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करसनभाई पटेल: सिर्फ़ एक बिज़नेसमैन नहीं, बल्कि गुजरात के हज़ारों युवाओं के लिए प्रेरणा का एक अमर स्तंभ
(उत्कर्ष पटेल)
1945 में गुजरात के मेहसाणा ज़िले के एक छोटे से गाँव रूपपुर में जन्मे करसनभाई खोड़ीदास पटेल आज सिर्फ़ एक बिज़नेसमैन ही नहीं, बल्कि गुजरात के हज़ारों युवाओं के लिए प्रेरणा का एक अमर स्तंभ हैं। उनका जीवन दर्द, संघर्ष और अटूट मेहनत की एक ऐसी यात्रा है जो दिल को छू जाती है। एक साधारण लैब टेक्नीशियन के तौर पर शुरुआत करके, इस इंसान ने 'निरमा' जैसा अरबों डॉलर का साम्राज्य खड़ा किया; वे गुजरात का सच्चा गौरव हैं, जिन्होंने अपनी बेटी की अमर याद को अपने बिज़नेस में ज़िंदा रखा और समाज को कई गुना ज़्यादा वापस दिया।
करसनभाई का बचपन खेतों की मिट्टी में बीता। परिवार में पढ़ाई-लिखाई को लेकर काफ़ी जुनून था। उन्होंने साइंस स्ट्रीम चुनी और केमिस्ट्री में B.Sc. की डिग्री हासिल की। 21 साल की उम्र में, उन्हें अहमदाबाद की 'न्यू कॉटन मिल्स' की लैब में नौकरी मिल गई। इसके बाद, उन्हें सरकारी खदान विभाग में एक पक्की नौकरी मिल गई। यह पूरे परिवार का सपना था: एक सरकारी नौकरी, एक सुरक्षित जीवन। लेकिन करसनभाई के दिल में कुछ बड़ा करने की एक गहरी चाह थी। उन्होंने अपना कुछ अलग खड़ा करने का सपना देखा था।
1969 में, उनके जीवन का सबसे दर्दनाक दौर शुरू हुआ। उनकी प्यारी बेटी निरुपमा, जिसे प्यार से 'निरमा' कहा जाता था, एक सड़क दुर्घटना में गुज़र गई। सिर्फ़ 16 साल की वह हँसमुख लड़की, जो अक्सर सफ़ेद फ्रॉक पहनकर घर में घूमती रहती थी, अपनी खिलखिलाहट से पूरे घर को खुशियों का बाग़ बना देती थी। जब वह बच्ची भगवान को प्यारी हो गई, तो करसनभाई का दिल टूट गया। घर में एक गहरा सन्नाटा छा गया, लेकिन इस दर्द ने उन्हें टूटने नहीं दिया। अपनी बेटी को एक नया जीवन देने के लिए, उन्होंने 'निरमा' को अमर बनाने का फ़ैसला किया। उन्होंने अपनी प्यारी बेटी की याद को हर घर में ज़िंदा रखने का सपना देखा!

