तमिलनाडु: बेटे का कोर्ट केस और जुदा हुई राहें: जानिए विजय को 'थलपति' बनाने वाले पिता एस.ए. चंद्रशेखर की कहानी

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जब तमिल सिनेमा के सुपरस्टार विजय ने 1992 में अपने पिता और प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक S.A. चंद्रशेखर के साथ फिल्म 'नालैया थीरपु' से हीरो के रूप में डेब्यू किया था, तब किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि फिल्म का नाम एक दिन उनके राजनीतिक भविष्य का निर्णायक प्रतीक बन जाएगा। 'नालैया थीरपु' का अर्थ होता है 'आने वाले कल का फैसला'।

फिल्म का यह शीर्षक लगभग तीन दशक बाद सच साबित हुआ है। लेकिन इस बार फैसला बॉक्स ऑफिस से नहीं, बल्कि मतपेटी से आया है। विजय की पार्टी, तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) ने तमिलनाडु की राजनीति में शानदार प्रवेश किया है, जो उनकी राजनीतिक शुरुआत में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर माना जा रहा है।

विजय की राजनीतिक सफलता के पीछे सिर्फ एक स्टार की कहानी नहीं है। यह एक पिता और बेटे की कहानी भी है। संघर्ष, महत्वाकांक्षा, दिल टूटने, कानूनी लड़ाइयों और आखिरकार पुनर्मिलन की भावनात्मक परतों से भरा रिश्ता। यही वजह है कि विजय और उनके पिता S.A. चंद्रशेखर की कहानी आज तमिल सिनेमा और राजनीति के सबसे दिलचस्प अध्यायों में से एक मानी जाती है।

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S.A. चंद्रशेखर का जन्म 2 जुलाई 1945 को तमिलनाडु के रामेश्वरम के थगाचीमदम में हुआ था। उन्होंने फिल्म उद्योग में किसी बड़े फिल्मी परिवार के सहारे नहीं, बल्कि अपने संघर्ष से पहचान बनाई थी। 1978 में उन्होंने फिल्म 'अवल ओरु पचई कुजहंथई' से निर्देशक के रूप में शुरुआत की। शुरुआत से ही उनकी फिल्मों में आम आदमी के किरदार, सामाजिक संघर्ष और व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई को दिखाया जाता था।

1981 में आई फिल्म 'सट्टम ओरु इरुत्तराय' उनके जीवन का बड़ा मोड़ साबित हुई। यह एक एक्शन फिल्म थी जिसमें कानून-व्यवस्था और गरीबों के संघर्ष को दिखाया गया था। कहानी उनकी पत्नी शोभा ने लिखी थी। दिलचस्प बात यह है कि इस फिल्म को लगभग 20 निर्माताओं ने ठुकरा दिया था। हालांकि, अंततः यह बनी और रिलीज के बाद 100 दिनों से अधिक समय तक चली।

इस फिल्म ने अभिनेता विजयकांत को बड़ा स्टार बना दिया और S.A. चंद्रशेखर को तमिल सिनेमा में पहचान दिलाई। फिल्म इतनी सफल रही कि इसका रीमेक तेलुगु, मलयालम, कन्नड़ और हिंदी में भी बना। इसकी हिंदी रीमेक 'अंधा कानून' थी, जिसमें रजनीकांत और अमिताभ बच्चन ने अभिनय किया था।

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इसके बाद S.A. चंद्रशेखर और विजयकांत की जोड़ी तमिल सिनेमा की सबसे सफल जोड़ियों में से एक बन गई। उनकी फिल्मों में आम आदमी का गुस्सा, न्याय की मांग और सिस्टम के खिलाफ लड़ाई साफ दिखाई देती थी। कई लोगों को उनकी फिल्मों में M.G. रामचंद्रन की छवि नजर आती थी।

S.A. चंद्रशेखर ने तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और हिंदी में 70 से अधिक फिल्मों का निर्देशन किया। उनकी फिल्में सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं थीं बल्कि सामाजिक मुद्दों को भी छूती थीं। खास बात यह है कि शंकर, M. राजेश और पोनराम जैसे आज के प्रसिद्ध निर्देशकों ने उनके सहायक के रूप में काम किया था। इसका मतलब यह है कि उनका प्रभाव सिर्फ उनकी फिल्मों तक सीमित नहीं था, बल्कि पूरे तमिल फिल्म उद्योग तक फैला हुआ था।

1990 के दशक की शुरुआत में S.A. चंद्रशेखर के बेटे, जोसेफ विजय चंद्रशेखर, फिल्म उद्योग में प्रवेश करने के लिए तैयार थे। विजय बचपन में अपने पिता की फिल्मों में छोटी भूमिकाएं निभा चुके थे। जब उन्हें हीरो के रूप में लॉन्च करने का समय आया, तब S.A. चंद्रशेखर ने जिम्मेदारी संभाली। 'नालैया थीरपु' 1992 में रिलीज हुई। उस समय विजय केवल 18 साल के थे। हालांकि, यह फिल्म फ्लॉप हो गई। आमतौर पर ऐसा डेब्यू किसी नए अभिनेता के करियर का अंत माना जाता है, लेकिन S.A. चंद्रशेखर डटे रहे। उन्होंने अपने बेटे को फिल्मों में मौके देना जारी रखा।

