- Hindi News
- धर्म ज्योतिष
- चैत्र नवरात्रि का सातवां दिन: जानें रक्तबीज का संहार करने वाली मांं कालरात्रि की महिमा
चैत्र नवरात्रि का सातवां दिन: जानें रक्तबीज का संहार करने वाली मांं कालरात्रि की महिमा
चैत्र नवरात्रि का सातवां दिन मां दुर्गा के सातवें स्वरूप 'मां कालरात्रि' को समर्पित है। काल का अर्थ है समय और रात्रि का अर्थ है रात, अर्थात जो काल का नाश करने वाली हैं, वही कालरात्रि हैं। इन्हें 'शुभंकरी' भी कहा जाता है क्योंकि ये अपने भक्तों का हमेशा शुभ करती हैं। विशेषकर तंत्र-मंत्र की साधना करने वालों के लिए मां कालरात्रि की पूजा का विशेष महत्व है।
दुर्गा मां का सातवां स्वरूप कालिका यानी काले रंग का है। मां कालरात्रि के विशाल केश हैं जो चारों दिशाओं में फैले हुए हैं। उनकी चार भुजाएं और तीन नेत्र हैं। मान्यता है की देवी भगवान शिव के अर्ध्दनारीशवर रूप को दर्शाती हैं। माता की चार भुजाएं हैं जिनमें से खड्ग, कांटा और गले में माला मौजूद है। मां कालरात्रि के नेत्रों से अग्नि की वर्षा होती है। मां का एक हाथ ऊपर की ओर वर मुद्रा में है और दूसरा हाथ नीचे अभय मुद्रा में है। माता कालरात्रि के तीन नेत्र और सवारी गदर्भ है। देवी को शुभंकरी, महायोगीश्वरी और महायोगिनी के नाम से भी जाना जाता है।
क्यों धारण किया मां ने यह रूप?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज नाम के राक्षसों ने तीनों लोकों में आतंक मचा रखा था। जब रक्तबीज युद्ध के मैदान में आया, तो उसे वरदान प्राप्त था कि उसके शरीर से खून की एक भी बूंद जमीन पर गिरेगी, तो उससे हूबहू उसके जैसा दूसरा राक्षस पैदा हो जाएगा। इससे देवताओं की चिंता बढ़ गई।
तब भगवान शिव के आग्रह पर देवी पार्वती ने अपनी शक्ति से मां कालरात्रि को उत्पन्न किया। जब मां कालरात्रि ने रक्तबीज पर प्रहार किया, तो उन्होंने उसका रक्त जमीन पर गिरने से पहले ही अपने मुख में भर लिया और उसके रक्त से बनने वाले असुरों का भक्षण कर लिया। इस प्रकार मां ने रक्तबीज का वध किया और देवताओं को भयमुक्त किया। मां का यह रूप दुष्टों के विनाश के लिए है, जबकि भक्तों के लिए वे ममतामयी हैं।
मां कालरात्रि की पूजा विधि
चैत्र नवरात्रि के सातवें दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल पर गंगाजल छिड़ककर शुद्धिकरण करें।
- एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर मां कालरात्रि की प्रतिमा स्थापित करें।
- मां के सम्मुख घी का दीपक जलाएं।
- उन्हें लाल रंग के फूल, विशेषकर 'गुड़हल के फूल', अक्षत और रोली अर्पित करें।
- मां को प्रसन्न करने के लिए दुर्गा चालीसा या दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।
- अंत में कपूर जलाकर माँ की आरती करें और पूरे परिवार के साथ जयकारे लगाएं।
भोग: मां कालरात्रि को 'गुड़' अत्यंत प्रिय है। सातवें दिन उन्हें गुड़ या गुड़ से बनी मालपुआ का भोग लगाना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से शोक और रोगों से मुक्ति मिलती है और आकस्मिक संकट दूर होते हैं।
सिद्ध मंत्र: 'ॐ कालरात्र्यै नम:।'
'एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता, लम्बोष्टी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी'।
'वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभैषणा, वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी'॥

