वन नेशन वन इलेक्शन पर बड़ा प्लान: दो चरणों में लागू करने पर विचार, 2029 में 20 राज्यों में एक साथ चुनाव! जानिए फायदा-नुकसान

दूसरे चरण यानी 2034 में पूरे देश को एक साथ चुनावी चक्र में लाने पर विचार

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नई दिल्ली। देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की दिशा में केंद्र सरकार अब चरणबद्ध रणनीति पर आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ पर विचार कर रही संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के सूत्रों के अनुसार, सरकार ऐसा रास्ता तलाश रही है जिससे चुनावी कैलेंडर को एक करने की प्रक्रिया में राज्यों के कार्यकाल में बड़े बदलाव या बार-बार चुनाव कराने जैसी जटिल परिस्थितियां न पैदा हों।
सूत्रों के मुताबिक, समिति के भीतर ‘टू-फेज ट्रांजिशन मॉडल’ पर चर्चा चल रही है। यानी फेज में इसे लागू करने पर विचार चल रहा है। इस मॉडल के तहत 2029 में पहला चरण और 2034 में पूरी तरह से लागू करने पर विचार चल रहा है। नए फॉर्मूला के तहत पहले चरण में 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ करीब 20 राज्यों के विधानसभा चुनाव कराए जा सकते हैं, जबकि 2034 तक पूरे देश को एक साझा चुनावी चक्र में लाने का लक्ष्य रखा जा सकता है।
बता दें कि जेपीसी की अवधि 2026 के मानसून सत्र तक बढ़ा दी गई है। ऐसे में समिति की रिपोर्ट के आधार पर अगले कुछ वर्षों में इस दिशा में संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया शुरू होने की संभावना जताई जा रही है।

वन नेशनन वन इलेक्शन से फायदा क्या होगा?

  • चुनावी खर्च और प्रशासनिक लागत में कमी आ सकती है।
  • बार-बार लागू होने वाली आचार संहिता से विकास कार्यों में आने वाली रुकावट कम होगी।
  • सुरक्षा बलों और सरकारी कर्मचारियों की चुनावी ड्यूटी का दबाव घटेगा।
  • कुछ अध्ययनों में मतदाता भागीदारी बढ़ने और प्रशासनिक दक्षता में सुधार की संभावना जताई गई है। 
    इसके नुकसान और चुनौतियां को भी जानना जरूरी है
  • कई राज्यों के कार्यकाल को घटाना या बढ़ाना संवैधानिक और राजनीतिक विवाद पैदा कर सकता है।
  • एक साथ चुनाव होने पर राष्ट्रीय मुद्दे क्षेत्रीय मुद्दों पर हावी हो सकते हैं।
  • बड़े राष्ट्रीय दलों को अपेक्षाकृत अधिक लाभ मिलने की आशंका जताई जाती है।
  • यदि किसी राज्य सरकार या केंद्र सरकार का कार्यकाल बीच में समाप्त हो जाए तो चुनावी चक्र बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होगा।
  • एक साथ चुनाव कराने के लिए बड़ी संख्या में ईवीएम, सुरक्षा बल और प्रशासनिक संसाधनों की जरूरत पड़ेगी। 
    इसके पक्ष में क्या तर्क हैं?
  • कोविंद समिति, नीति आयोग और विधि आयोग समय-समय पर चुनावी चक्र को एक करने की सिफारिश कर चुके हैं।
  • समर्थकों का कहना है कि इससे शासन की निरंतरता बढ़ेगी और नीति निर्माण पर चुनावी असर कम होगा।बार-बार चुनावों से होने वाले सार्वजनिक और निजी खर्च में कमी आएगी। 

लेकिन विपक्ष की चिंताएं क्या हैं?

कई विपक्षी दलों और विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे संघीय ढांचे वाले देश में सभी राज्यों को एक चुनावी चक्र में बांधना राज्यों की राजनीतिक स्वायत्तता को प्रभावित कर सकता है। आलोचकों का तर्क है कि राष्ट्रीय और स्थानीय मुद्दों के मिश्रण से मतदाताओं की प्राथमिकताएं प्रभावित हो सकती हैं। व्यापक संवैधानिक संशोधनों और राजनीतिक सहमति के बिना इसे लागू करना आसान नहीं होगा। 

देश में पहले भी हो चुका है एक साथ चुनाव, जानिए कब?

भारत में 1952 से 1967 तक लोकसभा और अधिकांश राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ होते थे। हालांकि 1967 के बाद कई राज्यों में सरकारें समय से पहले गिरने लगीं। 1968-69 में कई विधानसभाएं भंग हुईं और 1970 में लोकसभा भी अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले भंग हो गई। इसके बाद चुनावी चक्र टूट गया और राज्यों व केंद्र के चुनाव अलग-अलग समय पर होने लगे। 

लेकिन बार-बार चुनाव देश में आर्थिक बोझ बढ़ाता है

पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में माना है कि देश में बार-बार होने वाले चुनाव प्रशासनिक संसाधनों, वित्तीय खर्च और नीतिगत निर्णयों को प्रभावित करते हैं। समिति ने लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने तथा बाद के चरण में स्थानीय निकाय चुनावों को भी निर्धारित समय सीमा में जोड़ने की सिफारिश की है। लॉ कमीशन के पूर्व सदस्य और मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के लॉ कॉलेज के डीन आनंद पालीवाल का कहना है कि संविधान में चरणबद्ध तरीके से ‘एक देश-एक चुनाव’ लागू करने की गुंजाइश मौजूद है। इसके लिए कुछ राज्यों में चुनाव पहले कराए जा सकते हैं या सीमित अवधि के लिए कार्यकाल बढ़ाया जा सकता है। हालांकि इसके लिए संसद में आवश्यक संशोधन और व्यापक राजनीतिक सहमति जरूरी होगी।

बता दें कि जेपीसी को अपनी रिपोर्ट 2026 के मानसून सत्र के अंतिम सप्ताह के पहले दिन तक सौंपनी है। रिपोर्ट में विभिन्न राज्यों, राजनीतिक दलों, विशेषज्ञों और संस्थाओं से मिले सुझावों के आधार पर सिफारिशें शामिल की जाएंगी। इसके बाद संसद में इस विषय पर आगे की प्रक्रिया तय होगी।

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