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अनियमित बारिश की चुनौती: खरीफ फसलों की सुरक्षा के लिए किसानों को क्या करना चाहिए
सूरत। सितंबर अब अंतिम चरण में है और खरीफ सीजन भी अब निर्णायक चरण में पहुंच गया है। फिर भी, दीर्घकालिक औसत की तुलना में लगभग 43.77% कम बारिश सौराष्ट्र, कच्छ और उत्तर गुजरात के किसानों के लिए चिंता का विषय बन गई है। खेती वाले इन क्षेत्रों में खरीफ सीजन के दौरान बारिश का समय और उसका वितरण फसल की उपज के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इस वर्ष इन क्षेत्रों में बारिश का पैटर्न असमान और अनियमित रहा है, जिसके कारण यहां की फसलों पर असर देखने को मिल रहा है। इस प्रकार के उतार-चढ़ाव कपास, मूंगफली और सोयाबीन जैसी प्रमुख खरीफ फसलों के लिए नई चुनौतियां पैदा कर सकते हैं।
अब खरीफ सीजन के इस महत्वपूर्ण चरण में किसानों का ध्यान उपज की गुणवत्ता बढ़ाने पर होना चाहिए। किसानों को फसल में पानी और मिट्टी में नमी की उपलब्धता जानने के लिए अपने खेतों का नियमित निरीक्षण करना चाहिए। इसके बाद का कदम फसल की वर्तमान स्थिति और मिट्टी में उपलब्ध नमी के आधार पर समय पर प्रबंधन करना है। किसानों को मिट्टी में नमी का स्तर, खेत से पानी की निकासी, कीटों की मौजूदगी और रोगों के शुरुआती लक्षणों पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत है, जो कम बारिश के कारण आसानी से उत्पन्न हो सकते हैं। किसानों को सप्ताह में दो बार अपने खेतों का दौरा करना चाहिए, ताकि पत्तियों, कलियों या टिंडों (bolls) पर दिखाई देने वाले किसी भी असामान्य लक्षण को तुरंत पहचाना जा सके और उस पर कार्रवाई की जा सके।
बदलते मौसम और नमी के स्तर में होने वाले उतार-चढ़ाव के कारण कपास की फसल में कीटों और रोगों का जोखिम बढ़ सकता है। कपास की फसल अब टिंडा बनने के चरण में पहुंच गई है, जब ध्यान केवल कीटों के नियंत्रण से हटाकर मौजूदा टिंडों की सुरक्षा और कीटों की आबादी बढ़ने से रोकने पर होना चाहिए, ताकि उच्च गुणवत्ता वाली उपज सुनिश्चित की जा सके। किसानों को सबसे पहले मल्चिंग और खेती की अन्य उपलब्ध विधियों के माध्यम से मिट्टी में मौजूद नमी को बनाए रखते हुए नमी प्रबंधन पर ध्यान देना चाहिए। हालांकि, बहुत अधिक सिंचाई भी समस्याएं पैदा कर सकती है, क्योंकि नमी की स्थिति में अचानक बदलाव फसल पर तनाव पैदा कर सकता है। इस चरण में किसानों के लिए दूसरा महत्वपूर्ण कदम कीटों की निगरानी बढ़ाना और पौधों के पोषण की रक्षा करना है। बिना सोचे-समझे उर्वरक डालने से बचना चाहिए; पोषक तत्वों का प्रबंधन मिट्टी और फसल की जरूरतों के आधार पर किया जाना चाहिए।
असमान मौसम की परिस्थितियों के कारण सोयाबीन की फसल में भी कीटों और रोगों का प्रबंधन चुनौतीपूर्ण हो सकता है। मूंगफली की फसल के लिए खेत में अत्यधिक नमी और जलभराव से जड़ों के सड़ने और अन्य रोगों का जोखिम बढ़ सकता है; इसलिए, खेत से पानी की उचित निकासी बनाए रखना भी बहुत जरूरी है। कम बारिश वाले क्षेत्रों में मिट्टी में मौजूद नमी का उचित उपयोग और फसल की जरूरत के अनुसार सिंचाई करना बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।
आज के समय में फसल संरक्षण की पद्धति केवल कीटनाशकों के उपयोग तक सीमित नहीं होनी चाहिए; इसके बजाय, एक ऐसी एकीकृत फसल प्रबंधन रणनीति अपनाना अधिक प्रभावी साबित हो सकता है, जिसमें खेत का निरीक्षण, संतुलित पोषण, पानी का उचित प्रबंधन, समय पर खरपतवार नियंत्रण और आवश्यकता के अनुसार वैज्ञानिक फसल संरक्षण के उपायों को शामिल किया जाए। इसके अलावा, बदलते मौसम के बीच किसानों के लिए स्थानीय कृषि विशेषज्ञों और विश्वसनीय सलाह देने वाले स्रोतों से समय पर जानकारी प्राप्त करना भी उतना ही जरूरी है। हालांकि मौसम के अनिश्चित व्यवहार को पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता, लेकिन वैज्ञानिक जानकारी, फसल का नियमित निरीक्षण और समय पर प्रबंधन के माध्यम से इसके प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
खरीफ सीजन के इस महत्वपूर्ण चरण में सौराष्ट्र, कच्छ और उत्तर गुजरात के किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि वे मिट्टी और फसल की वर्तमान स्थिति को ध्यान में रखते हुए फसल की उपज और गुणवत्ता पर ध्यान दें। खेत की स्थिति को समझकर समय पर निर्णय लेना बहुत जरूरी है। यह दृष्टिकोण फसल की गुणवत्ता और उपज बनाए रखने के अलावा संभावित नुकसान को कम करने में भी मदद कर सकता है।
लेखक: डॉ. आर.जी. अग्रवाल, चेयरमैन एमेरिटस, धानुका एग्रीटेक लिमिटेड

