फांसी खत्म करने की मांग…लेकिन क्या जहरीले इंजेक्शन या गोली मारने जैसे तरीके कम पीड़ादायक और आसान हैं? 

सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी याचिका, पर कहा- भविष्य में विचार संभव

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नई दिल्ली। क्या फांसी के अलावा कोई और तरीके से मौत की सजा दी जा सकती है, जैसे जहरीले इंजेक्शन लगाकर या गोली मारकर। भारत में फांसी की जो मौजूदा व्यवस्था है, क्या उसमें कोई बदलाव किया जा सकता है? इसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई थी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था में फिलहाल कोई बदलाव करने से इनकार कर दिया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि अभी ऐसा पर्याप्त आधार या ठोस वैज्ञानिक प्रमाण सामने नहीं है, जिसके आधार पर फांसी को असंवैधानिक घोषित किया जा सके।

याचिका में दावा किया गया था कि फांसी की प्रक्रिया क्रूर और अमानवीय है तथा इससे दोषी को अनावश्यक पीड़ा हो सकती है। इसके स्थान पर मौत की सजा लागू करने के लिए जहरीले इंजेक्शन, गोली मारने और अन्य वैकल्पिक तरीकों को अपनाने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि राज्य द्वारा दी जाने वाली सजा भी व्यक्ति की गरिमा और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन के अधिकार के अनुरूप होनी चाहिए।

कोर्ट ने कहा- भविष्य में इस मुद्दे पर दोबारा विचार किया जा सकता है

सुप्रीम कोर्ट का फैसला केवल मौजूदा व्यवस्था को बरकरार रखने तक सीमित रहा। बेंच ने यह स्पष्ट किया कि भविष्य में नए और विश्वसनीय वैज्ञानिक, मेडिकल या अनुभवजन्य प्रमाण सामने आने पर इस मुद्दे पर दोबारा विचार संभव है। यानी कोर्ट ने वैकल्पिक तरीकों की संवैधानिक जांच का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं किया है। 

केंद्र सरकार समिति गठन कर इसका अध्ययन कर सकती है

कोर्ट ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार चाहे तो विशेषज्ञों की समिति गठित कर फांसी की मौजूदा व्यवस्था का व्यापक अध्ययन करा सकती है। ऐसी समिति यह देख सकती है कि क्या कोई दूसरा तरीका मौत की सजा को लागू करते समय पीड़ा कम करने और दोषी की गरिमा बनाए रखने के लिहाज से बेहतर हो सकता है।

वरिष्ठ वकील ने अन्य विकल्प को लेकर दायर की थी याचिका

वरिष्ठ वकील ऋषि मल्होत्रा ने 2017 में सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका दायर की थी। इसमें मौत की सजा लागू करने के तरीके को लेकर वैज्ञानिक और चिकित्सकीय पहलुओं की जांच की मांग की गई थी। याचिका में कहा गया था कि फांसी की प्रक्रिया में काफी समय लग सकता है, जबकि याचिकाकर्ता ने गोली मारने और जहरीले इंजेक्शन को अपेक्षाकृत कम समय में मौत देने वाले विकल्प के तौर पर पेश किया था। याचिका में उस समय लागू दंड प्रक्रिया संहिता यानी CrPC की धारा 354(5) को असंवैधानिक घोषित करने की मांग भी की गई थी। इस प्रावधान में मौत की सजा पाए व्यक्ति को गर्दन से तब तक लटकाने की व्यवस्था थी, जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए।
हालांकि, अब आपराधिक प्रक्रिया से जुड़े नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के लागू होने के बाद यही प्रावधान धारा 393(5) में है। इसमें भी मौत की सजा मिलने पर दोषी को गर्दन से तब तक लटकाने का निर्देश देने की व्यवस्था बरकरार रखी गई है।

केंद्र ने फांसी को तेज और आसान तरीका बताया था

केंद्र सरकार ने 2018 में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में मौजूदा व्यवस्था का बचाव किया था। सरकार का कहना था कि फांसी तेज और आसान तरीका है और इससे कैदी की पीड़ा अनावश्यक रूप से नहीं बढ़ती। केंद्र ने जहरीले इंजेक्शन और गोली मारने को फांसी से कम पीड़ादायक मानने के दावे को भी स्वीकार नहीं किया था। मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से फांसी की प्रक्रिया से जुड़ा बेहतर वैज्ञानिक और मेडिकल डेटा मांगा था। इसमें मौत होने में लगने वाला समय, संभावित पीड़ा और मौजूदा व्यवस्था से जुड़े दूसरे पहलुओं की जानकारी शामिल थी। कोर्ट ने विशेषज्ञ समिति गठित करने की संभावना पर भी विचार किया था।

दूसरे देशों में फांसी के अलावा कई तरीके

भारत में मौत की सजा के लिए फांसी कानूनी तरीका है, लेकिन दुनिया के कुछ अन्य देशों में अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं। अमेरिका में जहरीले इंजेक्शन सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला तरीका है। इसके अलावा कुछ अमेरिकी राज्यों में इलेक्ट्रिक चेयर, जहरीली गैस और फायरिंग स्क्वॉड जैसे विकल्प भी कानून में मौजूद हैं। दुनिया में मौत की सजा देने के तरीके देश के कानून के अनुसार अलग हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल के 2025 के आंकड़ों के मुताबिक उस साल दर्ज फांसी की प्रमुख विधियों में फांसी, जहरीला इंजेक्शन, गोली मारना, सिर कलम करना और नाइट्रोजन गैस से दम घोंटना शामिल थे। 2025 में कम से कम 17 देशों में 2,707 लोगों को फांसी दी गई, हालांकि चीन के आंकड़े गुप्त होने के कारण वास्तविक वैश्विक संख्या इससे अधिक हो सकती है।

2020 में निर्भया केस के दोषियों को फांसी दी गई थी

2012 के गैंगरेप और हत्या मामले में चार दोषियों को 20 मार्च 2020 को तिहाड़ जेल में फांसी दी गई। दया याचिकाओं और अन्य कानूनी विकल्पों के कारण फांसी की तारीख कई बार आगे बढ़ी, जिससे मौत की सजा की पूरी प्रक्रिया पर व्यापक बहस हुई। वहीं 26/11 मुंबई आतंकी हमले के दोषी अजमल कसाब को 21 नवंबर 2012 को पुणे की यरवदा जेल में फांसी दी गई। जबकि हेतल पारेख के रेप और हत्या के मामले में दोषी धनंजय चटर्जी को 14 अगस्त 2004 को अलीपुर जेल में फांसी दी गई थी। हालांकि जब भी देश में फांसी दिये जाने की बात आती है तो इसके तरीके को लेकर चर्चाएं तेज हो जाती हैं।

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