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भारतीय अर्थव्यवस्था की असल चुनौती बाकी है! मार्च में धीमी पड़ी इकोनॉमी की रफ्तार, सप्लाई चेन प्रभावित होने से बढ़ा दबाव
पश्चिम एशिया तनाव का असर भारतीय इकोनॉमी पर दिखने लगा, रिटेल महंगाई बढ़ने के और संकेत
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया या जिसे मिडिल ईस्ट भी कह सकते हैं, यहां बढ़ते तनाव और संघर्ष की स्थिति ने भारतीय अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित किया है। वित्त मंत्रालय ने मार्च 2026 की अपनी मंथली इकोनॉमिक रिव्यू रिपोर्ट में स्वीकार किया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार अब धीमी पड़ने लगी है। रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी तनाव, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और सप्लाई चेन में आई बाधाओं ने आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ा दिया है। मंत्रालय का कहना है कि इन बाहरी कारणों से देश के भीतर उत्पादन लागत बढ़ी है, जिसका असर अब ग्रोथ की गति पर साफ दिखाई देने लगा है। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि फरवरी 2026 तक भारतीय अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में थी। घरेलू मांग, इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार और सरकार की नीतिगत पहल की वजह से सप्लाई और डिमांड दोनों मोर्चों पर प्रदर्शन बेहतर रहा। इस दौरान मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर में बढ़त बनी रही। साथ ही वाहन बिक्री और डिजिटल पेमेंट्स, खासकर यूपीआई ट्रांजैक्शंस में लगातार वृद्धि दर्ज की गई, जो मांग की मजबूती का संकेत था।
मार्च में वैश्विक परिस्थितियों में बदलाव ने बदले हालात
हालांकि मार्च 2026 से वैश्विक परिस्थितियों में बदलाव तेजी से सामने आने लगे। मंत्रालय के मुताबिक, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने ऊर्जा बाजार और लॉजिस्टिक्स व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। समुद्री मार्गों पर दबाव बढ़ने से माल ढुलाई की लागत में इजाफा हुआ है, जिसका सीधा असर भारत के उत्पादन क्षेत्र पर पड़ा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इनपुट कॉस्ट बढ़ने से कंपनियों पर दबाव बढ़ा है और आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार महीने-दर-महीने आधार पर कुछ धीमी हुई है।
आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती की वजह ये हैं-
मंत्रालय ने इस सुस्ती के पीछे तीन प्रमुख कारण बताए हैं। पहला, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी, जिससे कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ गई है। दूसरा, समुद्री तनाव के कारण लॉजिस्टिक्स और इंश्योरेंस की लागत में वृद्धि, जिससे माल ढुलाई महंगी हो गई है। तीसरा, जरूरी इनपुट्स की सप्लाई में देरी, जिसका असर खासतौर पर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर पड़ रहा है।
परचेज मैनेजर इंडेक्स में आई कमजोरी
रिपोर्ट में ई-वे बिल जनरेशन में आई कमी और फ्लैश पीएमआई यानी परचेज मैनेजर इंडेक्स के कमजोर आंकड़ों का भी हवाला दिया गया है। मंत्रालय का कहना है कि ये संकेत बताते हैं कि मार्च में आर्थिक गतिविधियों की गति पहले के मुकाबले कुछ धीमी हुई है। राहत की बात यह है कि घरेलू मांग अभी भी बनी हुई है। वाहन रजिस्ट्रेशन और डिजिटल ट्रांजैक्शन के आंकड़े बताते हैं कि उपभोक्ता खर्च पूरी तरह कमजोर नहीं पड़ा है और बाजार में खरीदारी जारी है।
ग्रामीण क्षेत्रों में सेंटीमेंट कुछ कमजोर हुआ
इसके बावजूद रिपोर्ट में ग्रामीण इलाकों को लेकर चिंता जताई गई है। मंत्रालय ने माना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में सेंटीमेंट कुछ कमजोर हुआ है। मांग और सप्लाई के बीच बना यह अंतर इस बात की ओर इशारा करता है कि मौजूदा सुस्ती की मुख्य वजह खपत में गिरावट नहीं, बल्कि बढ़ती लागत और सप्लाई में रुकावटें हैं।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमत का असर अभी दिखना बाकी है…
रिटेल महंगाई को लेकर भी रिपोर्ट में चिंता जताई गई है। मंत्रालय के अनुसार, अभी तक महंगाई बढ़ने की मुख्य वजह खाद्य पदार्थों की कीमतें रही हैं, लेकिन कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमतों का पूरा असर अभी घरेलू बाजार में दिखाई नहीं दिया है। अगर वैश्विक स्तर पर ऊर्जा की कीमतें इसी तरह ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो आने वाले दिनों में महंगाई और बढ़ सकती है।
पिछले पांच महीने की रिटेल महंगाई दर
पिछले महीने फरवरी में रिटेल महंगाई बढ़कर 3.21 प्रतिशत पर पहुंच गई थी। पिछले पांच महीनों के आंकड़े भी लगातार बढ़त का संकेत दे रहे हैं। अक्टूबर में यह 0.25 प्रतिशत थी, जो नवंबर में 0.71 प्रतिशत, दिसंबर में 1.33 प्रतिशत, जनवरी में 2.74 प्रतिशत और फरवरी में 3.21 प्रतिशत तक पहुंच गई।
भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद अभी भी मजबूत
वित्त मंत्रालय ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद अभी भी मजबूत है, लेकिन वैश्विक जोखिम लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में आने वाले समय में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों परिस्थितियों पर कड़ी नजर रखने की जरूरत होगी, ताकि बढ़ती लागत, सप्लाई चेन की बाधाओं और महंगाई के जोखिम को समय रहते नियंत्रित किया जा सके।

