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कांग्रेस के पास सत्ता, मजबूत संगठन और कार्यकर्ताओं का पूरा समर्थन नहीं है, लेकिन उसके पास लंबा राजनीतिक अनुभव जरूर है
एक समय था जब कांग्रेस सिर्फ एक राजनीतिक पार्टी नहीं, बल्कि देश की विचारधारा का केंद्र थी। महात्मा गांधी और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे महान नेता इसी पार्टी से जुड़े थे। 1960 में गुजरात राज्य बनने के बाद कांग्रेस ने करीब 1995 तक लगातार सत्ता में अपना दबदबा बनाए रखा। मोरारजी देसाई और के. एम. मुंशी जैसे नेताओं ने राज्य के विकास में अहम भूमिका निभाई। इस दौरान कांग्रेस ने सामाजिक सुधार, कृषि और उद्योग के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम किए।

लेकिन 1995 में भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद कांग्रेस का पतन शुरू हो गया। 1998 के बाद भाजपा ने लगातार अपनी सत्ता मजबूत रखी। कांग्रेस के अंदरूनी विवाद, अधूरे वादे और बदलते राजनीतिक माहौल के साथ तालमेल न बैठा पाने के कारण पार्टी कमजोर होती गई। नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री कार्यकाल (2001–2014) में ‘गुजरात मॉडल’ ने भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत किया। इसी दौरान कांग्रेस के कई नेता और कार्यकर्ता भाजपा में शामिल हो गए।

2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने कुछ सीटें बढ़ाईं, लेकिन 2022 में उसकी स्थिति काफी कमजोर हो गई और वह सिर्फ 17 सीटों तक सिमट गई, जबकि भाजपा ने 156 सीटें जीतीं। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ बनासकांठा की एक सीट मिली। इस गिरावट के पीछे आंतरिक कलह, कार्यकर्ताओं की निराशा और जनसमर्थन की कमी मुख्य कारण रहे हैं।
2025 में अहमदाबाद में एआईसीसी का अधिवेशन 64 साल बाद आयोजित किया गया, जिसे पार्टी के पुनरुत्थान की कोशिश माना गया। गुजरात कांग्रेस अध्यक्ष अमित चावड़ा ने ‘जन आक्रोश यात्रा’ के जरिए भाजपा सरकार की नीतियों की आलोचना की। वहीं राहुल गांधी ने अपनी गुजरात यात्रा के दौरान कहा कि पार्टी के कार्यकर्ताओं में दो वर्ग बन गए हैं—एक जनसेवा में लगे हैं और दूसरे भाजपा के साथ जुड़े हुए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि “आधे कार्यकर्ता भाजपा के लिए काम कर रहे हैं।”

नेतृत्व की कमी, केंद्रीय नेतृत्व की अनुपस्थिति और मजबूत संगठन के अभाव के कारण कार्यकर्ताओं में निराशा बढ़ी है। जनसमर्थन भी धीरे-धीरे कांग्रेस से दूर होता गया है। हालांकि पार्टी के पास अभी भी कुछ अनुभवी वरिष्ठ नेता मौजूद हैं, लेकिन वे अपने पुराने अनुभव के सहारे ही टिके हुए हैं।
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती नेतृत्व को मजबूत करना और जनता का भरोसा वापस पाना है। अगर पार्टी संगठन को मजबूत करे, कार्यकर्ताओं को सक्रिय बनाए और जनता से जुड़ाव बढ़ाए, तो वह फिर से उभर सकती है। अनुभव उसकी ताकत जरूर है, लेकिन उसे नई ऊर्जा और स्पष्ट नेतृत्व के साथ लागू करना जरूरी होगा।
आने वाले स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस की सफलता की संभावना कम दिखती है, लेकिन अगर वह 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सही रणनीति के साथ मेहनत करे, तो वापसी की उम्मीद जरूर बन सकती है।

