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ट्रम्प की योजना क्या है? वह क्या चाहते हैं? क्या ईरान युद्ध से सुरक्षित बाहर निकलने के लिए समय मांग रहा है?
गुरुवार सुबह जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भाषण देने के लिए आए, तो दुनिया स्तब्ध होकर देख रही थी। उत्सुकता थी कि शायद वह ईरान के साथ युद्ध को लेकर कोई निर्णायक बात कहेंगे। लेकिन उनके 20 मिनट के भाषण में उनका थकान और युद्ध से बाहर निकलने की निराशा साफ दिखाई दी। ट्रम्प की बातों में रणनीति गायब थी; वह केवल राजनीति कर रहे थे। ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के एक महीने पूरे होने पर दिया गया यह भाषण आत्ममुग्धता और पुरानी चेतावनियों का ऐसा मिश्रण था, जो अब वैश्विक मंच पर अपना प्रभाव खो रहा है।
इस भाषण में ट्रम्प ने जिन बातों को ‘नई उपलब्धियों’ के रूप में पेश किया, वे वास्तव में कुछ भी नया नहीं थीं। चाहे वह ईरानी नेतृत्व को नष्ट करने का दावा हो, ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ के जरिए परमाणु स्थलों को नष्ट करने का दावा हो या ईरान के पावर प्लांट को उड़ाने की धमकी हो- ये सब बातें ट्रम्प हफ्तों से अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर दोहराते आ रहे हैं।
जब किसी राष्ट्र का प्रमुख सोशल मीडिया पर किसी बात को इतनी बार दोहराता है, तो उसका प्रभाव खत्म हो जाता है। ट्रम्प के दावे अब इतने घिस चुके हैं कि उन्हें सिर्फ प्रचार के अलावा कुछ नहीं माना जा रहा। परमाणु स्थलों के नष्ट होने और ईरानी नौसेना के विनाश की बातें अब एक ऐसी रिकॉर्डिंग जैसी लगती हैं, जिसे ट्रम्प अपनी सुविधा के अनुसार बार-बार चलाते हैं। हकीकत यह है कि इन दावों की लगातार पुनरावृत्ति यह दिखाती है कि ट्रम्प के पास कहने के लिए कुछ नया नहीं बचा है।
भाषण के बीच में ट्रम्प द्वारा वियतनाम, इराक और अफगानिस्तान युद्धों की समयरेखा की तुलना करना सबसे बड़ा संकेत है कि वह अब युद्ध से पूरी तरह थक चुके हैं। इस 32 दिन के अभियान को इतिहास की ‘सबसे बड़ी सैन्य जीत’ बताकर वह वास्तव में अमेरिकी जनता को एक मनोवैज्ञानिक संदेश दे रहे हैं कि, ‘अब बहुत हो गया।’
ट्रम्प अच्छी तरह जानते हैं कि मध्य-पूर्व में एक और लंबा युद्ध उनके घरेलू अर्थतंत्र और ‘अमेरिका फर्स्ट’ की छवि को नुकसान पहुंचा सकता है। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और घरेलू शेयर बाजार में अस्थिरता ने उनकी चिंता बढ़ा दी है। इसलिए वह अपने लोगों को भरोसा दिलाने के लिए इसे ‘शॉर्ट टर्म’ बता रहे हैं। वह बार-बार यह साबित करने की भी कोशिश कर रहे हैं कि ईरान अब कोई खतरा नहीं है और उसका विनाश हो चुका है। यह किसी विजेता का आत्मविश्वास नहीं, बल्कि एक ऐसे नेता की दलील है जो अपने सैनिकों को वापस बुलाने के लिए बहाना ढूंढ रहा है।
भाषण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह था, जहां ट्रम्प ने ईरान युद्ध के लिए अगले 2-3 हफ्तों का समय मांगा। उन्होंने कहा कि इस दौरान अमेरिका ईरान पर अब तक का सबसे गंभीर हमला करेगा। सैन्य दृष्टिकोण से यह कोई रणनीतिक योजना नहीं, बल्कि सम्मानजनक वापसी (फेस सेविंग) का रास्ता बनाने की कोशिश है। इस 2-3 हफ्तों की समयसीमा के पीछे असली महत्व इस प्रकार है:
अंतिम प्रदर्शन: ट्रम्प एक आखिरी बड़ा धमाका या हवाई हमला करके दुनिया को दिखाना चाहते हैं कि उन्होंने अपनी शर्तों पर युद्ध खत्म किया।
सम्मानजनक बाहर निकलना: वह इस समयसीमा का उपयोग एक ऐसी जीत की कहानी लिखने के लिए करना चाहते हैं, जिससे वह ‘हार’ के दाग के बिना अपने सैनिकों को वापस बुला सकें।
बातचीत का बहाना: उन्होंने नए ईरानी नेतृत्व को तर्कसंगत बताकर पहले ही समझौते के लिए एक रास्ता खोल दिया है। वह आने वाले हफ्तों में कागज पर समझौते के जरिए खुद को एक साथ शांति दूत, डीलमेकर और विजेता साबित करना चाहते हैं।
ट्रम्प का यह कहना कि ‘अन्य देशों को अब होर्मुज़ जलडमरूमध्य की सुरक्षा खुद करनी चाहिए’, उनके बाहर निकलने के स्पष्ट संकेत हैं। वह अब मध्य-पूर्व में सुरक्षा का बोझ उठाने के मूड में नहीं हैं। उन्होंने साफ संकेत दिया है कि अमेरिका ने अपना काम (ईरान को कमजोर करना) कर दिया है और अब वह इस महंगे विवाद से बाहर निकलना चाहते हैं।
ट्रम्प की धमकियां अब अपनी धार खो चुकी हैं, क्योंकि उनमें कार्रवाई से ज्यादा पुनरावृत्ति है। यह भाषण किसी नए हमले का नहीं, बल्कि युद्ध समाप्ति का संकेत था। हां, इसमें ट्रम्प की विशिष्ट नाटकीयता जरूर थी। आने वाले 15 से 20 दिनों में ट्रम्प एक कृत्रिम ‘पूर्ण जीत’ की घोषणा करके इस युद्ध से पीछे हट सकते हैं। उनका लक्ष्य केवल ‘मजबूत छवि’ को बचाना है, जबकि जमीनी स्तर पर वह केवल पर्शियन गल्फ और ईरान के आसमान से सम्मानजनक वापसी चाहते हैं।

