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महिला मैनेजर को मैटरनिटी लीव से लौटने पर क्लर्क का काम सौंपा गया, अब कोर्ट ने उन्हें बड़ा मुआवजा दिलाया
जब 2.6 लाख रुपए प्रति माह कमाने वाली एक महिला काम पर वापस लौटीं, तो उन्हें निचले पद पर रखा गया। उनका वेतन और ग्रेड यथावत रहा, लेकिन उन्हें सौंपा गया काम प्रबंधकीय कर्तव्यों के बजाय लिपिक स्तर का था। इसे अपमान मानते हुए, महिला ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया। कोर्ट ने कंपनी को उन्हें 10 लाख रुपए मुआवजा और 1.5 लाख रुपए मुकदमे का खर्च देने का आदेश दिया।
31 अगस्त को, दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश सचिन दत्ता ने अपने आदेश में कहा था कि, 'किसी भी परिस्थिति में मातृत्व को कार्यस्थल पर अपमान का कारण बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती।' हाईकोर्ट के आदेश में कहा गया है कि, 'अनुच्छेद 14, 15, 21 और 42 को ध्यानपूर्वक पढ़ने से इसमें कोई संदेह नहीं है कि गर्भावस्था और मातृत्व को पेशेवर नुकसान, पदावनति, दर्जे में कमी या करियर की प्रगति से इनकार करने के कारण नहीं माना जा सकता। ऐसे कार्य न केवल महिला कर्मचारियों को दिए जाने वाले कानूनी संरक्षण को कमजोर करते हैं, बल्कि समानता, गरिमा, सामाजिक न्याय और मानवीय कार्य वातावरण के प्रति संवैधानिक प्रतिबद्धता को भी कमजोर करते हैं।'
दिल्ली हाईकोर्ट का यह आदेश चार्टर्ड अकाउंटेंट राखी बिष्ट द्वारा दायर याचिका पर आया था। 14 साल का पेशेवर अनुभव रखने वाली राखी ने अक्टूबर 2024 में सॉफ्टवेयर कंपनी हाशीकॉर्प से इस्तीफा दे दिया था। उनके इस्तीफे का कारण कंपनी द्वारा प्रसूति अवकाश से वापस लौटने के बाद निचले पद की पेशकश करना था।
राखी बिष्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट में 50 लाख रुपए का मुआवजा और निजी कंपनियों के लिए सख्त भेदभाव विरोधी दिशानिर्देश बनाने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी। राखी ने अपनी याचिका में बताया था कि, प्रसूति अवकाश पर जाने से पहले, वह अकाउंटिंग मैनेजर के रूप में काम करती थीं।
5 लोगों का स्टाफ उन्हें रिपोर्ट करता था। हालांकि, छुट्टी के बाद जब वह काम पर वापस लौटीं, तो उन्हें ट्रेजरी विभाग में नियुक्त कर दिया गया। यह भूमिका उनके पद से 3 स्तर नीचे की थी। राखी को प्रबंधकीय पद पर नियुक्त किए जाने के बावजूद, काम लिपिक स्तर का सौंपा गया था।
कंपनी ने दलील दी थी कि, राखी बिष्ट को डिमोट नहीं किया गया था। उनका वेतन भी कम नहीं किया गया था, न ही उनका पद डाउनग्रेड किया गया था। उनकी वरिष्ठता भी यथावत थी। कंपनी में ऐसी परिस्थितियां पैदा हो गई थीं जिनके कारण उनकी भूमिका में बदलाव करना जरूरी हो गया था। कंपनी ने यह भी बताया था कि, राखी को इस अवधि के दौरान 10 प्रतिशत वेतन वृद्धि भी दी गई थी।
कोर्ट ने पाया कि, राखी के काम पर लौटने से पहले, नियोक्ता ने उनके सहकर्मियों से पूछना शुरू कर दिया था कि क्या उनके पास उन्हें सौंपने के लिए कोई काम है। राखी की पिछली जगह भरने से पहले या वैकल्पिक विकल्पों पर विचार करते समय उनसे सलाह नहीं ली गई थी। उन्हें उनके पद में बदलाव या उनकी जगह लेने वाली भूमिका के लिए कोई कारण भी नहीं बताया गया था।
कोर्ट ने कहा कि प्रसूति अवकाश से लौटने वाली महिला आम तौर पर छुट्टी पर जाने से ठीक पहले जिस पद पर काम कर रही थी, उसी पद पर वापस लौटने की हकदार है। यदि उचित कारणों से वह पद समाप्त हो जाता है, तो उसे वेतन, ग्रेड, स्थिति, भूमिका, जिम्मेदारियों, प्रबंधकीय अधिकार और पदोन्नति की संभावनाओं के लिहाज से यथासंभव समकक्ष पद पर नियुक्ति पाने का अधिकार है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि, नियोक्ता को महिला के छुट्टी से काम पर लौटने से पहले उसे बदलावों की जानकारी देनी चाहिए। उन्हें उसके साथ प्रतिस्थापन भूमिका पर चर्चा करनी चाहिए और उसे विश्वास में लेना चाहिए। कोर्ट ने नोट किया था कि, मातृत्व लाभ कानून या सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 मातृत्व के बाद काम पर लौटने के लिए स्पष्ट ढांचा प्रदान नहीं करता है।
इसलिए, कोर्ट ने केंद्र सरकार को गर्भावस्था संबंधी लाभ, भूमिका सुरक्षा, काम पर लौटने में समानता, स्तनपान सहायता, समय पर शिकायत निवारण, निरीक्षण मानकों और कार्यस्थल पर प्रतिशोधात्मक कार्रवाई के खिलाफ सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नियम बनाने या निर्देश जारी करने का निर्देश दिया। यह कार्य 6 महीने के भीतर पूरा करना होगा।
आदेश देते हुए, दिल्ली हाईकोर्ट ने कंपनी को महिला को 10 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया, जो लगभग 4 महीने के वेतन के बराबर है। कानूनी खर्च को कवर करने के लिए अतिरिक्त 1.5 लाख रुपए देने का भी आदेश दिया। कंपनी को 8 सप्ताह के भीतर महिला को दोनों रकम का भुगतान करना होगा। ऐसा करने में विफल रहने पर फैसले की तारीख से 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा।

