दहेज पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा- 'जिनसे आप दहेज के पैसे लेते हैं, उन्हीं को भिखारी कहते हैं, जमानत नहीं मिलेगी'

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सुप्रीम कोर्ट ने दहेज उत्पीड़न को लेकर समाज को कड़ा संदेश दिया है। अदालत ने बहुओं और बेटियों के अपमान पर बेहद सख्त रुख अपनाया है। एक मामले की सुनवाई के दौरान देश की सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि पुरुषों को शादी के बाद किसी और की बेटियों और उनके परिवारों का अपमान करने का कोई अधिकार नहीं है। सुनवाई के दौरान अदालत ने कड़े शब्दों में पूछा, 'जिनसे आप पैसे लेते हैं, उन्हें ही आप भिखारी कैसे कह सकते हैं?' इसी सख्त रुख के साथ न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने आरोपी पति और उसके परिवार को कोई राहत देने से इनकार कर दिया और उन्हें जेल भेजने का फैसला किया।

दरअसल, यह पूरा मामला दहेज मृत्यु और आत्महत्या के लिए उकसाने से जुड़ा था। इस मामले में आरोपी पक्ष अदालत से कानूनी राहत की उम्मीद कर रहा था। हालांकि, सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार दूल्हे के परिवार के पिछले व्यवहार पर गहरी नाराजगी जताई। न्यायाधीशों का स्पष्ट मानना था कि ऐसे गंभीर मामलों में ढील देने से समाज में गलत संदेश जाएगा। यही कारण है कि अदालत ने आरोपियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने हमारे समाज की इस कठोर वास्तविकता पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने सवाल किया, 'आखिर लड़के लड़कियों से शादी ही क्यों करते हैं, अगर बाद में उन्हें उसी लड़की और उसके पूरे परिवार का अपमान करना है?'

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इस दौरान जब याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल पर भारतीय दंड संहिता की धारा 498A (दहेज उत्पीड़न) के तहत ही आरोप लगाया गया है, तो सुप्रीम कोर्ट ने इसे पूरी तरह खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने वकील की दलील की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि आपको तो खुश होना चाहिए कि उन पर केवल धारा 498A के तहत ही आरोप लगाया गया है, जिसमें केवल 3 साल की सजा का प्रावधान है।

इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने शादी के बाद ससुराल पक्ष द्वारा लड़कियों के आर्थिक शोषण पर भी गहरी चिंता जताई। इस दौरान न्यायमूर्ति नागरत्ना ने दूल्हे के परिवार की आलोचना करते हुए कहा कि आजकल शादी के बाद ससुराल वाले लड़की और उसके माता-पिता का पूरी तरह शोषण करने, यानी उनसे पैसे ऐंठने की ही कोशिश करते हैं।

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इतना ही नहीं, अदालत ने लड़की के माता-पिता से पैसे मांगने और फिर उनका अपमान करने की प्रथा को बेहद शर्मनाक बताया। पीठ ने स्पष्ट किया कि अब समाज को यह संदेश देना चाहिए कि कोई भी परिवार किसी की बेटी को अपने घर लाकर उसके माता-पिता को मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना नहीं दे सकता। आरोपी की याचिका खारिज करते हुए पीठ ने संकेत दिया कि देश का कानून अब बहुओं और बेटियों के सम्मान की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है।

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