देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन जींद से सोनीपत के बीच चली, न धुआं न कोई प्रदूषण; आखिर कैसे चलती है यह ट्रेन? जानिए सभी सवालों के जवाब

क्या और भी रूट पर चलाए जा सकते हैं ऐसी ट्रेनें, कितना खर्च आता है हाइड्रोजन ट्रेन चलाने में?

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नई दिल्ली/जींद। भारत ने शुक्रवार को हाइड्रोजन ईंधन से चलने वाली अपनी पहली ट्रेन की शुरुआत कर दी। यह ट्रेन हरियाणा के जींद और सोनीपत के बीच चलेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरी झंडी दिखाकर इसे रवाना किया। इस पहल के साथ भारत हाइड्रोजन ट्रेन चलाने वाले दुनिया के पांच देशों में शामिल हो गया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह ट्रेन आखिर चलती कैसे है? इसमें डीजल नहीं जलता, ऊपर बिजली की तार भी नहीं होती, फिर इसके पहिए किस ताकत से घूमते हैं? इस पूरी तकनीक के पीछे हाइड्रोजन फ्यूल सेल काम करता है, जो गैस की मदद से ट्रेन के भीतर ही बिजली तैयार करता है। यही बिजली मोटरों तक पहुंचती है और ट्रेन आगे बढ़ती है।
हाइड्रोजन ट्रेन को आसान भाषा में समझें तो यह ऐसी ट्रेन है, जिसके अंदर ही एक छोटा बिजलीघर लगा होता है। इसमें ईंधन के रूप में हाइड्रोजन गैस का उपयोग किया जाता है। ट्रेन में लगे फ्यूल सेल तक एक ओर से हाइड्रोजन और दूसरी ओर से हवा में मौजूद ऑक्सीजन पहुंचती है। दोनों के बीच रासायनिक प्रक्रिया होती है, जिससे बिजली, पानी और जलवाष्प (भाप) बनते हैं। बनी हुई बिजली सीधे ट्रेन के इलेक्ट्रिक मोटरों तक पहुंचती है और वही मोटर ट्रेन को चलाती है। इस पूरी प्रक्रिया में धुआं या कार्बन डाइऑक्साइड नहीं निकलती। केवल पानी और जलवाष्प बाहर निकलते हैं, इसलिए इसे शून्य-उत्सर्जन (जीरो एमिशन) तकनीक माना जाता है।

फ्यूल सेल कैसे बनाता है बिजली

हाइड्रोजन ट्रेन की सबसे महत्वपूर्ण इकाई फ्यूल सेल है। इसमें हाइड्रोजन गैस भेजी जाती है। दूसरी तरफ से ऑक्सीजन प्रवेश करती है। फ्यूल सेल के भीतर दोनों के बीच होने वाली रासायनिक प्रतिक्रिया से इलेक्ट्रॉन उत्पन्न होते हैं। यही इलेक्ट्रॉन बिजली के रूप में मोटरों तक पहुंचते हैं और ट्रेन चलती है। यही वजह है कि इसे पर्यावरण के लिए सुरक्षित तकनीक माना जाता है।

हाइड्रोजन कहां से आएगी

इस ट्रेन के लिए हरियाणा के जींद रेलवे स्टेशन के पास देश का पहला हाइड्रोजन उत्पादन, स्टोरेज और रीफ्यूलिंग प्लांट बनाया गया है। यहां इलेक्ट्रोलिसिस तकनीक से पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में अलग किया जाएगा। इस प्रक्रिया में रोजाना करीब 430 किलोग्राम हाइड्रोजन तैयार होगी। तैयार गैस को हाई-प्रेशर टैंकों में सुरक्षित रखा जाएगा। स्टेशन पर करीब 3000 किलोग्राम हाइड्रोजन स्टोर करने की क्षमता विकसित की गई है, जबकि ट्रेन में एक बार में लगभग 440 किलोग्राम हाइड्रोजन भरी जा सकेगी। यहीं से ट्रेन में ईंधन भरने की पूरी व्यवस्था होगी।

पानी से हाइड्रोजन बनने की प्रक्रिया

पानी हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से मिलकर बना होता है। जब इसमें बिजली प्रवाहित की जाती है तो इलेक्ट्रोलिसिस नामक प्रक्रिया के जरिए दोनों गैसें अलग हो जाती हैं। अलग हुई हाइड्रोजन को संग्रहित किया जाता है और बाद में ट्रेन के फ्यूल सेल में ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इस परियोजना में ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग किया जाएगा।

