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गुजरात: सियासत के नए 'सुल्तान' बने विश्वकर्मा! निर्विरोध जीत के मामले में पाटिल को भी छोड़ा पीछे
गुजरात में स्थानीय स्वराज की चुनावों में फॉर्म वापस लेने की तारीख 15 अप्रैल थी। तब भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जगदीश विश्वकर्मा ने घोषणा की कि भारतीय जनता पार्टी के इतिहास में पहली बार लगभग 700 सीटें निर्विरोध आई हैं। ऐसा पहली बार हुआ है। इस तरह उन्होंने दावा किया कि उन्होंने पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और वर्तमान केंद्रीय जल संसाधन मंत्री सी.आर. पाटिल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है।
विश्वकर्मा ने एक भाषण में कहा कि फॉर्म वापस लेने के अंतिम दिन गुजरात में पार्टी के इतिहास में एक रिकॉर्ड बना है। भाजपा ने 700 उम्मीदवारों को निर्विरोध जिताया है। इस तरह विश्वकर्मा ने अपनी पहली ही चुनाव में यानी पहले ही प्रयास में छक्का मारने जैसा दावा किया है। क्या यह दावा सही है?

पिछली स्थानीय स्वराज की चुनाव वर्ष 2021 में हुई थीं, तब सी.आर. पाटिल प्रदेश अध्यक्ष थे। उस समय कुल 221 उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए थे, जिनमें से 220 भारतीय जनता पार्टी के थे। इस तरह विश्वकर्मा की पहली पारी का रिकॉर्ड पाटिल से बेहतर दिखाई दे रहा है।
भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता डॉ. अनिल पटेल ने कहा कि फिलहाल संख्या 700 है, लेकिन निर्विरोध सीटें इससे भी बढ़ सकती हैं। उनसे पूछा गया कि ये सीटें किन क्षेत्रों और किन चुनावों की हैं, तो उन्होंने कहा कि अभी ब्रेकअप आने में थोड़ा समय लगेगा।

गुजरात में कुल वर्तमान में 404 स्थानीय संस्थाओं के लिए चुनाव हो रहे हैं, जिनमें लगभग 10,005 सीटें शामिल हैं। इनमें 15 म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन, 84 नगरपालिकाएं, 34 जिला पंचायत और 260 तालुका पंचायत शामिल हैं।
चुनाव के लिए कुल 32 हजार से अधिक नामांकन फॉर्म भरे गए, जिनमें से लगभग 26 हजार उम्मीदवार अंतिम दौड़ में रहे, जबकि 1,500 से अधिक उम्मीदवारों ने नाम वापस ले लिया। इस बड़े पैमाने पर नाम वापस लेने के कारण ही निर्विरोध जीत का आंकड़ा बढ़ा है, ऐसा माना जा रहा है।
राज्य में निर्विरोध जीत का सबसे बड़ा प्रभाव सूरत सहित दक्षिण गुजरात में देखा गया है। नवसारी और वलसाड जैसे जिलों में भी कई सीटों पर विपक्षी उम्मीदवार नहीं मिले। मध्य गुजरात में अहमदाबाद और वडोदरा जैसे शहरों में कुछ सीटों पर सीधी टक्कर देखने को मिल रही है, जबकि सौराष्ट्र और उत्तर गुजरात में स्थिति थोड़ी अलग है, जहां अभी भी भाजपा, कांग्रेस और स्थानीय उम्मीदवारों के बीच सीधी टक्कर देखी जा रही है।

इस चुनाव में सबसे बड़ा विवाद कांग्रेस द्वारा लगाए गए आरोपों का है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि उनके उम्मीदवारों को दबाव में नाम वापस लेने पर मजबूर किया गया या उनका “अपहरण” किया गया। भाजपा ने इन सभी आरोपों को खारिज कर दिया है और इसे राजनीतिक प्रचार बताया है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस चुनाव में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब जीत केवल मतदान के दिन तय नहीं होती, बल्कि नामांकन प्रक्रिया के दौरान ही परिणाम का बड़ा हिस्सा तय हो जाता है। भाजपा ने अपने मजबूत संगठन और बूथ स्तर के नेटवर्क के आधार पर कई क्षेत्रों में विपक्ष को चुनौती देने में सफलता हासिल की है। दूसरी ओर, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के लिए उम्मीदवार खड़े करना और उन्हें बनाए रखना बड़ी चुनौती बन रहा है। एबीपी अस्मिता के रोनक पटेल तो कहते हैं कि उन्होंने आज तक इतनी खराब चुनाव नहीं देखी।
2021 की स्थानीय चुनाव में लगभग 220 उम्मीदवार निर्विरोध जीते थे, जबकि 2026 में यह आंकड़ा बढ़कर 700 तक पहुंच गया है। इससे स्पष्ट होता है कि प्रतिस्पर्धा घट रही है और चुनाव अधिक एकतरफा होते जा रहे हैं।

