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अब आपके हाथ में होंगे प्लास्टिक के नोट; लंबे समय तक टिकाऊ होगा, पानी में गीला भी नहीं होगा, फिर पुराने नोटों का क्या होगा?
आपके हाथ में जल्द ही कागज के नोट के बदले प्लास्टिक यानी पॉलीमर से बने नोट देखने को मिल सकते हैं। सरकार ने इसके लिए तैयारी शुरू कर दी है। इस तरह भारत में नकदी के इस्तेमाल का तरीका आने वाले वर्षों में बदल सकता है। लंबे समय से इसके लिए प्रयास किये जा रहे थे, लेकिन अब इस काम में सफलता मिलती दिख रही है। दरअसल, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की नोट छापने वाली इकाई ने पॉलीमर सब्सट्रेट की आपूर्ति के लिए वैश्विक स्तर पर निविदाएं आमंत्रित की हैं। इसे देश में पॉलीमर करेंसी लाने की दिशा में पहला ठोस कदम माना जा रहा है। हालांकि, आरबीआई ने अभी तक पॉलीमर नोटों के लॉन्च या समयसीमा पर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आरबीआई शुरुआती चरण में 10 और 20 रुपये के नोटों पर पॉलीमर तकनीक का परीक्षण कर सकता है। इन दोनों मूल्यवर्ग के नोट सबसे अधिक चलन में रहते हैं और जल्दी खराब भी हो जाते हैं। ऐसे में पायलट प्रोजेक्ट के लिए इन्हें सबसे उपयुक्त माना जा रहा है। यदि परीक्षण सफल रहता है, तो वर्ष 2027 से बड़े स्तर पर पॉलीमर नोटों को चरणबद्ध तरीके से जारी किए जाने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, अंतिम फैसला परीक्षण के नतीजों और आरबीआई की समीक्षा के बाद ही होगा।
पॉलीमर शीट एडवांस सिक्योरिटी फीचर्स से लैस होगी
आरबीआई की पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड ने पॉलीमर सब्सट्रेट शीट की मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई के लिए ग्लोबल टेंडर जारी किये हैं। टेंडर के अनुसार, कंपनियों को एडवांस सिक्योरिटी फीचर्स से लैस विशेष पॉलीमर शीट उपलब्ध करानी होगी। बोलियां जमा करने की अंतिम तिथि 18 अगस्त तय की गई है। पात्र कंपनियों के लिए यह भी अनिवार्य किया गया है कि उन्हें केंद्रीय बैंकों या बैंकनोट प्रिंटिंग संस्थानों को पहले से पॉलीमर सब्सट्रेट की आपूर्ति का अनुभव हो।
इन शर्तों के साथ कंपनियां अप्लाई कर सकती हैं
टेंडर में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कड़े प्रावधान भी शामिल किए गए हैं। बोली लगाने वाली कंपनियों को भारत सरकार से सुरक्षा मंजूरी लेनी होगी। साथ ही भारत के लिए तैयार किए जाने वाले पॉलीमर सब्सट्रेट में चीन या पाकिस्तान से कच्चे माल की आपूर्ति नहीं होनी चाहिए और भारत के लिए तैयार सामग्री किसी तीसरे देश को नहीं बेची जा सकेगी। इन शर्तों का उद्देश्य भारतीय मुद्रा की सुरक्षा को और मजबूत बनाना है।
नए नोट आने से पुराने नोट बंद नहीं होंगे
पॉलीमर नोट आने का मतलब यह नहीं होगा कि मौजूदा कागजी नोट तुरंत चलन से बाहर हो जाएंगे। आरबीआई की योजना दोनों तरह की करेंसी को एक साथ चलाने की है। यानी पॉलीमर और पेपर नोट कुछ समय तक समानांतर रूप से प्रचलन में रहेंगे। धीरे-धीरे जैसे पुराने नोट खराब होंगे, उनकी जगह नए पॉलीमर नोट लेते जाएंगे। इसलिए इसे नोटबंदी जैसी किसी प्रक्रिया से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
आइए जानते हैं कि क्या होता है पॉलीमर बैंकनोट?
पॉलीमर बैंकनोट विशेष प्रकार के प्लास्टिक मटेरियल, जिसे पॉलीमर सब्सट्रेट कहा जाता है, पर छापे जाते हैं। देखने और इस्तेमाल में ये सामान्य नोटों जैसे ही होते हैं, लेकिन इनकी मजबूती कहीं अधिक होती है। ये पानी में भीगने पर खराब नहीं होते, धूल और गंदगी का असर कम होता है तथा आसानी से फटते भी नहीं हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इनकी उम्र पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में लगभग ढाई गुना तक अधिक हो सकती है।
नकली नोटों पर भी लगेगी लगाम
पॉलीमर सब्सट्रेट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें पारदर्शी विंडो, धात्विक सुरक्षा चिन्ह, चुंबकीय सुरक्षा तत्व, विशेष इरिडेसेंट पैटर्न और अन्य आधुनिक सिक्योरिटी फीचर्स आसानी से जोड़े जा सकते हैं। इससे नकली नोट तैयार करना पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन हो जाता है। यही वजह है कि दुनिया के कई देशों ने सुरक्षा बढ़ाने के लिए पॉलीमर करेंसी को अपनाया है।
दुनिया के कई देशों में पहले से प्रचलन
ऑस्ट्रेलिया पॉलीमर बैंकनोट अपनाने वाला पहला देश था। इसके बाद कनाडा, यूनाइटेड किंगडम, न्यूजीलैंड सहित कई अन्य देशों ने भी प्लास्टिक करेंसी को अपनाया। इन देशों के अनुभव बताते हैं कि पॉलीमर नोट अधिक समय तक उपयोग में बने रहते हैं और खराब नोटों को बदलने की लागत भी कम होती है। इसी अनुभव को देखते हुए भारत भी लंबे समय से इस विकल्प पर विचार कर रहा था।
आरबीआई ने इससे पहले भी देश में पॉलीमर नोट शुरू करने की इच्छा जताई थी, लेकिन यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। अब वैश्विक टेंडर जारी होने के बाद माना जा रहा है कि प्रक्रिया ने व्यावहारिक रूप लेना शुरू कर दिया है। फिर भी केंद्रीय बैंक की ओर से अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि पायलट प्रोजेक्ट कब शुरू होगा या किन शहरों में इसका परीक्षण किया जाएगा। फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि यदि परीक्षण सफल रहता है तो भारत की करेंसी व्यवस्था में यह पिछले कई दशकों का सबसे बड़ा तकनीकी बदलाव साबित हो सकता है।

