमा तिथि को हुई हो। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार नियम यह है कि व्यक्ति की मृत्यु जिस तिथि को हुई हो, पितृ पक्ष में उसी तिथि पर उसका श्राद्ध किया जाता है। जिन लोगों की मृत्यु की तिथि मालूम नहीं है, उनके लिए पितृ पक्ष की अलग-अलग तिथियों पर श्राद्ध करने की परंपरा बताई गई है। 
वहीं, ऐसा माना जाता है पितृ पक्ष के दौरान हमारे पूर्वज धरती पर अपने परवार के बीच आते हैं। लेकिन श्राद्ध कर्म तभी सफल माने जाते हैं जब इसे नियम और पूरे विधि-विधान के साथ किये जाएं। इसलिए यह जानना जरूरी है कि पितृ पक्ष के दौरान किन नियमों का पालन करना जरूरी है।

श्राद्ध के दौरान भोजन में रखें सात्विकता

पितृ पक्ष में भोजन की शुद्धता को विशेष महत्व दिया जाता है। इन दिनों घर में सात्विक भोजन बनाने की परंपरा है। आमतौर पर बिना प्याज-लहसुन का भोजन बनाया जाता है। दाल, चावल, हरी सब्जियां और सादा भोजन उपयुक्त माना जाता है। मांस-मदिरा और बहुत अधिक तीखे या मसालेदार भोजन से परहेज करने की बात कही गई है। श्राद्ध के भोजन में दूध, घी, शहद, जौ और तिल का इस्तेमाल किया जाता है। भोजन बनाने वाले व्यक्ति को स्नान करने के बाद पूरी साफ-सफाई के साथ रसोई में जाना चाहिए।

देश में कई राज्यों में अलग-अलग नियम

हालांकि, देश के अलग-अलग क्षेत्रों में कुलाचार के अनुसार परंपराएं अलग हैं। बंगाल, असम और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में कुछ परिवार पितरों को उनकी पसंद का मांसाहारी भोजन या मछली भी अर्पित करते हैं। मान्यता है कि जीवित रहते पितर को जो भोजन पसंद था, उसे श्राद्ध में अर्पित किया जा सकता है।

दोपहर में करें श्राद्ध, दक्षिण दिशा की ओर मुख

तर्पण और श्राद्ध के लिए दोपहर का समय उपयुक्त माना जाता है। सूर्यास्त के समय श्राद्ध नहीं करना चाहिए। पूजा के दौरान दक्षिण दिशा की ओर मुंह रखने की परंपरा है, क्योंकि दक्षिण दिशा को पितरों की दिशा माना जाता है। श्राद्ध अपनी जमीन, किसी मंदिर या पवित्र नदी के किनारे किया जाना चाहिए। किसी दूसरे व्यक्ति के घर पर श्राद्ध कर्म करना उचित नहीं माना जाता। तर्पण में काले तिल और कुशा का इस्तेमाल भी महत्वपूर्ण माना गया है।

ब्राह्मण भोज को उत्तम माना गया है

श्राद्ध के दिन कम से कम तीन ब्राह्मणों को घर बुलाकर सम्मानपूर्वक सात्विक भोजन कराने की परंपरा है। भोजन के बाद उन्हें दान-दक्षिणा, जैसे कपड़े या अनाज देकर विदा किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार दान के बिना श्राद्ध कर्म अधूरा माना जाता है। इसके साथ ही भोजन का एक हिस्सा देवताओं, गाय, कुत्ते, कौवे और चींटियों के लिए भी निकाला जाता है। इसे पंचबली कहा जाता है। मान्यता है कि इसके माध्यम से पितरों तक भोजन पहुंचता है।

यह भी जानना जरूरी है कि किसी तिथि पर किसका श्राद्ध करें

किसी भी महीने की पूर्णिमा तिथि पर जिन लोगों की मृत्यु हुई हो, उनका श्राद्ध इस दिन किया जाता है। इसी के साथ पितृ पक्ष का आरंभ माना जाता है। वहीं, प्रतिपदा तिथि को जिनकी मृत्यु हुई हो, उनका श्राद्ध इस दिन किया जाता है। नाना-नानी के परिवार में जिनकी मृत्यु तिथि मालूम नहीं है, उनका श्राद्ध भी इस दिन किया जा सकता है। फिर द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी पर मृत्यु होने वाले लोगों का श्राद्ध किया जाता है। इसके अलावा पंचमी पर वैसे अविवाहित व्यक्तियों का श्राद्ध कर सकते हैं, जिनकी तिथि मालूम नहीं है। पितृ पक्ष पर एकादशी का दिन खास होता है। इस तिथि पर मृत्यु वाले लोगों के साथ मृत संन्यासियों का श्राद्ध भी इस दिन किया जाता है। जबकि त्रयोदशी पर छोटे बच्चे या शिशु की मृत्यु होने पर उनका श्राद्ध इस तिथि को करने का विधान बताया गया है। अमावस्या पितृ पक्ष का अंतिम दिन माना जाता है। इस दिन उन सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु तिथि मालूम नहीं है। यदि किसी कारण से पितृ पक्ष में किसी पितर का श्राद्ध नहीं हो पाया हो, तो सर्वपितृ अमावस्या पर भी उनका श्राद्ध किया जा सकता है।

ध्यान रखें… इन 15 दिनों की अवधि में मन, कर्म और वचन से सात्विकता और ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए रोजाना कुशा और काले तिल के जल से पितरों का नियमित तर्पण करना चाहिए। किसी ब्राह्मण को घर बुलाकर सम्मान के साथ सात्विक भोजन कराएं और अपनी क्षमता के हिसाब से अनाज, कपड़े या दक्षिणा का दान करें। इस दौरान घर के दरवाजे पर आए किसी भी पशु, पक्षी या असहाय व्यक्ति को खाली हाथ न लौटाएं। मान्यता है कि पितर किसी भी रूप में आ सकते हैं और आशीर्वाद दे सकते हैं।

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