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लद्दाख में चीन सीमा तक तीसरा रास्ता…मकसद- आपात स्थिति में हथियार, गोला-बारूद, ईंधन, राशन बिना बाधा पहुंचाया जा सके
ऑल-वेदर होगा यह रास्ता, अब केवल एक रास्ते पर निर्भरता होगी खत्म
नई दिल्ली। लद्दाख में चीन से लगी सीमा पर दुर्गम इलाकों तक सैन्य रसद पहुंचाना भारत सरकार के लिए बड़ी चुनौती रही है। इससे भी बड़ी परेशानी तब होती है जब किसी आपदा या अन्य वजहों से वह रास्ता बाधित हो जाए। इसी जरूरत को देखते हुए लद्दाख में सड़क, सुरंग और अंदरूनी लिंक का ऐसा नेटवर्क तैयार किया जा रहा है, जिसमें सेना किसी एक सप्लाई कॉरिडोर पर निर्भर न रहे। इसका सबसे अहम हिस्सा करीब 298 किलोमीटर लंबा निमू-पदम-दरचा (NPD) मार्ग है, जो हिमाचल की तरफ से जांस्कर होते हुए लद्दाख को जोड़ता है। अभी लद्दाख तक पहुंचने के दो प्रमुख रास्ते श्रीनगर-करगिल-लेह और मनाली-लेह हैं। NPD मार्ग इनके अलावा तीसरा प्रमुख विकल्प बन रहा है। सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) ने मार्च 2024 में इस 298 किमी मार्ग को जोड़ने का काम पूरा किया था। यह रास्ता मनाली को दारचा और निमू के जरिए करगिल-लेह हाईवे से जोड़ता है। इसकी रणनीतिक खासियत यह है कि दूसरे मार्गों की तुलना में यह छोटा है और इसमें केवल एक प्रमुख दर्रा शिंकुन ला पार करना पड़ता है।
ऑल वेदर संपर्क मार्ग बनाने पर जोर
NPD मार्ग को सालभर इस्तेमाल करने योग्य बनाने में शिंकुन ला सुरंग महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। करीब 4.1 किलोमीटर लंबी ट्विन-ट्यूब सुरंग लगभग 15,800 फीट की ऊंचाई पर बनाई जा रही है। इसके पूरा होने के बाद यह मार्ग लद्दाख के लिए तीसरा ऑल वेदर संपर्क मार्ग बनने की उम्मीद है। बीआरओ के मुताबिक शिंकुन ला सुरंग को निमू-पदम-रोड से जुड़ी प्रमुख परियोजना के रूप में दर्ज किया गया है। इस रास्ते का फायदा केवल सेना की आवाजाही तक सीमित नहीं रहेगा। जांस्कर घाटी और लाहौल-स्पीति जैसे दूरदराज इलाकों को भी बेहतर संपर्क मिलेगा। इससे स्थानीय कारोबार, पर्यटन और जरूरी सामान की आवाजाही में सुधार हो सकता है। हालांकि सैन्य दृष्टि से इसका सबसे बड़ा महत्व यह है कि श्रीनगर और मनाली वाले रास्तों के अलावा सेना के पास लद्दाख पहुंचने के लिए एक अलग दिशा का विकल्प रहेगा।
जोजिला सुरंग से श्रीनगर वाले रास्ते को भी मजबूती
दूसरी तरफ श्रीनगर-करगिल-लेह मार्ग को भी हर मौसम में अधिक भरोसेमंद बनाने पर काम चल रहा है। जून 2026 में जोजिला टनल परियोजना की मुख्य सुरंग में बड़ा निर्माण चरण पूरा हुआ। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के मुताबिक, यह सुरंग लद्दाख के साथ सालभर संपर्क मजबूत करेगी और सेना, उपकरण, सप्लाई तथा लॉजिस्टिक्स की आवाजाही को अधिक तेज और प्रभावी बनाने में मदद करेगी।
मौजूदा सड़क पर सर्दियों में आवाजाही प्रभावित हो जाती है
जोजिला क्षेत्र में भारी बर्फबारी और हिमस्खलन के कारण मौजूदा सड़क पर सर्दियों में आवाजाही प्रभावित होती रही है। सुरंग बनने के बाद इस संवेदनशील हिस्से पर निर्भरता कम होगी। परियोजना से जोजिला पार करने में लगने वाला समय भी काफी घटने की उम्मीद है।
कारगिल-लेह क्षेत्र में 18 हजार करोड़ की परियोजनाएं
