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महंगाई की जबरदस्त मार…पहले चीनी और अब प्याज ने बिगाड़ा लोगों का बजट, 60-70 रु. किलो पहुंचा दाम, कीमत कब कम होगी?
नई दिल्ली। पहले चीनी और अब बारिश और त्योहारी मांग के बीच प्याज की कीमतों ने आम आदमी की रसोई का बजट बिगाड़ दिया है। करीब दस दिन पहले तक 40 रुपए किलो बिकने वाला प्याज अब कई शहरों के खुदरा बाजार में 65 से 70 रुपए किलो तक पहुंच गया है। इसके उलट चीनी का खुदरा भाव 70 रुपए से घटकर करीब 62 रुपए किलो रह गया है। थोक मंडियों में भी प्याज 45 से 55 रुपए किलो तक बिक रहा है। दिल्ली, चेन्नई, भोपाल और लखनऊ समेत कई शहरों में प्याज का भाव 60 रुपए किलो के पार पहुंच चुका है। इसके साथ ही फल, हरी सब्जियां और दालों जैसी रोजमर्रा की चीजों की कीमतें भी बढ़ी हैं। इससे खासकर मध्यम और कम आय वाले परिवारों का मासिक बजट प्रभावित हो रहा है।
प्याज के साथ हर साल ऐसी स्थिति क्यों बनती है?
सब्जियों की कीमतों में तेजी की बड़ी वजह पिछले दिनों हुई भारी बारिश है। कई इलाकों में खेतों में पानी भरने से फसलों को नुकसान हुआ। दूसरी ओर, दूसरे राज्यों से सब्जियां और प्याज लेकर आने वाले मालवाहक वाहनों की आवाजाही भी प्रभावित हुई। इसका असर मंडियों पर पड़ा और कई जगह रोज आने वाली सब्जियों की मात्रा काफी कम हो गई। लेकिन प्याज की कीमतों का मामला सिर्फ इस मौसम की परेशानी तक सीमित नहीं है। भारत में प्याज के दाम अक्सर अचानक बढ़ते और गिरते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह उत्पादन और खपत के बीच का अंतर नहीं, बल्कि फसल का समय, भंडारण और बाजार में उपलब्धता है।
बड़ा सवाल: जब उत्पादन पर्याप्त हैं तो फिर दाम क्यों बढ़े?
केंद्रीय कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2024-25 में देश में 307.67 लाख मीट्रिक टन प्याज का उत्पादन हुआ था। इस बार उत्पादन करीब 307.37 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है। यानी उत्पादन में बहुत बड़ी गिरावट नहीं है। देश में प्याज की सालाना खपत करीब 200 लाख मीट्रिक टन है। फिर कीमत बढ़ने की वजह क्या है? दरअसल, रबी की फसल मार्च से मई के बीच आती है और कुल उत्पादन में इसका हिस्सा करीब 70% है। यही प्याज 4 से 5 महीने तक स्टोर की जा सकती है। खरीफ की फसल अक्टूबर से दिसंबर के बीच आती है और उत्पादन में करीब 20% हिस्सेदारी रखती है, लेकिन इसे लंबे समय तक रखना मुश्किल होता है। वहीं कुछ खरीफ फसल जनवरी से मार्च के बीच आती है। इसका हिस्सा करीब 10% है और यह खरीफ की फसल से कुछ बेहतर टिकती है। यानी मई-जून से अक्टूबर-नवंबर तक देश की प्याज आपूर्ति का बड़ा हिस्सा रबी की फसल पर निर्भर रहता है।
क्या देश में असली समस्या स्टोरेज की भी है
देश में हर महीने करीब 17 लाख मीट्रिक टन प्याज की खपत होती है। मांग सालभर लगभग बनी रहती है, लेकिन उत्पादन और मंडियों में आवक मौसम के हिसाब से बदलती रहती है। अगर रबी की फसल के दौरान बारिश, सूखा या दूसरी मौसम संबंधी परेशानी होती है तो उत्पादन और गुणवत्ता दोनों प्रभावित हो सकते हैं। अच्छी फसल होने पर भी चुनौती खत्म नहीं होती, क्योंकि उसके बाद लंबे समय तक भंडारण करना पड़ता है।
भारत में बड़ी मात्रा में प्याज अभी भी पारंपरिक तरीके से खुले और हवादार शेड में रखा जाता है। लंबे समय तक रखने पर प्याज सड़ने लगती है, उसका वजन घटता है और क्वालिटी खराब होती है। मौसम खराब होने पर यह नुकसान और बढ़ सकता है।
महाराष्ट्र देश के कुल प्याज उत्पादन का करीब 40% हिस्सा देता है। वहां के किसानों के मुताबिक, इस साल अप्रैल में हुई बेमौसम बारिश से फसल और स्टोरेज क्वालिटी पर असर पड़ा है।
जमाखोरी भी देश की बड़ी परेशानी है
प्याज के कारोबार में जमाखोरी भी कीमतों को प्रभावित करने वाला एक कारक है। अगस्त से नवंबर के बीच जब नई खरीफ फसल पूरी तरह बाजार में नहीं आती, तब कुछ कारोबारी स्टॉक रोककर बाद में ऊंचे दाम पर बेचने की कोशिश करते हैं।
प्याज के महंगा होने के पीछे कीमतों का चक्र भी समझना होगा
प्याज के दामों में उतार-चढ़ाव को भी भली-भांति समझना होगा। जब किसी साल प्याज का भाव बहुत गिरता है तो किसान अगली फसल में इसकी बुवाई कम कर सकते हैं। इससे अगली बार उत्पादन घटता है और कीमतें बढ़ जाती हैं। इसके बाद ऊंचे भाव देखकर किसान ज्यादा प्याज बोते हैं। जब सभी किसान ऐसा करते हैं तो अगले सीजन में बाजार में प्याज की आवक बढ़ जाती है और दाम फिर गिर जाते हैं। इस तरह उत्पादन और कीमत का चक्र चलता रहता है।
अक्टूबर के अंत में मिल सकती है राहत
प्याज के भाव करीब दोगुने हो चुके हैं और आने वाले कुछ हफ्तों में भी तेजी बनी रह सकती है। इसकी वजह मंडियों में कम आवक है। हालांकि अक्टूबर के आखिरी सप्ताह से खरीफ प्याज की आवक शुरू होने की उम्मीद है। इससे बाजार में सप्लाई बढ़ेगी और कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। उपभोक्ता मामलों की सचिव निधि खरे ने भी कहा है कि देश में प्याज के स्टॉक को लेकर चिंता की जरूरत नहीं है। आने वाले महीनों में नई फसल की आवक बढ़ने से कीमतों में राहत मिलने की उम्मीद है।
कीमतें काबू में लाने को सरकार ने शुरू की है ‘कांदा एक्सप्रेस’
कीमतों को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार अपने बफर स्टॉक का इस्तेमाल कर रही है। इस साल प्राइस स्टेबिलाइजेशन फंड के तहत 2 लाख मीट्रिक टन रबी प्याज का बफर स्टॉक रखने का लक्ष्य तय किया गया था। जरूरत पड़ने पर इसी स्टॉक को बाजार में उतारकर कीमतों पर नियंत्रण किया जाता है। सरकार ने प्याज को तेजी से बड़े शहरों तक पहुंचाने के लिए ‘कांदा एक्सप्रेस’ भी शुरू की है। नासिक के सरकारी भंडार से मालगाड़ियों के जरिए दिल्ली, चेन्नई, मदुरै, कोच्चि और गुवाहाटी तक प्याज भेजा जा रहा है।