घर के ही एक छोटे से 10x10 फ़ीट के कमरे में, उन्होंने रात के समय डिटर्जेंट पाउडर बनाना शुरू किया। यह पाउडर फ़ॉस्फ़ेट-मुक्त, पर्यावरण के अनुकूल और बेहद सस्ता था। सुबह होते ही, वे इस पाउडर को अपनी साइकिल पर लादकर घर-घर जाकर बेचते थे। इसकी कीमत महज़ 3.50 रुपये प्रति किलो थी! उस समय, मल्टीनेशनल कंपनियों का पाउडर 15 रुपये में बिकता था। लोग हैरान रह जाते थे... इतना अच्छा और इतना सस्ता? उन्होंने अपनी बेटी के प्यार में इस पाउडर का नाम 'निरमा' रखा। पैकेट पर मुस्कुराती हुई वह निरमा लड़की उनकी बेटी निरुपमा की ही छवि थी। उनकी बेटी की आत्मा उसकी हंसी में जीवित थी। हर पैकेट बेचते समय, करसनभाई की आँखों में आँसू और उम्मीद होती थी, "मेरी बेटी अब हर घर में रहेगी।"
साइकिल पर शुरू हुआ यह सफर तीन साल तक चला। रोज़ाना सिर्फ 15 से 20 पैकेट ही बिकते थे। परिवार में कोई व्यवसायी नहीं था, इसलिए असफलता का डर हमेशा बना रहता था। लेकिन एक गुजराती किसान की उद्यमी भावना उनके खून में थी। 1972 में, उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी। उन्होंने अहमदाबाद में छोटे स्तर पर शुरुआत की। रेडियो पर जिंगल बजने लगा, "वॉशिंग पाउडर निरमा, दूध सी सफेदी निरमा" यह जिंगल सिर्फ एक गाना नहीं था, यह उनके दिल की भावना थी। यह ब्रांड निरुपमा की यादों के साथ गुजरात से पूरे देश में फैल गया। 1980 के दशक में, यह भारत का नंबर 1 डिटर्जेंट बन गया। यहाँ तक कि मल्टीनेशनल कंपनियाँ भी इसके आगे फीकी पड़ गईं।
आज, निरमा ग्रुप के पास लगभग 26 फैक्ट्रियाँ, हज़ारों कर्मचारी और अरबों का कारोबार है। निरमा का नाम डिटर्जेंट, साबुन, कॉस्मेटिक्स, सीमेंट और फार्मा के क्षेत्र में शुमार है। लेकिन करसनभाई ने कभी भी विलासितापूर्ण जीवन नहीं जिया। वह आज भी सादगी से रहते हैं। वह अपने परिवार के साथ मिलकर कारोबार चलाते हैं। उनका मानना है कि "सफलता तभी सच्ची होती है, जब वह दूसरों को भी ऊपर उठाती है।"

समाज में योगदान उनके जीवन का सबसे बड़ा अध्याय है। 1994 में, उन्होंने 'निरमा एजुकेशन एंड रिसर्च फाउंडेशन' की स्थापना की। 1995 में 'निरमा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी' की शुरुआत हुई। आज, निरमा यूनिवर्सिटी में टेक्नोलॉजी, मैनेजमेंट, कानून और फार्मेसी के क्षेत्रों में हज़ारों छात्र शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। उन्होंने युवाओं को उद्यमी बनाने के लिए भी प्रयास किए। उन्होंने गुजरात में उच्च शिक्षा की एक नई मशाल जलाई।
करसनभाई को पद्म श्री (2010), उद्योग रत्न और अर्न्स्ट एंड यंग लाइफटाइम अचीवमेंट जैसे कई सम्मानों से नवाज़ा गया है। अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने भी उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की है। लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान यह है कि हर गुजराती के दिल में उनकी एक खास जगह है। वे गुजरात का गौरव हैं, क्योंकि उन्होंने यह दिखाया है कि गुजराती स्वभाव, कड़ी मेहनत, साहस और समाज सेवा किस तरह किसी व्यक्ति को समाज की सेवा करने का अवसर प्रदान करते हैं।
करसनभाई पटेल का जीवन हमें यह सिखाता है कि दुख भी सपनों का रूप ले सकता है। जब उन्होंने अपनी बेटी की याद में 'निरमा' की स्थापना की, तो उन्होंने न केवल एक व्यवसाय खड़ा किया, बल्कि प्रेम का एक साम्राज्य भी रचा। साइकिल पर बिकने वाला 'निरमा' आज हर घर में मौजूद है, और उसके साथ ही, निरुपमा की हँसी भी। करसनभाई का व्यक्तित्व गुजरात के हर युवा से यह कहता है, "अपने दिल के प्रेम को एक सपना बना लो, सफलता तुम्हें निश्चित रूप से मिलेगी।"
(लेखक एक प्रतिष्ठित उद्योगपति, समाजसेवी और khabarchhe.com के संस्थापक हैं।)