केंद्र सरकार के मुताबिक, कारगिल और लेह-लद्दाख के बीच करीब 18 हजार करोड़ रुपए की सड़क और सुरंग परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। इनमें कारगिल-जांस्कर-पदम हाईवे भी शामिल है, जो जांस्कर क्षेत्र तक पहुंच बेहतर करने के साथ रणनीतिक संपर्क और सेना की आवाजाही को मजबूत करेगा। लेह में नॉर्थ और साउथ बाईपास भी विकसित किए जा रहे हैं, ताकि श्रीनगर, मनाली और खारदुंग ला की ओर जाने वाले वाहनों को शहर के भीतर से गुजरने की जरूरत कम हो।
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इसी नेटवर्क में एक और महत्वपूर्ण परियोजना फोटू ला पास है। सरकार के अनुसार, लद्दाख में NH-1 पर प्रस्तावित 2.65 किमी लंबी यह सुरंग भारी बर्फबारी, हिमस्खलन और ब्लैक आइस से प्रभावित हिस्से को बायपास करेगी। इससे श्रीनगर-लेह कॉरिडोर पर दूरी करीब 8.5 किमी और यात्रा समय लगभग 23 मिनट तक कम होने की उम्मीद है। रणनीतिक रूप से इसका उद्देश्य रक्षा काफिलों और जरूरी सप्लाई की निर्बाध आवाजाही को मजबूत करना भी है।
लद्दाख के भीतर भी बन रहे वैकल्पिक लिंक, ताकि आपदा में दिक्कत न हो
लद्दाख पहुंचने के बाद भी सेना की रसद व्यवस्था किसी एक सड़क पर निर्भर न रहे, इसके लिए अंदरूनी क्षेत्रों में वैकल्पिक लिंक तैयार किए जा रहे हैं। हनुथांग-तुरतुक, खाल्त्से-बटालिक और करगिल-दुमगिल जैसे मार्ग इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं। खारदुंग ला और बटालिक क्षेत्र में सुरंग परियोजनाओं पर भी काम आगे बढ़ रहा है। इसका सीधा मतलब यह है कि यदि किसी इलाके में भूस्खलन, हिमस्खलन, बाढ़, पुल को नुकसान या किसी अन्य कारण से मुख्य सड़क बंद होती है तो दूसरे मार्ग से आवाजाही बनाए रखने की क्षमता विकसित की जाए।
सर्दियों में सेना को रसद की नहीं होगी कमी
लद्दाख के ऊंचाई वाले इलाकों में सर्दियों से पहले सेना को राशन, ईंधन, गोला-बारूद और अन्य जरूरी सामग्री का बड़ा भंडार तैयार रखना पड़ता है। लंबे समय तक रास्ते बंद रहने की आशंका के कारण पहले से स्टॉकिंग जरूरी होती है। ऑल वेदर मार्गों का नेटवर्क बढ़ने से इस व्यवस्था में अधिक लचीलापन आएगा और जरूरत के मुताबिक सालभर सप्लाई भेजना आसान होगा। साथ ही आधुनिक युद्ध में सड़क और पुल ही चुनौती नहीं हैं। ड्रोन हमलों से ईंधन डिपो, स्टोरेज और लॉजिस्टिक्स केंद्र भी प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए सेना की नई लॉजिस्टिक्स व्यवस्था में निगरानी, सुरक्षित संचार, काउंटर-ड्रोन सिस्टम और फॉरवर्ड स्टोरेज जैसी क्षमताओं को भी महत्व दिया जा रहा है।
लद्दाख में सैन्य बुनियादी ढांचों पर काम करना इसलिए जरूरी
2020 में भारत-चीन सीमा पर तनाव के बाद लद्दाख में सैन्य बुनियादी ढांचे पर तेजी से काम हुआ। पहले प्राथमिकता अग्रिम इलाकों तक सड़क और जरूरी बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने की थी। अब जोर केवल पहुंच बनाने पर नहीं, बल्कि एक से अधिक रास्तों वाला ऐसा नेटवर्क तैयार करने पर है, जिसमें किसी एक मार्ग के बाधित होने पर भी सैन्य आपूर्ति जारी रखी जा सके। NPD मार्ग, शिंकुन ला और जोजिला जैसी परियोजनाएं इसी व्यापक रणनीतिक बदलाव की महत्वपूर्ण कड़ियां हैं।

