महाराष्ट्र की 'मेरी लाडली बहन योजना' से 92 लाख महिलाएं क्यों हुईं बाहर? जानिए क्या है वजह

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महाराष्ट्र सरकार की लोकप्रिय 'मुख्यमंत्री मेरी लाडली बहन योजना' को लेकर एक महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। इस योजना के तहत पंजीकृत हर 10 में से लगभग 4 महिलाओं को सत्यापन के बाद योजना से बाहर कर दिया गया है। आंकड़ों के अनुसार, ऐसी अयोग्य महिलाओं की संख्या लगभग 92 लाख तक पहुंचती है। हालांकि, राज्य सरकार ने आधिकारिक रूप से अब तक केवल 80 लाख लाभार्थियों के नाम हटाए जाने की बात स्वीकार की है।

एक अंग्रेज़ी अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 92 लाख हटाए गए लाभार्थियों में से करीब 62 लाख eKYC (इलेक्ट्रॉनिक 'अपने ग्राहक को जानें') प्रक्रिया पूरी नहीं कर सके। बाकी महिलाओं को इसलिए अयोग्य माना गया क्योंकि लगभग 16 लाख (17 प्रतिशत) महिलाओं की वार्षिक पारिवारिक आय योजना के लिए निर्धारित 2.5 लाख रुपये की सीमा से अधिक थी।

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लगभग 4.42 लाख (4.8 प्रतिशत) लाभार्थियों ने सत्यापन के दौरान बताया कि वे या उनके परिवार का कोई सदस्य सरकारी कर्मचारी था। लगभग 3.6 लाख (3.9 प्रतिशत) लाभार्थी पहले से ही 'संजय गांधी निराधार योजना' के तहत लाभ प्राप्त कर रहे थे। लगभग 2.5 लाख (2.7 प्रतिशत) मामलों में, एक ही परिवार के दो से अधिक सदस्य लाभ प्राप्त कर रहे थे। लगभग 1.8 लाख (2 प्रतिशत) लोग अधिकतम आयु सीमा 65 वर्ष से अधिक उम्र के थे। जिला स्तरीय सत्यापन के दौरान लगभग 1.7 लाख (1.8 प्रतिशत) मामलों में गड़बड़ी पाई गई। लगभग 29,000 पुरुष और लगभग 8,000 सरकारी कर्मचारी भी ऐसे पाए गए, जो अयोग्य होने के बावजूद लाभ ले रहे थे।

इस कार्य में शामिल अधिकारियों का अनुमान है कि सत्यापन के बाद हटाए गए लाभार्थियों को उनकी भुगतान राशि बंद होने से पहले कुल लगभग 14,000 करोड़ रुपये प्राप्त हुए थे। अधिकारियों ने बताया कि जिनकी भुगतान राशि बंद की गई थी, उन्हें औसतन 10 महीने तक सहायता मिली थी।

यह योजना 2.5 लाख रुपये से कम वार्षिक आय वाले परिवारों की 21 से 65 वर्ष की महिलाओं को हर महीने 1,500 रुपये प्रदान करती है। सरकारी कर्मचारी, आयकरदाता और कुछ अन्य कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी इसमें शामिल नहीं हैं। यह योजना वर्तमान में 1.5 करोड़ से अधिक महिलाओं को कवर करती है। सितंबर 2025 में सत्यापन प्रक्रिया शुरू होने से पहले लाभार्थियों की संख्या लगभग 2.43 करोड़ थी।

रिपोर्टों के अनुसार, सरकार ने शुरुआत में योजना के लिए कम बजट का अनुमान लगाया था, लेकिन जब बड़ी संख्या में महिलाएं इसके दायरे में शामिल हुईं, तो मूल बजट कम पड़ गया। इसके कारण सरकार को बीच में ही अतिरिक्त धनराशि जोड़नी पड़ी, जिससे कुल खर्च 60,000 करोड़ रुपये से अधिक हो गया।

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भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने योजना के वित्तीय प्रबंधन को लेकर सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 2024-25 के लिए महाराष्ट्र के वित्तीय मामलों के ऑडिट में CAG ने बजट अनुमान, व्यय नियंत्रण और वित्तीय प्रबंधन में बड़ी कमियां बताई थीं। इनमें लगभग 3,541 करोड़ रुपये का बिना किसी कारण अतिरिक्त खर्च, तत्काल उपयोग की आवश्यकता न होने के बावजूद सरकारी जमा खातों में 15,586 करोड़ रुपये का संग्रह तथा कमजोर वित्तीय नियंत्रण शामिल थे। CAG ने सिफारिश की थी कि बड़ी प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (Direct Benefit Transfer) योजनाओं के लिए बजट बनाते समय लाभार्थियों की संख्या और धनराशि की आवश्यकता का अधिक सटीक आकलन किया जाए।

एक अंग्रेज़ी अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट का जवाब देते हुए, महिला एवं बाल विकास मंत्री अदिति तटकरे ने कहा कि विधानसभा चुनाव के कार्यक्रम और आचार संहिता के कारण योजना शुरू होने के तुरंत बाद अनिवार्य eKYC प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकी। उन्होंने कहा कि भुगतान बंद होने से पहले लाभार्थियों को अनिवार्य eKYC प्रक्रिया पूरी करने के लिए बार-बार अवसर दिए गए थे। मंत्री ने कहा, "ऐसा नहीं है कि सरकार ने उन्हें हटा दिया। जिन्होंने पंजीकरण कराया था और जो पात्र थे, उन्हें eKYC प्रक्रिया पूरी होने तक लाभ मिलता रहा।"

राज्य सरकार ने इस योजना के लिए बजट आवंटन भी 2025-26 में 36,000 करोड़ रुपये से घटाकर चालू वित्तीय वर्ष में 26,500 करोड़ रुपये कर दिया है, जो लगभग 9,500 करोड़ रुपये की कमी है। हालांकि, मासिक सहायता राशि 1,500 रुपये से बढ़ाकर 2,100 रुपये करने का महायुति सरकार का चुनावी वादा अभी तक पूरा नहीं हुआ है।

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