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10 हजार KM लंबी बादलों की पट्टी, इस तारीख तक हो सकती है मूसलाधार बारिश
इन दिनों भारत के मौसम में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है, मॉनसून की बारिश कई इलाकों में सुस्त पड़ चुकी थी, लेकिन अब एक बड़ी मौसमी घटना अपेक्षा जगा रही है. भारत के पूर्व में बंगाल की खाड़ी से शुरू होकर मध्य प्रशांत महासागर तक 7000 से 10000 किलोमीटर लंबा इंटरट्रॉपिकल कन्वरजेंस जोन (ITCZ) बन गया है l
यह जोन कई ट्रॉपिकल सिस्टम को अपने अंदर समेटा हुआ है, जो तेजी से एक्टिव होते नज़र आते है. अगर यह जोन भारत की ओर करीब आया तो जुलाई के आखरी सप्ताह में बारिश वापस आ सकती है. lTCZ क्या होता है? यह पृथ्वी की भूमध्य रेखा के आसपास का वह क्षेत्र है, जहां उत्तर और दक्षिण से आने वाली ट्रेड विंड्स आपस में मिलती हैं
इस क्षेत्र में गर्म और नमी से भरी हवा ऊपर उठती है, जिससे घने बादल बनते हैं और अच्छी बारिश होती है। आमतौर पर मॉनसून के दौरान ITCZ भारत के ऊपर सक्रिय हो जाता है, लेकिन इस बार यह अपनी सामान्य स्थिति से काफी पूर्व में बना हुआ है। यह क्षेत्र बंगाल की खाड़ी से लेकर मध्य प्रशांत महासागर तक फैला हुआ है। इसके भीतर कई ट्रॉपिकल सिस्टम विकसित हो रहे हैं, जो उत्तर-पश्चिम दिशा में यानी भारत की ओर बढ़ रहे हैं। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इनमें से कोई एक सिस्टम भी मजबूत होकर आगे बढ़ता है, तो देश के कई हिस्सों में जोरदार बारिश का दौर शुरू हो सकता है।
इस बार ITCZ के पूर्व की ओर खिसकने की बड़ी वजह वैश्विक तापमान में बदलाव, समुद्र की सतह का बढ़ता तापमान और दूसरे जलवायु कारक माने जा रहे हैं। प्रशांत महासागर में बन रही ला-नीना जैसी परिस्थितियां भी इसके पीछे अहम भूमिका निभा सकती हैं।
इस बार ITCZ सामान्य से कहीं ज्यादा विशाल है और करीब 7,000 से 10,000 किलोमीटर तक फैला हुआ है। इसके भीतर कई लो-प्रेशर सिस्टम और ट्रॉपिकल वेव्स सक्रिय हैं, जो धीरे-धीरे पश्चिम की ओर बढ़ते हुए बंगाल की खाड़ी की तरफ आ रहे हैं।
मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर इनमें से कुछ सिस्टम बंगाल की खाड़ी तक पहुंचकर मजबूत हो जाते हैं, तो वे मॉनसून ट्रफ को और सक्रिय कर सकते हैं। इसका असर यह होगा कि पूर्वी, मध्य और उत्तरी भारत में अच्छी और व्यापक बारिश देखने को मिल सकती है।
हालांकि, फिलहाल यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि ये सिस्टम कितनी ताकत के साथ विकसित होंगे और भारत में कितनी बारिश कराएंगे। मौसम वैज्ञानिक लगातार इनकी गतिविधियों पर नजर बनाए हुए हैं।
20 से 30 जुलाई के बीच फिर तेज हो सकता है मॉनसून
मौसम विभाग और अंतरराष्ट्रीय मौसम मॉडल्स के अनुसार, 20 से 30 जुलाई के बीच ये ट्रॉपिकल सिस्टम भारतीय उपमहाद्वीप को प्रभावित कर सकते हैं। यदि ITCZ भारत के और करीब आता है, तो फिलहाल कमजोर पड़ा मॉनसून एक बार फिर सक्रिय हो सकता है।
ऐसे में जिन राज्यों में अभी बारिश की कमी बनी हुई है, वहां अच्छी बारिश की उम्मीद जताई जा रही है। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे इलाकों में मॉनसून दोबारा रफ्तार पकड़ सकता है।
हालांकि, मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ये सिस्टम जरूरत से ज्यादा मजबूत हो गए और चक्रवात में बदल गए, तो कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश, बाढ़ और तेज हवाओं का खतरा भी बढ़ सकता है। इसी वजह से मौसम विभाग लगातार हालात पर नजर बनाए हुए है और लोगों के साथ-साथ किसानों को भी सतर्क रहने तथा जरूरी तैयारियां रखने की सलाह दे रहा है।
ITCZ और भारतीय मॉनसून का क्या है कनेक्शन?
