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ईरान मुद्दे पर भारत की चुप्पी कायरता नहीं है: शशि थरूर का रुख कांग्रेस से अलग
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने एक बार फिर अपनी पार्टी से अलग रुख अपनाया है। थरूर ने अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष में मोदी सरकार की चुप्पी का समर्थन किया है। इस बार, थरूर ने कहा कि यह चुप्पी कायरता नहीं, बल्कि ज़िम्मेदार कूटनीति है। थरूर ने स्पष्ट किया कि ईरान मुद्दे पर भारत की चुप्पी युद्ध का समर्थन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों के प्रति जागरूकता है।
वहीं, कांग्रेस पार्टी सरकार की इस चुप्पी पर लगातार सवाल उठा रही है। कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी ने कहा था कि खामेनेई की लक्षित हत्या पर सरकार की चुप्पी तटस्थता नहीं, बल्कि 'गैर-ज़िम्मेदारी' है। इससे भारत की विदेश नीति की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं। सोनिया गांधी ने इसे भारत की विदेश नीति के लिए एक बड़ा झटका बताया। इसी तरह, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा कि एकतरफा सैन्य कार्रवाई की निंदा करने पर भारत का रुख 'नैतिक रूप से स्पष्ट' होना चाहिए। गांधी ने सरकार से इस मुद्दे पर अधिक सक्रिय होने की अपील की।

लेकिन शशि थरूर इस मुद्दे पर पार्टी की राय से हटकर चले हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी जटिल अंतरराष्ट्रीय स्थिति में, भारत को अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए। भारत के ईरान के साथ ऊर्जा संबंध हैं, जबकि इज़राइल के साथ उसके मज़बूत सुरक्षा और तकनीकी संबंध हैं। ऐसी स्थिति में, किसी भी एक पक्ष का समर्थन करने से राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुँच सकता है। थरूर के अनुसार, यह चुप्पी वास्तव में एक संतुलित विदेश नीति का प्रतीक है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि यह कायरता नहीं, बल्कि रणनीतिक कूटनीति है।
यह मुद्दा वैश्विक राजनीति में एक नया समीकरण ला रहा है। अमेरिका और इज़राइल के खिलाफ ईरान की कार्रवाइयों ने मध्य पूर्व पर चिंता के बादल मंडरा दिए हैं। भारत ने ऐसे संघर्षों में हमेशा तटस्थता बनाए रखी है। थरूर ने मोदी सरकार की इस नीति को 'विवेकपूर्ण' बताया है। थरूर ने कहा कि विदेश नीति में भावनाओं से ज़्यादा वास्तविकता महत्वपूर्ण होती है। यदि भारत किसी भी पक्ष की निंदा करता है, तो उसके आर्थिक और रणनीतिक हितों पर असर पड़ेगा। ईरान से तेल आयात और इज़राइल के साथ रक्षा सहयोग को देखते हुए यह चुप्पी आवश्यक है।

कांग्रेस पार्टी के अन्य नेता इसे सरकार की कमज़ोरी बताते हैं, लेकिन थरूर का मानना है कि यह नीति भारत को और मज़बूत बनाती है। उन्होंने पहले भी विदेश नीति के मुद्दों पर पार्टी से अलग राय दी है। इस बार भी उनका रुख सुर्खियों में है। जानकारों का कहना है कि थरूर का यह बयान कांग्रेस के अंदरूनी मतभेदों को उजागर करता है।
संक्षेप में, यह कहा जा सकता है कि भारत की विदेश नीति हमेशा "वसुधैव कुटुंबकम" के सिद्धांत पर आधारित रही है। विपरीत परिस्थितियों और संकट के समय में भी, भारत ने तटस्थता बनाए रखते हुए दुनिया में अपनी छवि को मज़बूत किया है। यदि हम राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देंगे, तभी दुनिया में भारत का स्थान और अधिक मज़बूत होगा। विदेश नीति में एकता आवश्यक है, लेकिन रणनीति उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।

