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भागवत ने फिर दोहराया- हिंदू समाज में एकता की कमी है, यही बार-बार गुलामी की वजह… क्या वाकई ऐसा है?
कहा- हेडगेवार ने एक मजबूत राष्ट्र निर्माण के लिए आरएसएस की स्थापना की
निजामाबाद। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा तैयार की गई संघ की प्रार्थना केवल एक औपचारिक पाठ नहीं है, बल्कि यह उन मूलभूत गुणों को अभिव्यक्त करती है, जिनकी आवश्यकता एक सशक्त और आत्मनिर्भर राष्ट्र के निर्माण के लिए होती है। उन्होंने बताया कि इस प्रार्थना में अनुशासन, त्याग, समर्पण और राष्ट्रभक्ति जैसे गुणों का समावेश है, जो समाज को संगठित और सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भागवत के अनुसार, हेडगेवार का मानना था कि भारत को बार-बार विदेशी शासकों के सामने पराजित होना पड़ा, और इसके पीछे केवल बाहरी ताकतें ही जिम्मेदार नहीं थीं, बल्कि हमारी अपनी कुछ आंतरिक कमजोरियां भी थीं। हिंदुओं के बीच फूट और एकता की कमी आज भी बरकरार है। इसे दूर करना होगा। दुनिया में फिर से अशांति फैल रही है। ऐसे में हिंदुओं की एकजुटता बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि इन कमियों को पहचानना और उन्हें दूर करना ही सच्चे राष्ट्रनिर्माण की दिशा में पहला कदम होगा।
सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी सशक्त होना आवश्यक
भागवत ने कहा कि हेडगेवार का स्पष्ट दृष्टिकोण था कि यदि समाज अपनी कमजोरियों को दूर नहीं करता, तो स्वतंत्रता के लिए संघर्ष बार-बार दोहराना पड़ेगा। उनका मानना था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी सशक्त होना आवश्यक है।
राष्ट्र की मजबूती एकता में निहित है
भागवत ने कहा कि हेडगेवार ने इस बात को गहराई से समझा था कि राष्ट्र की मजबूती उसके नागरिकों के चरित्र, एकता और संगठन में निहित होती है। इसलिए उन्होंने एक ऐसे संगठन की कल्पना की, जो लोगों में इन मूल्यों को विकसित कर सके और समाज को एकजुट कर सके।
हेडगेवार ने समाज को अंदर से मजबूत किया
दूसरे नेताओं ने चुने अलग रास्ते, हेडगेवार ने लिया अलग संकल्प
भागवत ने बताया कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में कई नेताओं ने अपने-अपने तरीके से देश की आजादी के लिए कार्य किया। हर किसी का दृष्टिकोण और कार्यशैली अलग थी। लेकिन हेडगेवार ने एक अलग मार्ग अपनाया। उन्होंने कहा कि जहां अन्य नेता तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय थे, वहीं हेडगेवार ने दीर्घकालिक दृष्टि अपनाई। उन्होंने यह जिम्मेदारी अपने ऊपर ली कि समाज को अंदर से मजबूत किया जाए, ताकि भविष्य में कोई भी बाहरी शक्ति भारत को कमजोर न कर सके। भागवत ने कहा- यह निर्णय आसान नहीं था, लेकिन हेडगेवार ने इसे अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। उन्होंने युवाओं को संगठित करने, उनमें राष्ट्रभक्ति की भावना विकसित करने और समाज को एकजुट करने के लिए निरंतर प्रयास किए।
आरएसएस का उद्देश्य किसी पर प्रहार करना नहीं
भागवत ने कहा कि इसी सोच और जिम्मेदारी की भावना से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ की स्थापना किसी विशेष व्यक्ति, समुदाय या विचारधारा के विरोध में नहीं की गई थी। उन्होंने कहा कि आरएसएस का उद्देश्य किसी पर प्रहार करना नहीं था, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा किए जा रहे कार्यों को एक दिशा देना और उन्हें पूर्णता तक पहुंचाना था। यह एक ऐसा मंच था, जो लोगों को जोड़ने और उन्हें एक साझा उद्देश्य के लिए प्रेरित करने का कार्य करता है।
आरएसएस का उद्देश्य- सशक्त राष्ट्र का निर्माण हो
मोहन भागवत ने कहा कि संघ की स्थापना का मूल उद्देश्य मातृभूमि को गुलामी से मुक्त कराना था। यह केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था, बल्कि एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण करना था, जो हर दृष्टि से आत्मनिर्भर और सशक्त हो। उन्होंने कहा कि आरएसएस ने अपने कार्यों के माध्यम से समाज में जागरूकता फैलाने, लोगों को संगठित करने और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का भाव विकसित करने का प्रयास किया है। उन्होंने कहा, संघ आज भी उसी मूल भावना के साथ कार्य कर रहा है, जिसके साथ उसकी स्थापना हुई थी। उन्होंने कहा कि समय के साथ परिस्थितियां बदलती हैं, लेकिन संगठन के मूल उद्देश्य और मूल्य स्थिर रहते हैं।
संघ की प्रार्थना का मतलब भी भागवत ने समझाया
अपने संबोधन में भागवत ने यह भी कहा कि संघ की प्रार्थना संगठन के दर्शन और उद्देश्य को स्पष्ट रूप से व्यक्त करती है। इसमें न केवल व्यक्तिगत विकास की बात है, बल्कि सामूहिक उत्थान और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने का संदेश भी दिया गया है। उन्होंने कहा कि यह प्रार्थना स्वयंसेवकों को निरंतर प्रेरित करती है कि वे अपने जीवन में अनुशासन, निष्ठा और सेवा भाव को अपनाएं। यही गुण एक मजबूत समाज और सशक्त राष्ट्र के निर्माण में सहायक होते हैं।
इस प्रकार, भागवत ने हेडगेवार के विचारों और संघ की स्थापना के पीछे की भावना को रेखांकित करते हुए कहा कि राष्ट्रनिर्माण के लिए केवल बाहरी प्रयास नहीं, बल्कि आंतरिक सुधार और संगठन की शक्ति भी उतनी ही आवश्यक है।