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इसके बाद 'सेंथुरापांडी', 'रासिगन', 'विष्णु' और 'देवा' जैसी फिल्में आईं, यानी चार वर्षों में पांच फिल्में। इन फिल्मों का उद्देश्य साफ था — विजय को लगातार दर्शकों की नजर में बनाए रखना। S.A. चंद्रशेखर मानते थे कि सितारे रातोंरात नहीं बनते, बल्कि लगातार मेहनत और दर्शकों से जुड़ाव के जरिए बनते हैं। फिर 1996 में निर्देशक विक्रमन की 'पूवे उनक्कागा' ने विजय को पहली बड़ी सफलता दिलाई। यही वह समय था जब विजय धीरे-धीरे 'थलपति' बने और तमिल सिनेमा पर राज करने लगे। इस पूरी इमारत की नींव उनके पिता ने रखी थी।

2009 में विजय ने अपने फैन क्लब को एक सामाजिक संगठन में बदल दिया और उसका नाम 'मक्कल इयक्कम' रखा। यह संगठन रक्तदान शिविरों, बाढ़ राहत और सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय हो गया। बाद में विजय के सभी फैन क्लब इसी संगठन के अंतर्गत आ गए। 2011 में इस संगठन ने राजनीति में कदम रखा और AIADMK का समर्थन किया। AIADMK ने उस चुनाव में भारी जीत हासिल की। हालांकि उस समय S.A. चंद्रशेखर ने कहा था कि यह संगठन कोई राजनीतिक पार्टी नहीं बल्कि समाज के हित के लिए बदलाव चाहता है।

फिर 2020 में इस कहानी ने बड़ा मोड़ लिया। विजय को बताए बिना S.A. चंद्रशेखर ने 'ऑल इंडिया थलपति विजय मक्कल इयक्कम' नाम की राजनीतिक पार्टी पंजीकृत कराने की कोशिश की। उन्होंने खुद को महासचिव, अपनी पत्नी शोभा को कोषाध्यक्ष और एक रिश्तेदार को अध्यक्ष नियुक्त किया।

विजय इस कदम से बेहद नाराज हो गए। उन्होंने सार्वजनिक बयान जारी कर कहा कि उनके पिता की राजनीतिक गतिविधियों से उनका कोई संबंध नहीं है। इसके बाद जो हुआ उसने पूरे तमिलनाडु को चौंका दिया। विजय ने अपने नाम और छवि के राजनीतिक इस्तेमाल को रोकने के लिए अपने माता-पिता सहित कई लोगों के खिलाफ अदालत में केस दायर कर दिया।

तमिल सिनेमा में यह पहली बार था जब किसी बड़े स्टार ने अपने ही माता-पिता के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की। पिता-पुत्र के रिश्तों में तनाव आ गया और उनके बीच बातचीत बंद हो गई। पूरे तमिलनाडु ने इस विवाद को हैरानी और बेचैनी के साथ देखा।

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S.A. चंद्रशेखर ने बाद में एक इंटरव्यू में कहा कि कुछ लोग विजय के साथ उनके रिश्ते को तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। शोभा ने भी कहा कि वह इस राजनीतिक साजिश से अनजान थीं। आखिरकार पार्टी भंग हो गई, लेकिन विजय की राजनीति में आने की महत्वाकांक्षा खत्म नहीं हुई। फर्क सिर्फ इतना था कि विजय अब यह सब अपने तरीके से करना चाहते थे।

2023 तक रिश्तों में नरमी आने लगी। S.A. चंद्रशेखर ने एक इंटरव्यू में कहा कि पिता-पुत्र के रिश्तों में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, लेकिन उनके बीच का प्यार कायम रहता है। उन्होंने यह भी बताया कि दोनों ने अपने परिवारों के साथ विजय की फिल्म 'वारिसु' देखी थी। भावुक होकर उन्होंने कहा कि बेटे आमतौर पर अपनी मां के करीब होते हैं, लेकिन विजय उन्हें ज्यादा प्यार करता था। हालांकि दोनों ने कभी खुलकर अपने प्यार का इजहार नहीं किया, लेकिन यह बयान तमिल परिवारों की भावनात्मक संस्कृति को दर्शाता है, जहां रिश्ते बेहद गहरे होते हैं, लेकिन भावनाएं कम शब्दों में व्यक्त की जाती हैं।

4 मई को जब विजय की पार्टी TVK ने ऐतिहासिक जीत हासिल की, तब S.A. चंद्रशेखर गर्व के साथ मीडिया के सामने आए। उन्होंने इसे ऐतिहासिक जीत बताया। उन्होंने कहा कि विजय ने बिना किसी बड़े गठबंधन के चुनाव लड़कर बड़ा जोखिम उठाया था और अब जनता ने उन्हें स्वीकार कर लिया है। यह सिर्फ राजनीतिक जीत नहीं थी, बल्कि उस पिता के लिए भी खास पल था जिसने पहली बार अपने बेटे को कैमरे के सामने पेश किया था। फर्क सिर्फ इतना था कि बेटे ने वह राजनीतिक सपना हासिल कर लिया, जिसे पिता अपने दम पर हासिल नहीं कर पाए थे।

1992 में S.A. चंद्रशेखर ने अपने बेटे के लिए 'नालैया थीरपु' बनाई थी, जिसका अर्थ था- 'आने वाले कल का फैसला'। तीन दशक बाद वह फैसला सचमुच आ चुका है। और इस बार जनता ने अपना फैसला सुना दिया है।

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