भारतीय मॉनसून की चाल काफी हद तक ITCZ (इंटर ट्रॉपिकल कन्वर्जेंस ज़ोन) की स्थिति पर निर्भर करती है। जब यह जोन उत्तर की ओर बढ़ता है, तो दक्षिण-पश्चिमी मॉनसूनी हवाएं भारत की तरफ ज्यादा सक्रिय हो जाती हैं और बारिश का सिलसिला तेज हो जाता है।
इस बार ITCZ सामान्य स्थिति से पूर्व की ओर बना हुआ है, जिसकी वजह से मॉनसून की रफ्तार प्रभावित हुई है। लेकिन अगर यह जोन पश्चिम की ओर बढ़कर बंगाल की खाड़ी के करीब आता है, तो मॉनसून ट्रफ फिर से मजबूत हो सकती है और देश के कई हिस्सों में बारिश की गतिविधियां बढ़ सकती हैं।
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण ITCZ का व्यवहार पहले की तुलना में ज्यादा अनिश्चित हो गया है। कभी यह सामान्य से अधिक उत्तर की ओर खिसक जाता है, तो कभी दक्षिण की ओर, जिससे कहीं सूखे जैसी स्थिति बनती है तो कहीं अत्यधिक बारिश और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।
यही वजह है कि वैज्ञानिक लगातार ITCZ की गतिविधियों पर नजर रखे हुए हैं, क्योंकि इसकी स्थिति सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई हिस्सों के मौसम को भी प्रभावित करती है
अगर मॉनसून दोबारा सक्रिय होता है, तो यह खेती-किसानी के लिए राहत भरी खबर साबित हो सकती है। जिन इलाकों में बारिश की कमी के कारण धान समेत दूसरी फसलों की बुवाई और रोपाई प्रभावित हुई है, वहां किसानों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है। हालांकि, अगर कम समय में बहुत ज्यादा बारिश होती है, तो निचले इलाकों में जलभराव, बाढ़ जैसी स्थिति और फसलों को नुकसान का खतरा भी बढ़ सकता है। ऐसे में शहरों के ड्रेनेज सिस्टम और स्थानीय प्रशासन की तैयारियों की भी परीक्षा होगी।
वहीं, बंगाल की खाड़ी में ट्रॉपिकल सिस्टम सक्रिय होने की वजह से समुद्र में ऊंची लहरें और खराब मौसम की आशंका बनी रह सकती है। इसलिए मछुआरों को समुद्र में जाने से पहले मौसम विभाग की सलाह का पालन करना चाहिए। साथ ही, किसी भी संभावित आपदा से निपटने के लिए प्रशासन को राहत और बचाव की तैयारियां पहले से दुरुस्त रखने की जरूरत होगी।
आने वाले दिनों में क्या हो सकता है?
यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि आज के दौर में मौसम का सटीक अनुमान लगाना पहले से कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गया है। जलवायु परिवर्तन की वजह से पारंपरिक मौसम चक्र बदल रहे हैं, जिससे मॉनसून का व्यवहार भी लगातार अनिश्चित होता जा रहा है।
भारत जैसे कृषि-प्रधान देश के लिए बेहतर मौसम निगरानी प्रणाली, सटीक पूर्वानुमान और जलवायु के अनुकूल खेती की रणनीति बेहद जरूरी हो गई है। ITCZ जैसे विशाल मौसमी सिस्टम पर नजर रखने के लिए सैटेलाइट, सुपरकंप्यूटर और अंतरराष्ट्रीय मौसम एजेंसियों के बीच सहयोग अहम भूमिका निभाते हैं।
फिलहाल, 7,000 से 10,000 किलोमीटर लंबा ITCZ मौसम वैज्ञानिकों की खास निगरानी में है। यदि इसके भीतर मौजूद ट्रॉपिकल सिस्टम बंगाल की खाड़ी तक पहुंचकर मजबूत होते हैं, तो 20 से 30 जुलाई के बीच भारत के कई हिस्सों में मॉनसून दोबारा सक्रिय हो सकता है और अच्छी बारिश देखने को मिल सकती है।
हालांकि, इन सिस्टम्स की ताकत और इनके वास्तविक असर को लेकर अभी पूरी तरह निश्चित कुछ भी कहना संभव नहीं है। लेकिन अगर परिस्थितियां अनुकूल रहीं, तो यह सिस्टम मॉनसून को नई रफ्तार देने के साथ कई राज्यों में बारिश की कमी भी पूरी कर सकता है।

