केजरीवाल केस की सुनवाई करेंगी जस्टिस स्वर्ण कांता; खुद दी सफाई और बताया क्यों नहीं हटेंगी मामले से पीछे

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जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ही एक्साइज पॉलिसी केस की सुनवाई करेंगी। केजरीवाल द्वारा न्यायाधीश बदलने की मांग करने वाली याचिका को जस्टिस स्वर्ण कांता ने खारिज कर दिया है। उन्होंने इस फैसले के लिए कई कारण दिए हैं। केजरीवाल द्वारा लगाए गए आरोपों पर पलटवार करते हुए जस्टिस शर्मा ने पूछा कि, अगर किसी राजनेता की पत्नी राजनीति में कदम रख सकती है, तो हम न्यायाधीशों के बच्चों के कानूनी पेशे में प्रवेश करने पर कैसे सवाल उठा सकते हैं? यह दावा करना कि न्यायाधीशों के बच्चे कानूनी पेशे में प्रवेश नहीं कर सकते, उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

याचिका पर अपना फैसला देते हुए जस्टिस शर्मा ने कहा कि, मैं इस केस से खुद को अलग नहीं करूंगी। मैं इस केस की सुनवाई जारी रखूंगी। इससे पहले अरविंद केजरीवाल ने खुद ही न्यायाधीश स्वर्ण कांता के सामने अपने केस की दलील के दौरान उन पर कई आरोप लगाए थे। इसके बाद केजरीवाल सहित अन्य द्वारा केस की सुनवाई छोड़ने की याचिका खारिज करते हुए कहा कि, ‘मैं इस केस की सुनवाई से नहीं हटूंगी। अगर मैं सुनवाई से अलग हो जाऊं और वह भी बिना कुछ बताए, तो कई तरह की बातें होंगी। साथ ही शायद यह फाइल ही बंद हो सकती है; हालांकि, इस याचिका के माध्यम से उठाए गए मुद्दों पर हर जगह चर्चा होती रहेगी।’

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न्यायाधीश स्वर्ण कांता शर्मा ने आगे कहा कि, ‘इन्हीं कारणों से, मैं इस याचिका को खारिज करती हूं। मेरा शपथ संविधान के प्रति है। मेरे शपथ ने मुझे सिखाया है कि न्यायाधीश को दबाव के आगे झुकना नहीं चाहिए। सच्चा न्याय वही है जो दबाव के सामने अडिग रहे। यह मेरा अडिग संकल्प रहा है और रहेगा। मैं किसी भी भय या पक्षपात के बिना अपने फैसले दूंगी।’ न्यायाधीश स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि, इन बातों के बावजूद मैंने इन याचिकाओं पर निर्णय कर लिया है, बिना प्रभावित हुए केस से अलग होने की याचिका और ये याचिकाएं मानो केस के संदर्भ में कभी दाखिल ही न की गई हों। इन याचिकाओं में मैंने जो कुछ भी कहा है, वह केवल इन याचिकाओं के निर्णय के लिए है।

न्यायाधीश शर्मा ने उन आरोपों पर भी बात की, जिनमें दावा किया गया था कि उनके परिवार के सदस्यों को केस मिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि इस कोर्ट के न्यायाधीश के रिश्तेदार सरकारी पैनल में हों, तब भी याचिकाकर्ता को यह दिखाना चाहिए कि इसका वर्तमान केस या कोर्ट की न्यायिक शक्तियों पर क्या असर पड़ा है। केजरीवाल ऐसा कोई संबंध दिखाने में विफल रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि कोई भी याचिकाकर्ता ‘बार’ (वकील) और ‘बेंच’ (न्यायाधीश) के बीच के संबंध को तोड़ या कमजोर नहीं कर सकता।

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केजरीवाल ने न्यायाधीश शर्मा पर RSS से जुड़े संगठनों द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में भाग लेने का आरोप लगाया था। इसका जवाब देते हुए न्यायाधीश ने कहा कि संगठन कोई भी हो, उसका संस्थापक कोई भी हो, न्यायाधीशों को केवल अदालत के न्यायाधीश के रूप में छात्रों या बार के सदस्यों के साथ बातचीत के लिए आमंत्रित किया जाता है। ऐसी बातचीत कानून के मुद्दों तक ही सीमित होती है। बार और बेंच के बीच का संबंध केवल कोर्टरूम तक सीमित नहीं होता।

न्यायाधीश शर्मा ने टिप्पणी की कि एक न्यायाधीश के रूप में उनके मौन की परीक्षा ली जा रही है। उन्होंने कहा कि उन्होंने केस से ‘अलग होने’ की मांग करने वाली याचिका पर निर्णय लेने के लिए व्यक्तिगत रूप से उन पर लगाए गए आरोपों और संकेतों को सुनने का कठिन रास्ता चुना है। यह पहली घटना है जिसमें न्यायाधीश के समक्ष जज को अलग करने की मांग वाली ऐसी याचिका दायर की गई है।

केजरीवाल केस में न्यायाधीश शर्मा ने कहा कि उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए हैं। अपने आदेश में न्यायाधीश शर्मा ने कहा कि जब उन्होंने फैसला लिखना शुरू किया, तो कोर्टरूम में गहरी शांति छा गई थी। उन्होंने कहा कि उस क्षण उन्होंने अपनी जिम्मेदारी महसूस की, क्योंकि उन्होंने भारत के संविधान की रक्षा करने की शपथ ली है। उन्हें लगा कि उनका मौन एक तरह से परीक्षा है, और न्यायपालिका की निष्पक्षता और संस्था की गरिमा की भी परीक्षा है।

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