मकर संक्रांति पर बन रहा विशेष संयोग, दान-पुण्य का इस दिन विशेष महत्व; पाप, रोग और भय से मिलती है मुक्ति

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सूरत। 14 जनवरी यानी बुधवार को मकर संक्रांति और षट्तिला एकादशी दोनों व्रत पर्व हैं। पंचांग भेद की वजह से कुछ क्षेत्रों में 15 जनवरी को भी मकर संक्रांति मनाई जाएगी। बता दें कि सूर्य के मकर राशि में आने पर मकर संक्रांति पर्व मनाया जाता है। षट्तिला एकादशी पर भगवान विष्णु के लिए व्रत-पूजा की जाती है। इसलिए 14 जनवरी को धर्म-कर्म के नजरिए से काफी शुभ योग बन रहा है। मकर संक्रांति और एकादशी के योग में किए गए दान-पुण्य और पूजा-पाठ का अक्षय पुण्य मिलता है, ऐसा पुण्य जिसका असर जीवनभर बना रहता है। 

हिंदू धर्म की परंपरा के अनुसार मकर संक्रांति के दिन दान का विशेष महत्व होता है। जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर उत्तर दिशा की ओर गति करता है, तो इसे उत्तरायण कहा जाता है। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के कारण इस पर्व को मकर संक्रांति कहा जाता है। इस दिन से सभी प्रकार के शुभ और मांगलिक कार्यों की शुरुआत मानी जाती है।

इसलिए यह दिन शुभ माना जाता है

वैसे तो मकर संक्रांति का पूरा दिन दान के लिए शुभ माना जाता है, लेकिन विशेष रूप से दोपहर 3:08 बजे से शाम 5:45 बजे तक का समय अत्यंत शुभ माना गया है। यह कुल 2 घंटे 37 मिनट का पुण्यकाल होता है। उत्तरायण के दिन तिल से भरे पात्र में वस्त्र रखकर ब्राह्मण को दान देने से बड़े पाप, गंभीर रोग और भय का नाश होता है। मकर संक्रांति के दिन तिल, वस्त्र, गुड़ और बर्तन का दान करना विशेष फलदायी माना जाता है। तिल के लड्डू में सिक्का रखकर गुप्त दान कर सकते हैं। वहीं, गायों को चारा डालें और गरीबों को अन्न और गर्म कपड़े दान करें। आयुर्वेद के अनुसार तिल और गुड़ की तासीर गर्म होती है, जिससे सर्दियों में शरीर को गर्मी मिलती है। इसी कारण यह परंपरा प्रचलित है।

पवित्र नदियों में स्नान करने की परंपरा

संकांति ठंड के मौसम में आती है, इसलिए इस दिन तिल-गुड़ के लड्डू खाने की परंपरा है। साथ ही जरूरतमंदों को तिल-गुड़ मिले, इसके लिए दान किया जाता है। सूर्य से हमें विटामिन डी प्राप्त होता है, जो हड्डियों और संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। सर्दियों में गर्म कपड़ों के कारण सूर्य किरणें सीधे शरीर तक नहीं पहुंच पातीं। मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की परंपरा इसी कारण मानी जाती है, जिससे लोग खुले आसमान में सूर्य प्रकाश प्राप्त कर सकें। इस दिन गंगा, यमुना, नर्मदा, शिप्रा जैसी पवित्र नदियों में स्नान कर नदी तट पर दान करने की परंपरा भी है।

इस तरह करें उत्तरायण पर पूजा

सूर्योदय से पहले उठकर पानी में तिल और गंगाजल मिलाकर स्नान करें। लाल वस्त्र पहनें और लाल चंदन का तिलक करें। तांबे के लोटे में लाल फूल, लाल चंदन और तिल डालकर उगते सूर्य को अर्घ्य दें और मंत्र का जाप करें। भगवान सूर्य को तिल और गुड़ से बनी मिठाइयों का भोग लगाएं, प्रसाद स्वयं ग्रहण करें और दूसरों को भी खिलाएं।

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