अयोध्या: सोना-चांदी और हीरा-माणिक्य की वो 1250 शिलाएं आखिर कहां गईं? मंदिर ट्रस्ट पर उठे सवाल; 'गायब' होने के दावे से प्रशासन के उड़े होश

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अयोध्या राम मंदिर में दान के 7 करोड़ रुपये की चोरी के दावे का मामला और अधिक गरमा रहा है। प्रशासन ने आरोपों की जांच के लिए 3 सदस्यीय एसआईटी का गठन किया है। इसी बीच, चोरी के दावों के बीच सेवादार कृष्ण देव तिवारी उर्फ केडी ने अपने ऊपर लगाए गए सभी आरोपों को पूरी तरह से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि मेरे खिलाफ डेढ़ करोड़ रुपये की जमीन खरीदने के लगाए जा रहे आरोप झूठे हैं। अब यह दावा किया जा रहा है कि राम मंदिर से 1250 शिलाएं भी 'गायब' हो गई हैं।

अयोध्या के श्रीराम मंदिर में दान चोरी की बात नई नहीं है। धर्मसेना के संस्थापक संतोष दुबे का दावा है कि 1989 में गांव-गांव, शहर-शहर और देश-विदेश से पूजित होकर अयोध्या आई सोना-चांदी, हीरा-माणिक्य और अष्टधातु की 1250 शिलाएं अब 'गायब' हो गई हैं। ये शिलाएं 2002 तक कारसेवकपुरम में थीं। मिट्टी की पूजित शिलाएं आज भी कारसेवकपुरम में रखी हुई हैं, लेकिन धातु की शिलाएं कहीं दिखाई नहीं देतीं। संतोष दुबे के अनुसार, सोना-चांदी की शिलाओं की देखरेख की जिम्मेदारी भी ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के पास थी।

इन शिलाओं को कारसेवकपुरम में जहाँ सुरक्षित रखा गया था, वहां 3 ताले लगाए गए थे। फिर ये शिलाएं कहां गायब हो गईं, इसकी किसी को जानकारी नहीं है।  श्रीराम मंदिर आंदोलन से जुड़े संतोष दुबे ने बताया कि, 'श्रीराम मंदिर के लिए 1985 में "श्रीराम जन्मभूमि न्यास" बना था। इसके अध्यक्ष परमहंस रामचंद्र दास थे। न्यास में विश्व हिंदू परिषद (VHP) के अशोक सिंघल, गिरिराज, रामविलास वेदांती, चंपत राय सहित कई लोग थे।

श्रीराम मंदिर आंदोलन को गति देने के लिए 1989 में वीएचपी ने पहला बड़ा अभियान शुरू किया। नारा दिया गया था- ‘सवा रुपया दे दे भाई रामशिला के नाम का, राम के घर में लग जाएगा पत्थर तेरे नाम का।’ इस अभियान में वीएचपी ने प्रत्येक व्यक्ति से सवा रुपया, यानी एक घर से 5 से 10 रुपये का दान देने को कहा था। साथ ही घर-घर से पूजित शिलाएं भी मंगाई गई थीं। वीएचपी ने कहा था कि श्रीराम मंदिर के निर्माण में इन शिलाओं का उपयोग किया जाएगा। इस अभियान ने पूरे देश में श्रीराम मंदिर आंदोलन को गति दी। लोगों ने खुलकर दान दिया।'

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उन्होंने कहा, 'मैं तो अयोध्या में ही रहता हूँ। उस समय कारसेवकपुरम से जुड़ गया था। मेरा काम उन शिलाओं का हिसाब तैयार करना था, जो सोना-चांदी, हीरा, माणिक्य, अष्टधातु सहित अन्य कीमती धातुओं से बनाकर भेजी जा रही थीं। उस समय मेरी उम्र 22-23 वर्ष रही होगी। इस गणना में मेरे साथ संघ के एक प्रचारक डॉ. रामविलास वेदांती और परमहंस रामचंद्र दास भी शामिल थे। डॉ. रामविलास वेदांती और परमहंस रामचंद्र दास आज इस दुनिया में नहीं हैं।'

संतोष दुबे का दावा है, 'सोना-चांदी और अष्टधातु की इन शिलाओं की कुल संख्या 1250 थी। परमहंस रामचंद्र दासजी बताते थे कि इनमें सबसे महंगी शिला मॉरीशस वाली थी। मुंबई के एक व्यापारी ने जो शिला भेजी थी, उस पर हीरे जड़े हुए थे। सबसे अधिक चांदी की, उसके बाद सोने की शिलाएं थीं।'

