आमलकी एकादशी : भगवान विष्णु के साथ आज आंवले के पेड़ और मां अन्नपूर्णा की पूजा करें

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सूरत। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आमलकी एकादशी भी कहा जाता है। हिंदू धर्म में इसका विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि एकादशी व्रत भगवान विष्णु की कृपा पाने का सबसे सरल मार्ग है। इसलिए आमलकी एकादशी को भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। आज आंवले के पेड़ और मां अन्नपूर्णा की पूजा विशेष तौर पर की जाती है। इस व्रत में भगवान विष्णु को आंवला अर्पित किया जाता है और प्रसाद के स्वरूप में खुद भी आंवला ग्रहण करना चाहिए। ये अत्यंत शुभ और सभी पापों का नाश करने वाला माना जाता है। यह आमलकी एकादशी होली से ठीक पहले आती है, इसलिए इस एकादशी को रंगभरी या रंगभरनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पंचांग के अनुसार, फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि मध्यरात्रि 12:33 बजे शुरू होकर 27 फरवरी की रात 10:32 बजे तक रहेगी। ऐसे में साल 2026 में यह व्रत आज रखा जाएगा। उदय तिथि के अनुसार इसी दिन व्रत मान्य रहेगा। पारण 28 फरवरी की सुबह कर सकते हैं। 

आमलकी एकादशी का व्रत इसलिए श्रेष्ठ है…

पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने बताया है कि कि जो मोक्ष प्राप्ति की कामना रखते हैं, उनके लिए आमलकी एकादशी का व्रत अत्यंत श्रेष्ठ है। इस व्रत को करने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है। यह एकादशी समस्त यज्ञों को करने से भी अधिक फल देने वाली है। वहीं, माता पार्वती से विवाह के बाद भगवान शिव पहली बार इस दिन काशी नगरी आए थे। इसलिए आज के दिन काशी में भव्य आयोजन होता है। 

सृष्टि के साथ जुड़ा है आंवले का वृक्ष

आमलकी एकादशी के दिन आंवले के वृक्ष की पूजा का विधान है। माना जाता है कि इसी दिन सृष्टि के आरंभ में आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति हुई थी। पुराणों में ऐसा उल्लेख है कि भगवान विष्णु के मुख से चन्द्रमा के समान कांतिमान एक बिंदु पृथ्वी पर गिरा, उसी से आमलकी (आंवला) का महान दिव्य वृक्ष उत्पन्न हुआ। 

इस दिन मां अन्नपूर्णा की भी विशेष पूजा करनी चाहिए

आज के दिन मां अन्नपूर्णा की भी विशेष पूजा करनी चाहिए। मां अन्नपूर्णा की कृपा से घर-परिवार में अन्न और धन की कभी कमी नहीं होती है। साथ ही, इस दिन संकल्प लेना चाहिए कि कभी भी अन्न का अनादर नहीं करेंगे। जूठा भोजन नहीं छोड़ेंगे। मान्यता है कि अन्न का सम्मान करने से देवी अन्नपूर्णा प्रसन्न होती हैं। सुबह उठकर नहाने के बाद भगवान सूर्य को अर्घ्य अर्पित करें। इसके लिए तांबे के लोटे से जल भरें। जल में कुमकुम, चावल डालें और ऊं सूर्याय नम: मंत्र का जप करते हुए सूर्य को चढ़ाएं। एकादशी पर घर के मंदिर में सबसे पहले गणेश जी की पूजा करें। गणेश पूजा के बाद भगवान विष्णु और महालक्ष्मी की पूजा करने का और व्रत करने का संकल्प लें।

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