कम बारिश से चिंतित किसान 'सद्भावना बैल आश्रम' में छोड़ रहे हैं अपने बैल, 8 ही दिनों में 1000 के करीब बैलों की बढ़ोतरी हुई, रोने...

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इस साल मानसून कमजोर रहा है, जिसके कारण किसान परेशान हैं। किसानों की फसल बर्बाद होने की भी आशंका जताई जा रही है। इस दौरान किसानों के साथ-साथ पशुओं की स्थिति भी दयनीय बन रही है। किसान अब बैलों को भी आश्रम में छोड़ रहे हैं. राजकोट शहर से पश्चिम में 22 किलोमीटर दूर कालावड रोड पर खीरसरा गांव के पास स्थित 'सद्भावना बैल आश्रम' में पिछले करीब एक सप्ताह से पूरे दिन ऐसे भावुक दृश्य बन रहे हैं, जो हमें झकझोर देने वाले हैं। हर दिन बड़ी संख्या में किसान अपने बैल इस आश्रम को सौंप रहे हैं और नम आंखों से अपने गांव लौट रहे हैं।

BBC गुजराती की रिपोर्ट के मुताबिक, जामनगर जिले के जामजोधपुर तालुका के नरमाणा गांव से सुबह करीब नौ बजे 52 वर्षीय किसान चमनभाई अपने दो बैलों को एक खटारा में भरकर 65 किलोमीटर दूर स्थित 'सद्भावना बैल आश्रम' की ओर निकले थे। उनके दूर के भतीजे हितेशभाई अभंगी ने भी अपने दो बैल उसी खटारा में चढ़ा दिए थे। दोपहर करीब बारह बजे वे बैल आश्रम पहुंचे तब तक उमस भरे मौसम के कारण वातावरण बहुत गर्म हो गया था।

खटारा से बैल को नीचे उतारकर उसे खींचते-खींचते चमनभाई आश्रम के गेट के पास पहुंचे तो आश्रम के व्यवस्थापक विशालभाई मांगुकिया ने ‘ए आओ भगवान!’ कहकर उनका स्वागत किया और किसान तथा बैल दोनों को कंकु का चांदला किया। इसके बाद विशालभाई ने पूछा कि, ‘बैल को छोड़ने क्यों आना पड़ा? कितने साल से हांकते थे? अब नहीं संभल पा रहा, भगवान?’

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जवाब में चमनभाई ने पहले तो नकार में सिर हिलाया और फिर कहा कि, सात साल से मैं हांकता था और मैंने जिससे लिए थे उसने भी चार साल हांके थे। इसके मुंह में हाथ डालें तो भी काट न खाए ऐसे सीधे-सादे बैल हैं ये, इतना कहते ही चमनभाई 'गोरिया' बैल का सिर अपनी छाती से लगाकर रो पड़े। भादरवा महीने की गर्मी के कारण चमनभाई के सिर और माथे से पसीने की धारें बह रही थीं। उस पसीने में कंकु का तिलक घुल गया और चमनभाई की नाक से मानो खून टपक रहा हो ऐसा दृश्य दिखाई दिया. फिर सद्भावना बैल आश्रम' के दरवाजे पर अपने 'गोरिया' नाम के बैल को गले लगाकर रो पड़े। उन्होंने कहा कि कमजोर साल के कारण मुझे बैल छोड़ने आना पड़ा. चारे के अभाव और परिस्थिति कमजोर होने के कारण बाड़ी में कुछ नहीं बचा है; सब सूखकर सिकुड़ गया है... राख हो गया है। बारिश ही ऐसी नहीं हुई कि कुछ उग सके. खेतों में पानी नहीं है। मैं पिछले आठ साल से इस बैल को जान की तरह संभालता था, इसलिए अब दुख तो लगता ही है ना!

चमनभाई के पास 22 बीघा जमीन है और वे कहते हैं कि खेती के काम के लिए वे बैलों पर ही निर्भर थे. पिछले साल बेमौसम बारिश होने से नीरण खराब हो गई थी। इस साल बारिश न होने पर मैं नीरण खरीदकर अपने बैलों को खिला रहा था। मैंने बारिश का बहुत इंतजार किया, लेकिन वह नहीं आई। नीरण का खर्च 40 हजार रुपये से भी ज्यादा हो गया। मेरी भाभी कोरोना के बाद गंभीर रूप से बीमार हो गई थीं और उन्हें ठीक कराने में बहुत खर्च हो गया, भतीजा पढ़ता है और मां बिस्तर पर हैं। इसलिए अब खर्च संभाल पाना संभव नहीं है। इसलिए बैलों को आश्रम में छोड़ दिया।