इन शिलाओं को ट्रस्ट के अध्यक्ष परमहंस रामचंद्र दास के निर्देश पर वीएचपी के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंपत राय की देखरेख में रखा गया था। सुरक्षा के लिए जहां शिलाएं रखी गई थीं, वहां 3 ताले लगाए गए थे। 2002 तक ये शिलाएं मौजूद थीं। उसके बाद से उनका कोई पता नहीं चला। संतोष दुबे का कहना है, 'इसके पीछे चंपत राय की भूमिका रही है।' उनका दावा है कि परमहंस रामचंद्र दास इसी आघात में बीमार रहने लगे और 2 साल बाद उनका निधन हो गया। डॉ. रामविलास वेदांती डर के कारण कुछ बोल नहीं सके। इससे स्पष्ट है कि श्रीराम मंदिर के नाम पर मिलने वाले दान के सोना-चांदी की चोरी आज नहीं, बल्कि 1989 से ही शुरू हो गई थी।'

संतोष दुबे ने कहा है, 'कारसेवकपुरम में वीएचपी ने श्रीराम मंदिर का मॉडल रखा था। उसके सामने एक दानपेटी रखी गई थी। उसमें भी देशभर से आने वाले श्रद्धालु दान करते थे। इस दानपेटी में 50 रुपये से अधिक दान देने वालों को रसीद दी जाती थी। यानी इससे कम राशि का कोई हिसाब-किताब नहीं था। इस दानपेटी में हर महीने 5 से 7 लाख रुपये जमा होते थे। दान देने वाले व्यक्ति को बदले में श्रीराम मंदिर मॉडल का एक फोटो दिया जाता था। तब भी वीएचपी की ओर से दान में मिली राशि कभी सार्वजनिक नहीं की गई थी।'

उन्होंने आगे कहा, '5 फरवरी 2020 को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट बना। उस समय न्यास को उसमें समाहित कर लिया गया। उस समय न्यास के खाते में केवल 8.50 करोड़ रुपये दिखाए गए थे। तब भी सोना-चांदी की शिलाओं का कोई उल्लेख नहीं किया गया था। इसके बाद ट्रस्ट ने समर्पण और सहयोग राशि अभियान चलाया। ऑनलाइन भी दान लिया गया। घर-घर चलाए गए समर्पण राशि अभियान के लिए रसीद भी दी गई। हालांकि, रसीद और दान में मिली राशि को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। पहले न्यास और अब ट्रस्ट में चंपत राय ही सर्वेसर्वा की भूमिका में हैं। आरोप है कि उनकी ओर से कभी पारदर्शिता दिखाने का प्रयास नहीं किया गया।'

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श्रीराम मंदिर में दर्शन करने 2022 से अब तक साढ़े चार वर्षों में 61.53 करोड़ लोग पहुंचे। सूत्रों के अनुसार, दर्शन करने जाने वाला सामान्य व्यक्ति भी श्रद्धा से कम से कम 10 रुपये अवश्य चढ़ाता है। इस हिसाब से केवल दानपेटियों में ही लोगों ने 600 करोड़ रुपये दान किए। इसमें महिलाओं द्वारा दान किए गए सोना-चांदी के आभूषणों की बात शामिल नहीं है।

2024 में जब चंपत राय ने चढ़ावे का विवरण दिया था, तब उन्होंने 13 क्विंटल चांदी और 20 किलो सोने का उल्लेख किया था। 2025 में लगभग 30 करोड़ लोगों ने दर्शन किए। इस हिसाब से 2025 में लगभग 300 करोड़ रुपये का चढ़ावा आना चाहिए था। जबकि 1 अप्रैल 2025 से 28 फरवरी 2026 तक का जो रिकॉर्ड ट्रस्ट ने 21 मार्च की बैठक में प्रस्तुत किया था, उसमें केवल 54 करोड़ रुपये दिखाए गए थे। अब यदि 2026 की बात करें, तो जनवरी से 15 जून तक लगभग 7 करोड़ लोग दर्शन कर चुके हैं।

संतोष दुबे के आरोपों पर चंपत राय का पक्ष जानने के लिए टीम राम मंदिर ट्रस्ट कार्यालय पहुंची थी। यहाँ एक कमरे में तोड़फोड़ का काम चल रहा था। अंदर ईंटों के टुकड़ों की सफाई की जा रही थी। उसी कमरे में एक कुर्सी पर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय बैठे थे। टीम ने ट्रस्ट के कर्मचारियों को अपनी पहचान बताई और कहा कि चंपत राय से बात करनी है। इसके बाद ट्रस्ट के कर्मचारियों ने टीम को अधिक समय तक रुकने नहीं दिया।

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