ग्रीन हाइड्रोजन क्यों खास

ग्रीन हाइड्रोजन नवीकरणीय ऊर्जा, जैसे सौर और पवन ऊर्जा से तैयार की जाती है। इसके उत्पादन में कार्बन उत्सर्जन लगभग शून्य होता है। भारतीय रेल की पहली हाइड्रोजन ट्रेन भी ग्रीन हाइड्रोजन से संचालित होगी। इसी उद्देश्य से जींद में ग्रीन हाइड्रोजन प्लांट स्थापित किया गया है।

जब बिजली से हाइड्रोजन बनानी पड़ती है तो फायदा क्या

यह सवाल अक्सर उठता है कि यदि हाइड्रोजन बनाने के लिए पहले बिजली खर्च करनी पड़ती है और बाद में उसी हाइड्रोजन से बिजली बनाई जाती है, तो इसमें लाभ क्या है। विशेषज्ञों के अनुसार हाइड्रोजन ऊर्जा का स्रोत नहीं बल्कि ऊर्जा को संग्रहित करने और जरूरत वाली जगह तक पहुंचाने का माध्यम है। उदाहरण के लिए, यदि किसी दिन सौर या पवन ऊर्जा संयंत्र जरूरत से अधिक बिजली बना दें तो उस अतिरिक्त बिजली को लंबे समय तक सीधे उपयोग या बैटरियों में सुरक्षित रखना आसान नहीं होता। ऐसे में उसी अतिरिक्त बिजली से ग्रीन हाइड्रोजन तैयार कर ली जाती है। बाद में जरूरत पड़ने पर यही हाइड्रोजन फ्यूल सेल में बिजली बनाकर ट्रेन चलाने के काम आती है।

सुरक्षा के लिए आधुनिक व्यवस्था

हाइड्रोजन अत्यधिक ज्वलनशील गैस है, इसलिए ट्रेन में सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए गए हैं। इसमें ऑटोमैटिक फायर एक्सटिंग्विशिंग सिस्टम लगाया गया है। साथ ही करीब 26 सेंसर लगाए गए हैं, जो आग, अधिक तापमान या हाइड्रोजन गैस के रिसाव का तुरंत पता लगा लेते हैं। किसी भी असामान्य स्थिति में चालक दल को तत्काल सूचना मिल जाती है।

हर दिन कितने किलोमीटर चलेगी ट्रेन, किराया कितना होगा?

भारतीय रेल की पहली हाइड्रोजन ट्रेन करीब 3200 हॉर्सपावर क्षमता की है। इसमें आठ यात्री कोच और आगे-पीछे दो पावर कार लगाई गई हैं। ट्रेन अधिकतम 75 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलेगी। यह जींद और सोनीपत के बीच 89 किलोमीटर की दूरी लगभग दो घंटे में तय करेगी। किराया 5 से 25 रुपये के बीच रखा गया है।

जींद-सोनीपत रूट ही क्यों चुना गया

रेलवे ने इस परियोजना के लिए जींद-सोनीपत रूट दो कारणों से चुना। पहला, इस मार्ग पर ट्रैफिक अपेक्षाकृत कम है और यहां प्रतिदिन केवल आठ ट्रेनें चलती हैं। दूसरा, यह दिल्ली के नजदीक है, जिससे तकनीकी निगरानी, परीक्षण और विशेषज्ञों की उपलब्धता आसान रहती है। यह नॉन-इलेक्ट्रिफाइड ब्रॉडगेज रूट भी है, इसलिए नई तकनीक के परीक्षण के लिए इसे उपयुक्त माना गया।

हाइड्रोजन ट्रेन परियोजना पर कितनी लागत आई

पहली हाइड्रोजन ट्रेन परियोजना पर करीब 112 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। इसमें ट्रेन के निर्माण के साथ हाइड्रोजन उत्पादन, भंडारण और रीफ्यूलिंग की पूरी व्यवस्था शामिल है। ट्रेन का डिजाइन और इंटीग्रेशन चेन्नई की इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (आईसीएफ) में किया गया। सरकार की 'हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज' योजना के तहत भविष्य में देश के विभिन्न हेरिटेज और पहाड़ी मार्गों पर ऐसी 35 हाइड्रोजन ट्रेनें चलाने की योजना है। खासकर उन रूटों पर, जहां बिजली की ओवरहेड लाइन बिछाना कठिन या महंगा है, वहां यह तकनीक एक प्रभावी विकल्प साबित हो सकती है।

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