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सोमवार शाम को चमनभाई की 12 बीघा जमीन में सोयाबीन की हरी-भरी फसल खड़ी थी, लेकिन सोयाबीन के पौधों में फलियां बहुत कम दिखाई दे रही थीं। चमनभाई कहते हैं कि, मैंने 3200 रुपये प्रति मन के हिसाब से 15 मन दाने खरीदकर मूंगफली बोई। सब मिलाकर करीब 60 हजार रुपये का खर्च हुआ, लेकिन बुवाई के बाद कई दिनों तक बारिश न होने से मूंगफली उगी नहीं और बीज बेकार हो गया। फिर थोड़ी बारिश होने पर मैंने 2400 रुपये के भाव से 18 मन सोयाबीन खरीदी और उसे बोया। लेकिन उसके बाद भी अच्छी बारिश नहीं हुई। मेरे बोर में पानी नहीं है, इसलिए मैं सिंचाई नहीं कर सका और नमी के अभाव में फसल में फूल या फलियां नहीं लगीं। दो दिन पहले थोड़ी बारिश होने से यह सोयाबीन की फसल हरी हुई है, लेकिन अब फूल आने का समय पूरा हो गया है। इसलिए, इस बारिश का इस फसल को कोई खास फायदा नहीं है। अगर ज्यादा बारिश आए और सर्दियों की फसल के लिए पानी हो तो ही काम का है।

चमनभाई की वाड़ी की मेड़ पर जिस नीम के पेड़ के नीचे वे बैल बांधते थे, वहां सोमवार शाम उनके बैल का ताजा गोबर और उसे बांधने के लिए रस्सियां पड़ी थीं। राजकोट से लौटकर चमनभाई ने अपने बैल की रास और सांतीनाड़ु (सांती को धोंसरा के साथ बांधने वाली रस्सी) दूर स्थित एक नीम के पेड़ पर टांग दीं और अविवाहित यह किसान एक बार फिर भावुक हो गए।

उन्होंने कहा कि, मेरा सहारा चला गया। भाई-भाभी को ठीक करने के लिए मैंने बहुत भागदौड़ की और पांच बीघा जमीन भी बेच दी। ये बैल उसके गवाह थे। बैल यहां थे इसलिए मेरा समय कट जाता था। अब वे भी चले गए। अब मैं वाड़ी में अकेला पड़ गया।

चमनभाई ने अपने बैलों को आश्रम तक पहुंचाने के लिए 2,500 रुपये किराया चुकाया और स्वेच्छा से 2,500 रुपये बैल आश्रम को दान दिए। इसी तरह अर्जणभाई ने अपने बैलों को राजकोट तक पहुंचाने के लिए 5,000 रुपये वाहन किराया चुकाया। इन किसानों ने बैल बेच क्यों नहीं दिए? इस सवाल का जवाब देते हुए चमनभाई ने कहा कि, लेने वाला आदमी कैसा हो, यह कैसे पता चले? वह बैल को संभालेगा या नहीं इसकी क्या गारंटी? मैं अपने बैल को दुखी नहीं करना चाहता था। इसलिए, बेचने के बजाय यहां आश्रम ले आया।

राजकोट से 140 किलोमीटर दूर स्थित जूनागढ़ के केशोद तालुका के पीपली गांव के 60 वर्षीय किसान अर्जणभाई पिठिया भी सोमवार को अपने बैल 'सद्भावना बैल आश्रम' को सौंपते समय फूट-फूटकर रो पड़े। उन्होंने कहा कि, बछड़े थे तभी से मैंने इन बैलों को बड़ा किया था। चार साल से मैं इन्हें हांकता था। लेकिन इस साल बारिश कम हुई है, और पानी नहीं है। मुझे हार्ट-अटैक आ गया है इसलिए अब मुझसे इन बैलों को संभाला नहीं जा सकता। मेरा बेटा नौकरी करता है और मेरे पास केवल पांच बीघा जमीन है इसलिए उसमें ज्यादा कुछ हो भी नहीं सकता।" अर्जणभाई ने कहा कि, मैंने इन्हें आठ साल से जान की तरह संभाला था। कोई इन्हें दुखी करे तो? मुझे बैलों को छोड़ना पड़ेगा, इस विचार से मुझे कई दिनों से नींद नहीं आती थी।

जामनगर के जामजोधपुर तालुका में सरकार के रिकॉर्ड में 15 इंच बारिश दर्ज की गई है। लेकिन नरमाणा के अगुवा घेलाभाई हिरपरा कहते हैं कि, उनके गांव में इस साल एक भी अच्छी बारिश नहीं हुई है। वाड़ी में एक बार भी पानी बाहर निकल जाए इतनी बारिश नहीं हुई इसलिए नदी और तालाब बिल्कुल सूखे हैं। इसलिए, किसान फसल समेटने लगे हैं। दो-दो भारी हैं उसे कोई कहीं डाल देता है तो कोई गायों को डाल देता है। पीने का पानी भी नहीं है। किसानों ने अपने बैलों को 'सद्भावना बैल आश्रम' और अन्य जगहों पर छोड़ दिया है। गांव में अब 3-4 जोड़ी बैल ही बचे हैं।

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जामनगर के कालावड तालुका के सतिया गांव के किसान देवायतभाई किहोर ने कांकरेंज नस्ल के अपने बैलों की जोड़ी आश्रम को सौंपते समय बीबीसी गुजराती से कहा, "चाहे कैसा भी मानसून हो या सर्दी हो, वे धोंसरा लेकर खड़े रहते हैं। उनके ऊपर ही तो खेती करते हैं। इसलिए दुख तो लगता ही है न। घर से बेटा जाए या बैल जाए, दोनों बराबर ही हैं।

