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तीन राज्य तीन उपचुनाव...भाजपा की हार के चर्चे ज्यादा; बिहार का बांकीपुर जहां भाजपा का 31 साल पुराना किला ढह गया
मध्य प्रदेश के दतिया में भाजपा का टिकट बदलने का दांव भी नहीं चला
पटना/भोपाल/अहमदाबाद। तीन राज्यों के विधानसभा उपचुनावों के नतीजों ने अलग-अलग राजनीतिक संदेश दिए हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा बिहार के बांकीपुर की है। यहां भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा जाने से खाली हुई सीट पर जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने 19,324 वोटों से जीत दर्ज कर भाजपा का तीन दशक पुराना वर्चस्व खत्म कर दिया। यह सिर्फ एक सीट की हार नहीं मानी जा रही, बल्कि भाजपा की स्थानीय रणनीति, उम्मीदवार चयन और संगठनात्मक पकड़ पर भी सवाल खड़े कर रही है। दूसरी ओर, मध्य प्रदेश के दतिया में कांग्रेस ने लगातार दूसरी बार भाजपा को हराया, जबकि गुजरात के मांजलपुर में भाजपा ने 30,630 वोटों के अंतर से जीत दर्ज कर अपनी पकड़ बरकरार रखी। हालांकि तीन राज्यों के उपचुनाव में भाजपा को केवल एक सीट मिली। दो सीटों पर उसे हार का सामना करना पड़ा। लेकिन गुजरात में जीत के बावजूद भाजपा की हार के चर्चे राजनीतिक गलियारों में ज्यादा है। ये समझने का प्रयास करते हैं कि जिन बिहार और मध्य प्रदेश की दो सीटों पर भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी थी, उन्हें वहां हार का सामना क्यों करना पड़ा।
बांकीपुर: तीन दशक से इस सीट पर भाजपा का राज था…
बांकीपुर लंबे समय से भाजपा का सबसे सुरक्षित शहरी गढ़ माना जाता रहा है। 1995 से यह सीट लगातार भाजपा के पास रही और नितिन नवीन यहां से लगातार पांच बार विधायक चुने गए। उपचुनाव में पार्टी ने नीरज कुमार को उम्मीदवार बनाया, लेकिन चुनाव के दौरान स्थानीय स्तर पर बदलाव की इच्छा और प्रशांत किशोर की आक्रामक जमीनी रणनीति भाजपा पर भारी पड़ गई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा इस चुनाव को आसान मानकर चल रही थी, जबकि जन सुराज ने इसे प्रतिष्ठा का मुकाबला बना दिया।
प्रशांत किशोर को 64,151 वोट (49.23%) मिले, जबकि भाजपा प्रत्याशी नीरज कुमार को 44,827 वोट (34.40%) हासिल हुए। राजद की रेखा कुमारी 14,273 वोट (10.95%) के साथ तीसरे स्थान पर रहीं। खास बात यह रही कि भाजपा और राजद के कुल वोट 59,100 रहे, जो अकेले प्रशांत किशोर के वोटों से 5,051 कम हैं। इस तरह कुल 1,30,313 मतों में लगभग हर दूसरा वोट जन सुराज उम्मीदवार के पक्ष में गया।
ये प्रशांत किशोर के लिए बड़ी जीत क्यों है?
