त्योहारों से पहले कंपनियां लोगों को देगी महंगाई का झटका…टूथपेस्ट, सर्फ, साबुन से लेकर पेंट-टायर तक होंगे महंगे, क्या है इसकी वजह?

करीब 8 कंपनियां बढ़ाएंगी कीमतें; पश्चिम एशिया के तनाव का असर और कच्चे माल की बढ़ती लागत

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नई दिल्ली। त्योहारी सीजन शुरू होने से पहले आम लोगों को महंगाई का एक और झटका लग सकता है। कंपनियां घर की रंगाई-पुताई में इस्तेमाल होने वाले पेंट, टूथपेस्ट, डिटर्जेंट, डिशवॉशिंग बार, टायर और अन्य रोजमर्रा के कई जरूरी सामान की कीमतें बढ़ाने की तैयारी में हैं। देश की प्रमुख एफएमसीजी (FMCG) और कंज्यूमर गुड्स कंपनियां लगातार दूसरी तिमाही में अपने उत्पादों के दाम बढ़ाने की योजना बना रही हैं।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड (HUL), एशियन पेंट्स, हैवेल्स और डोडला डेयरी सहित कम से कम आठ बड़ी कंपनियां अपने उत्पादों के दाम बढ़ाने की तैयारी में हैं। इसकी मुख्य वजह पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण कच्चे माल, ऊर्जा और अन्य कमोडिटी की लागत में आई बढ़ोतरी है। इस तरह बढ़े हुए खर्च का असर अब सीधे उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ने वाला है।
भारत की सबसे बड़ी एफएमसीजी कंपनी हिंदुस्तान यूनिलीवर ने संकेत दिए हैं कि आने वाली तिमाही में डिटर्जेंट और डिशवॉशिंग बार जैसी श्रेणियों में कीमतें बढ़ाई जाएंगी। कंपनी के सीएफओ निरंजन गुप्ता ने बताया कि वैश्विक स्तर पर जारी अस्थिरता के कारण क्रूड ऑयल से जुड़े डेरिवेटिव्स महंगे हो गए हैं। यही वजह है कि होम केयर उत्पादों की कीमतों में सोच-समझकर बढ़ोतरी की जा रही है।

एचयूएल के अलावा कई अन्य कंपनियां भी बढ़ाएंगी कीमतें

सिर्फ HUL ही नहीं, कई अन्य कंपनियां भी कीमतें बढ़ाने का फैसला कर चुकी हैं। हैवेल्स इंडिया अपने कुछ उत्पादों के दाम करीब 8 प्रतिशत तक बढ़ा चुकी है। वहीं टाटा कंज्यूमर प्रोडक्ट्स ने टाटा साल्ट की कीमत में लगभग 7 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है। डोडला डेयरी और एशियन पेंट्स जैसी कंपनियां भी अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ाने की तैयारी में हैं। 

कीमतें बढ़ाने की वजह- अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ता तनाव

विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव के कारण ऊर्जा की कीमतें लगातार ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। इसका असर प्लास्टिक, पैकेजिंग, रसायन और अन्य कच्चे माल की लागत पर भी पड़ा है। ऐसे में कंपनियों के लिए उत्पादन लागत बढ़ गई है और वे इस अतिरिक्त खर्च को ग्राहकों तक पहुंचाने की तैयारी कर रही हैं।

त्योहारों का सीजन अगस्त से शुरू होने वाला है

यह मूल्य वृद्धि ऐसे समय हो रही है जब देश में रक्षाबंधन, नवरात्रि, दशहरा और दिवाली जैसे बड़े त्योहार आने वाले हैं। आमतौर पर अगस्त से नवंबर के बीच का समय कंपनियों के लिए सबसे अधिक बिक्री वाला सीजन माना जाता है। कई कंपनियों की पूरे साल की कुल बिक्री का लगभग एक-तिहाई हिस्सा इसी अवधि में होता है। इसी कारण कंपनियों को उम्मीद है कि मजबूत मांग के चलते उपभोक्ता बढ़ी हुई कीमतों के बावजूद खरीदारी जारी रखेंगे।

कंपनियों को भरोसा- कीमतें बढ़ने के बावजूद मांग में कमी नहीं आएगी

बाजार के जानकारों का मानना है कि फिलहाल ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में उपभोक्ता मांग स्थिर बनी हुई है। रिटेलर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के सर्वे के मुताबिक जून में खुदरा बिक्री पिछले वर्ष की तुलना में 6 प्रतिशत बढ़ी, जो मई के मुकाबले बेहतर रही। इसी वजह से कंपनियों को भरोसा है कि कीमतें बढ़ाने के बाद भी बिक्री पर बहुत अधिक असर नहीं पड़ेगा। इधर, कंपनियां कीमतों में बढ़ोतरी के असर और कमजोर मानसून से जुड़े जोखिमों पर लगातार नजर रख रही हैं। 

खुदरा महंगाई बढ़ने से आम लोग त्रस्त हैं

इस बीच महंगाई भी चिंता का विषय बनी हुई है। जून महीने में खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण खुदरा महंगाई दर लगभग एक साल में पहली बार भारतीय रिजर्व बैंक  के 4 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर पहुंच गई। हालांकि यह अभी भी आरबीआइर के 2 से 6 प्रतिशत के सहनीय दायरे के भीतर है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में यदि कंपनियां लगातार कीमतें बढ़ाती हैं और मानसून कमजोर रहता है, तो महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है। आरबीआई का अनुमान है कि मार्च 2027 को समाप्त होने वाले वित्त वर्ष में औसत महंगाई दर 5.1 प्रतिशत रह सकती है।

कंपनियों पर बढ़ता दबाव का असर आम उपभोक्ता पर ही दिखेगा

महंगाई के बढ़ते दबाव के कमेटी की बैठक में भी ब्याज दरें स्थिर रहने की संभावना जताई जा रही है। वहीं वित्त मंत्रालय ने भी संकेत दिया है कि महंगाई अब केवल खाद्य वस्तुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक ईंधन लागत और मौसम से जुड़े जोखिमों का असर अन्य उपभोक्ता उत्पादों पर भी दिखाई दे रहा है। इस तरह देखा जाए तो कंपनियों के मुनाफे पर बढ़ते दबाव को देखते हुए कीमतों में बढ़ोतरी लगभग तय है। कंपनियों के लिए बढ़ी हुई लागत को लंबे समय तक खुद वहन करना आसान नहीं है। ऐसे में आम लोगों पर इसका बोझ पड़ना तय है।

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