'सद्भावना बैल आश्रम' के व्यवस्थापक विशालभाई मांगुकिया ने कहा कि, 'सद्भावना वृद्धाश्रम' चलाने वाली राजकोट की 'मानव सेवा चैरिटेबल ट्रस्ट' नामक संस्था ने वृद्ध और बीमार बैलों की सेवा-देखभाल के उद्देश्य से 2021 में 'सद्भावना बैल आश्रम' की शुरुआत की थी। लेकिन इस साल सितंबर के तीसरे सप्ताह से इस आश्रम ने हर प्रकार के बैलों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए हैं। इसके परिणामस्वरूप 15 सितंबर से लेकर 22 सितंबर की दोपहर 2 बजे तक किसानों ने 978 बैल इस आश्रम में छोड़ दिए हैं।’

उन्होंने कहा कि, गुजरात के कुछ जिलों में बारिश बहुत खिंच गई है। कुछ तालुकाओं और गांवों में बुवाई के बाद आधा-पौना इंच बारिश होने के बाद कोई बारिश ही नहीं हुई और फसल विफल हो जाने का डर है। इसलिए, किसान बहुत चिंतित हैं। किसान कहते हैं कि अपने बैलों के लिए खाने की व्यवस्था तो जैसे-तैसे कर लेंगे, लेकिन उन्हें पिलाने के लिए पानी नहीं है। इसलिए 'सद्भावना बैल आश्रम' किसानों के साथ खड़ा रहने के लिए तैयार हुआ है... हमने किसानों से आह्वान किया कि सद्भावना बैल आश्रम संस्था एक-एक बैल को संभाल लेगी, एक-एक बैल का भरण-पोषण करेगी, उसे कत्लखाने नहीं जाने देगी या सड़क पर भटकने भी नहीं देगी।

एक-एक बैल का भरण-पोषण हो जाए इसके लिए एक सप्ताह पहले 'सद्भावना बैल आश्रम' ने सोशल मीडिया के माध्यम से घोषणा की थी कि, जिन किसानों के पास चारे की कमी है और पीने के पानी की सुविधा नहीं है, ऐसे किसान अपने बैलों को यहां सद्भावना आश्रम में छोड़ जाएं। इस कारण, पिछले आठ दिनों से किसानों का लगातार प्रवाह जारी है।

विशालभाई कहते हैं कि उनकी इस घोषणा से पहले दैनिक आधार पर मुश्किल से दो-तीन अशक्त या बीमार बैल आश्रम में आते थे और आश्रम में कुल बैलों की संख्या लगभग 1,600 थी। लेकिन स्वस्थ बैलों को भी स्वीकार करने की घोषणा के बाद केवल 8 दिनों में उस आंकड़े में लगभग 1,000 बैलों की वृद्धि हुई है। हर दिन लगभग 100 वाहनों में भरकर किसान अपने बैल छोड़ने यहां आते हैं। यह देखकर लगता है कि किसान वास्तव में मुश्किल में हैं। एक तरफ भाइयों में बंटवारे के कारण जमीनें छोटी होती जा रही हैं, इसलिए छोटे किसानों के लिए बैल रखना संभव नहीं है; दूसरी तरफ युवा पीढ़ी रोजगार की तलाश में अन्य काम-धंधों के लिए शहरों में जाने लगी है, इसलिए बैलों को संभालने वाले किसानों की संख्या घट रही है और खेती में मशीनों का चलन बढ़ रहा है। ऐसे हालात में अगर ऐसा खराब साल आ जाए, तो बैलों की हालत दयनीय हो जाती है। मुझे लगता है कि इन कारकों के संयोजन के कारण किसान अपने बैलों को छोड़ रहे हैं।

गुजरात में अगस्त का महीना और सितंबर महीने का पहला सप्ताह सूखा रहने के बाद, 12 सितंबर से बारिश का एक दौर शुरू हुआ था और 22 सितंबर को भी छिटपुट बारिश जारी रही थी। इस दौर में राज्य के अधिकांश इलाकों में 2-6 इंच तक बारिश हो गई है। इसके बावजूद सौराष्ट्र और उत्तर गुजरात के कुछ जिलों में अभी भी बारिश की बड़ी कमी है।

आधिकारिक आंकड़ों  के अनुसार 21 सितंबर तक सौराष्ट्र के देवभूमि द्वारका जिले में पिछले 30 वर्षों की औसत बारिश की तुलना में केवल 16 प्रतिशत बारिश हुई थी। सौराष्ट्र के पोरबंदर (28 प्रतिशत), जामनगर (42 प्रतिशत) और राजकोट (61 प्रतिशत) जिलों में भी सामान्य से काफी कम बारिश हुई है। तो कच्छ में (57 प्रतिशत), साथ ही उत्तर गुजरात के पाटण, बनासकांठा और वाव-थराद तालुकाओं में भी 16 से 20 इंच बारिश हुई है और अभी भी बारिश की कमी लगभग 40 प्रतिशत है।

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