राजनीतिक दृष्टि से यह परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नवंबर 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज पार्टी ने 238 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन 236 सीटों पर उसकी जमानत जब्त हो गई थी। उस समय कई राजनीतिक विश्लेषकों ने प्रशांत किशोर की सक्रिय राजनीति पर सवाल उठाए थे। कइयों ने तो यहां तक कह दिया कि अब प्रशांत किशोर बिहार छोड़कर चले जाएंगे उनका राजनीतिक करियर पर विराम लग चुका है। लेकिन करीब नौ महीने बाद उसी नेता ने भाजपा के सबसे मजबूत गढ़ों में शामिल बांकीपुर में जीत दर्ज कर उन्होंने बताया कि वे बिहार छोड़कर नहीं जाने वाले हैं। बिहार के विकास के लिए वे काम करते रहेंगे।
प्रशांत किशोर ने विकास-रोजगार जैसे मुद्दों को ज्यादा तरजीह दी
विश्लेषकों के अनुसार भाजपा की हार के पीछे कई कारण रहे। पहला, चुनाव पूरी तरह स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित हो गया और भाजपा अपने परंपरागत वोट बैंक से आगे नए मतदाताओं को जोड़ने में सफल नहीं दिखी। दूसरा, प्रशांत किशोर ने विकास, रोजगार और बेहतर प्रशासन जैसे मुद्दों पर लगातार अभियान चलाया, जिससे उन्हें पारंपरिक दलों से अलग विकल्प के रूप में स्वीकार्यता मिली। तीसरा, भाजपा के उम्मीदवार चयन और स्थानीय चुनाव प्रबंधन को लेकर भी सवाल उठे। चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी ने पूरी ताकत झोंकी, लेकिन उसका लाभ मतदान में नहीं दिखा।
जीत के बाद प्रशांत किशोर का तंज- बिहार बेहतर मुख्यमंत्री का दावेदार है
जीत के बाद प्रशांत किशोर ने कहा कि "सारा फायदा गुजरात को ही क्यों मिलना चाहिए? बिहारी सिर्फ मजदूर बनने के लिए पैदा नहीं हुए हैं। बिहार बेहतर मुख्यमंत्री का हकदार है।" उन्होंने यह भी कहा कि उनके विधायक बनने से बांकीपुर रातों-रात बेंगलुरु नहीं बन जाएगा, लेकिन अगले दो-तीन महीनों में लोग बदलाव महसूस करेंगे। साथ ही उन्होंने कहा कि बांकीपुर की जनता ने भाजपा नेतृत्व को स्पष्ट संदेश दिया है कि बिहार के लिए बेहतर नेतृत्व की जरूरत है।
मध्य प्रदेश: दतिया सीट फिर हार गई भाजपा
मध्य प्रदेश के दतिया में कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने 66,757 वोट (42.39%) हासिल कर भाजपा के आशुतोष तिवारी को 6,016 वोटों से हराया। आशुतोष को 60,741 वोट (38.57%) मिले, जबकि आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के दामोदर यादव 'मंडल' को 22,527 वोट (14.30%) प्राप्त हुए। यह लगातार दूसरा चुनाव है, जिसमें कांग्रेस ने इस सीट पर भाजपा को हराया। 2023 में भी कांग्रेस ने तत्कालीन गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा को पराजित किया था। इस बार भी भाजपा द्वारा ऐन वक्त पर टिकट बदलने के फैसले को हार की बड़ी वजह माना जा रहा है। नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों की नाराजगी मतदान तक बनी रही और उनके पोलिंग बूथ पर भी भाजपा पीछे रह गई। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि टिकट बदलने से पहले नरोत्तम मिश्रा को विश्वास में लेना चाहिए था और उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी सौंपनी चाहिए थी।
गुजरात में भाजपा ने अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखी
गुजरात के मांजलपुर में हालांकि भाजपा ने अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखी। भाजपा उम्मीदवार सतीश पटेल ने कांग्रेस के भिखाभाई रबारी को 30,630 वोटों के अंतर से हराकर सीट अपने पास बरकरार रखी। हालांकि रिपोर्टों के अनुसार पिछली बार की तुलना में जीत का अंतर कुछ कम रहा, जिसका एक कारण अपेक्षाकृत कम मतदान भी माना गया।
तीनों सीटों पर भाजपा की जीत-हार एक नजर में…
तीनों राज्यों के उपचुनावों के नतीजे बताते हैं कि स्थानीय नेतृत्व, उम्मीदवार चयन और क्षेत्रीय मुद्दे अब भी उपचुनावों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। बिहार में भाजपा को अपने सबसे मजबूत गढ़ में मिली हार ने भविष्य की रणनीति पर नए सवाल खड़े किए हैं, जबकि दतिया ने मध्य प्रदेश में कांग्रेस को मनोवैज्ञानिक बढ़त दी है। दूसरी ओर, गुजरात में भाजपा ने जीत के साथ यह संदेश भी दिया कि उसके पारंपरिक शहरी क्षेत्रों में संगठन अभी भी मजबूत बना हुआ है।

