क्या यह युद्ध ईरान को कमजोर करने के बजाय उसे और मजबूत बना रहा है?

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विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान के खिलाफ युद्ध का दांव अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पर उल्टा पड़ सकता है। उनका मानना है कि ईरान को कमजोर करने के इरादे से शुरू हुआ यह युद्ध उसे और अधिक मजबूत बना सकता है। अगर यह युद्ध बिना किसी समझौते के समाप्त हो जाता है, तो ईरान और ज्यादा ताकतवर होकर उभर सकता है, जबकि इसका बोझ खाड़ी देशों पर बढ़ सकता है। इससे मध्य पूर्व में ऊर्जा आपूर्ति और तेल-गैस बाजार पर ईरान का वर्चस्व भी बढ़ सकता है।

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युद्ध के दौरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों को बंद करने की ईरान की क्षमता ने पहले ही वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला दिया है। अब, युद्ध शुरू हुए एक महीने से अधिक समय हो चुका है, और विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और इज़रायल के लगातार हमलों के बावजूद ईरान ने अपनी स्थिति बनाए रखी है, और यह स्थिति आगे भी जारी रह सकती है। इसके परिणामस्वरूप ईरान की शक्ति और बढ़ सकती है।

दुबई स्थित बेहुथ रिसर्च सेंटर के निदेशक मोहम्मद बहारून का कहना है कि सबसे बड़ी चिंता यह है कि बिना किसी ठोस परिणाम के युद्ध का अंत हो सकता है। उन्होंने आगे कहा कि अमेरिका युद्ध रोक सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ईरान भी ऐसा करेगा। जब तक खाड़ी में अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं, तब तक ईरान का खतरा बना रहेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान इस युद्ध से बिना हारे निकलता है, तो वह शिपिंग रूट्स, ऊर्जा आपूर्ति और क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित करने के लिए और अधिक ताकत हासिल कर सकता है। इससे खाड़ी देशों को आर्थिक और रणनीतिक नुकसान हो सकता है।

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विश्लेषकों के अनुसार, ईरान के प्रति अपनी प्रतिक्रिया में अमेरिका और इज़रायल ने बड़ी गलती की। युद्ध की शुरुआत में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की हत्या को निर्णायक कदम माना गया था, लेकिन इसके बजाय युद्ध और अधिक भड़क गया। उनकी जगह उनके बेटे मोजतबा खामेनेई ने ले ली, और इस घटना ने ईरान में प्रतिरोध और बदले की भावना को और मजबूत कर दिया।

मध्य पूर्व विशेषज्ञ फवाज़ गर्गेस के अनुसार, इस कदम ने राजनीतिक संघर्ष को धार्मिक और सभ्यतागत संघर्ष में बदल दिया, जिससे ईरान के नेतृत्व के लिए आंतरिक समर्थन और मजबूत हो गया। विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान की प्रणाली कई स्तरों पर काम करती है और लंबे समय तक दबाव सहने के बावजूद इस युद्ध में टिके रहने की क्षमता रखती है।

इस युद्ध में अपनी रणनीति के तहत, ईरान ने सीधे टकराव के बजाय आर्थिक दबाव बनाने पर ध्यान केंद्रित किया है। ऊर्जा ढांचे को निशाना बनाकर और होर्मुज़ जलडमरूमध्य से शिपिंग को बाधित करके उसने तेल की कीमतों में बढ़ोतरी की है, जिससे वैश्विक महंगाई बढ़ी है। विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान का लक्ष्य युद्ध जीतना नहीं, बल्कि विरोधियों को आर्थिक रूप से थका देना है। अगर युद्ध आर्थिक रूप से असहनीय हो जाए, तो केवल टिके रहना ही जीत माना जाएगा।

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अगर अमेरिका बिना किसी सुरक्षा गारंटी के पीछे हटता है, तो ईरान भविष्य में और अधिक आक्रामक हो सकता है। उसके पास एक वैश्विक नेटवर्क है, जिसके जरिए वह अमेरिका, इज़रायल और उनके सहयोगियों को निशाना बना सकता है। विशेषज्ञ मैग्नस रेनस्टॉर्प के अनुसार, ईरान के पास अभी भी कई क्षमताएं हैं और उसने अभी तक अपनी पूरी ताकत नहीं दिखाई है। इसलिए, अगर ऐसी स्थिति में अमेरिका पीछे हटता है, तो ईरान इसे अपनी जीत मानेगा और इस क्षेत्र में और अधिक खतरनाक बनकर उभरेगा।

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