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अमेरिका-ईरान के बीच सक्रिय मध्यस्थता न करने का भारत का निर्णय बिल्कुल सही है
(उत्कर्ष पटेल)
अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध जैसे तनावपूर्ण समीकरण के संदर्भ में भारत द्वारा सक्रिय मध्यस्थ की भूमिका न निभाने का निर्णय पूरी तरह से उचित और व्यावहारिक है। यह निर्णय भारत की विदेश नीति और कूटनीति के मूल सिद्धांतों के अनुरूप है, जो देश के आर्थिक हितों को सर्वोपरि मानता है। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में, जब भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब अन्य देशों के विवादों में पड़ने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देना ही सही दृष्टिकोण है।

भारत की विदेश नीति का आधार ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ और ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ है। इस सिद्धांत के तहत भारत किसी एक शक्ति के प्रभाव में आए बिना सभी प्रमुख देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखता है। अमेरिका के साथ भारत के संबंध आज व्यापार, विशेषकर तकनीक और सुरक्षा के क्षेत्र में, अभूतपूर्व स्तर पर हैं। 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका के साथ भारत का व्यापार 190 अरब डॉलर से अधिक है, जिसमें IT सेवाओं, फार्मा और ऊर्जा क्षेत्र का बड़ा योगदान है। दूसरी ओर, ईरान के साथ भी ऊर्जा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण व्यापारिक संबंध हैं। चाबहार पोर्ट परियोजना के माध्यम से भारत को मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंच का मार्ग मिलता है, जो आयात-निर्यात को आसान बनाता है। यदि भारत अमेरिका-ईरान विवाद में सक्रिय मध्यस्थता करता, तो इन दोनों संबंधों में दरार पड़ सकती थी। तटस्थ रहकर भारत ने अपनी आर्थिक और व्यापारिक स्थिरता बनाए रखी है।

जब कोई देश प्रगति की दिशा में आगे बढ़ रहा हो, तब विदेशी विवादों में उलझना आत्मघाती कदम हो सकता है। वर्तमान सरकार के दौरान भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। GDP वृद्धि दर 7 प्रतिशत से अधिक है, विदेशी निवेश (FDI) बढ़ रहा है और ‘मेक इन इंडिया’ के माध्यम से विनिर्माण क्षेत्र मजबूत हो रहा है। ऐसी स्थिति में अन्य देशों के राजनीतिक या युद्ध संबंधी विवादों में सक्रिय भागीदारी से देश के आर्थिक लक्ष्यों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। किसी एक पक्ष का समर्थन करने से तेल आयात प्रभावित हो सकता है, जिससे महंगाई बढ़ेगी और उद्योगों को नुकसान होगा। इसलिए ‘अपने हितों की रक्षा’ का दृष्टिकोण पूरी तरह सही है। इसी नीति के कारण भारत रूस-यूक्रेन संकट के दौरान भी तटस्थ रहा और सस्ते तेल आयात से अर्थव्यवस्था को लाभ मिला।
वैश्विक शांति और मानवता के हित में कार्य करना भारत की राष्ट्रीय नीति का अभिन्न हिस्सा है। यह नीति दीर्घकाल में देश के लिए लाभकारी सिद्ध होगी। भारत ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सिद्धांत का पालन करते हुए G20 में विकासशील देशों के हितों को प्रमुखता दी। इस नीति के कारण भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला है और व्यापार एवं निवेश के नए अवसर खुले हैं। वैश्विक शांति के प्रयासों में सक्रिय रहना, लेकिन किसी विवाद का पक्षकार न बनना—यही संतुलित दृष्टिकोण भारत को आर्थिक रूप से सशक्त बनाएगा।

विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वैश्विक नेताओं के बीच स्वीकार्यता इस समीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। विभिन्न विश्व नेताओं के साथ उनके व्यक्तिगत संबंधों के कारण भारत को QUAD, I2U2, IMEC जैसे रणनीतिक मंचों पर अग्रणी स्थान मिला है। अमेरिका के राष्ट्रपति के साथ संवाद से तकनीकी सहयोग और निवेश बढ़ा है, जबकि मध्य पूर्व देशों के साथ संबंधों ने ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स क्षेत्रों में नई संभावनाएं खोली हैं। इस कूटनीति के कारण भारत आज किसी एक पक्ष का आश्रित नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र और मजबूत भागीदार है।

यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि अमेरिका-ईरान मुद्दे पर भारत की तटस्थता कोई कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी परिपक्व विदेश नीति का परिचायक है। यह नीति देश को आर्थिक प्रगति की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ाती है, वैश्विक शांति में योगदान देती है और मानवता के हितों की रक्षा करती है। जब भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर है, तब ऐसी व्यावहारिक और हित-केंद्रित विदेश नीति ही उसे सफलता के शिखर तक पहुंचाएगी। यही दृष्टिकोण भारत को वैश्विक मंच पर सम्मान और आर्थिक समृद्धि दिलाएगा।
(लेखक एक प्रतिष्ठित उद्योगपति, समाजसेवी और khabarchhe.com के संस्थापक हैं।)

