मिलावट और भ्रष्टाचार मिलकर गुजरात को बर्बाद करने पर तुले हैं

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हमारा गुजरात, जिसे हम सभी गुजराती अपनी ‘कर्मभूमि’ कहते हैं, जहां मेहनत के पसीने की एक बूंद भी हीरा और सोना बन जाती है। आज इसी धरती पर दो अदृश्य समस्याएं धीरे-धीरे उसकी आत्मा को खोखला कर रही हैं। एक है खाद्य पदार्थों में मिलावट और दूसरी है सरकारी दफ्तरों में भ्रष्टाचार। ये दोनों एक-दूसरे के मजबूत साथी हैं। एक हमारे शरीर को ज़हरीला बनाता है तो दूसरा हमारी आत्मा को खा जाता है। आज हम नागरिक और सरकार दोनों ही इस समय लाचारी के गवाह बन गए हैं।

यदि हम विचार करें तो पहला सवाल उठता है: हम क्या खा रहे हैं? दूध में यूरिया, घी में वनस्पति, पनीर में प्लास्टिक की मिलावट… यह सब केवल केमिकल्स नहीं हैं, यह तो हमारे विश्वास की हत्या है। जब एक माँ अपने बच्चे को दूध देती है तो क्या उसे पता होता है कि उस दूध में कैसा ज़हर है? जब एक किसान अपनी मेहनत का अनाज बेचता है तो क्या उसे पता होता है कि उसके अनाज में किस तरह के कीटनाशक मिलेंगे? यह मिलावट केवल स्वास्थ्य का सवाल नहीं है, यह तो हमारे अस्तित्व का प्रश्न है। आज गुजरात की प्रसिद्ध ‘मिठाई’ और ‘फरसाण’ पर भी भरोसा नहीं रहा। जब हम त्योहारों में मिठाई के डिब्बे खोलते हैं तो मन में एक अनजाना डर और शंका होती है—क्या यह सच में शुद्ध है या नहीं? यही डर और शंका हमारी लाचारी है।

और भ्रष्टाचार? यह तो हमारी सामाजिक व्यवस्था का कैंसर है। जब एक सामान्य व्यक्ति पुलिस शिकायत के लिए, पासपोर्ट के लिए, जमीन के रिकॉर्ड के लिए, लाइसेंस के लिए ‘स्पीड मनी’ यानी रिश्वत देता है, तो वह केवल पैसे नहीं देता, बल्कि अपना आत्मसम्मान भी बेच देता है। जब एक भ्रष्ट अधिकारी रिश्वत लेता है, तो वह केवल नौकरी नहीं करता, बल्कि राष्ट्र सेवा को वेश्यावृत्ति में बदल देता है। हमारी सरकारी व्यवस्थाओं में आज विजिलेंस के कानून हैं, डिजिटल प्लेटफॉर्म हैं, देखने में सब अच्छा लगता है, लेकिन अधिकांश अधिकारियों में नैतिकता का अभाव है। जब एक IAS अधिकारी भी इस भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाता है, तब समझ आता है कि यह समस्या उच्च अधिकारियों से लेकर चपरासी तक फैल चुकी है!

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चिंतन का सबसे गहरा पहलू यह है कि मिलावट और भ्रष्टाचार दोनों एक-दूसरे को पोषित करते हैं। भ्रष्ट अधिकारी मिलावट करने वालों को बचाते हैं और मिलावट करने वाले अधिकारियों को रिश्वत का हिस्सा देते हैं। यह एक दुष्चक्र है जिसमें आम नागरिक का जीवन उलझकर रह गया है। हम विकास की बातें करते हैं—हाईवे, स्मार्ट सिटी, इन्वेस्टमेंट समिट… लेकिन जब मूल में पारदर्शी विश्वास ही न हो तो यह विकास किस काम का? गुजरात के भीतर से उसकी आत्मा खोती जा रही है।

हमने क्या भूल किया? क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था ने केवल डिग्री देने का काम किया है, नैतिक जिम्मेदारियाँ और मूल्य नहीं? क्या हमारी संस्कृति, जिसमें ‘अतिथि देवो भव’ और ‘सत्यमेव जयते’ के मंत्र हैं, उन्हें हमने केवल कहने भर के वाक्य बना दिया है? सरदार, गांधीजी, और PM नरेंद्रभाई मोदी के गुजरात में आज यह स्थिति क्यों है? ये प्रश्न आज गुजरात के प्रत्येक नागरिक के मन में हैं, लेकिन इनका उत्तर किसी के पास नहीं है और इसका समाधान भी नहीं।

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यह चिंतन केवल निराशा के लिए नहीं है, बल्कि जागरूकता के लिए है। जब हर नागरिक अपने घर से शुद्धता की गारंटी की माँग करेगा, जब हर अधिकारी अपने व्यक्तित्व में सत्य का प्रतिबिंब देखेगा, तभी यह दुष्चक्र टूटेगा। सरकार को कड़ी कार्रवाई करनी होगी और नागरिकों को भ्रष्ट अधिकारियों को उजागर करके मिलकर इस लाचारी से बाहर आना होगा, क्योंकि गुजरात की आत्मा अभी भी जीवित है—उसे केवल जगाने की जरूरत है।

यह चर्चा एक चेतावनी भी है और आशा की किरण भी। यदि हम आज चिंतन करेंगे, तो कल समाधान भी खोज लेंगे। यदि हम मिलावट और भ्रष्टाचार को नहीं रोकेंगे, तो हमारी आने वाली पीढ़ियों को भी यही विरासत में मिलेगा। सोचिए… और निश्चित कार्य कीजिए।

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