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चीनी पर सरकार और विपक्ष के बीच बढ़ी कड़वाहट…खड़गे का सवाल- आयात की नौबत क्यों आई, सरकार बोली- जमाखोरी बढ़ी
नई दिल्ली। त्योहारों के सीजन से पहले देश में चीनी की कीमतों में तेज उछाल ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने चीनी की बढ़ती कीमतों और घटते स्टॉक को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि त्योहारों से पहले आम लोगों को चीनी की बढ़ती कीमतों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने सरकार से पूछा कि दुनिया के बड़े चीनी उत्पादक देशों में शामिल भारत में ऐसी स्थिति क्यों बनी कि विदेश से चीनी मंगाने की जरूरत पड़ गई।
खड़गे ने सरकार से तीन सवाल किए…
- जब भारत दुनिया के बड़े चीनी उत्पादक और निर्यातक देशों में है, तो देश में चीनी का स्टॉक 9 साल के निचले स्तर पर क्यों पहुंचा?
- सरकार को 10 लाख टन चीनी ड्यूटी-फ्री आयात करने की जरूरत क्यों पड़ी?
- यह कैसा आत्मनिर्भर भारत है, जहां एक तरफ विदेश से चीनी मंगाई जा रही है और दूसरी तरफ गन्ने को एथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है?
10 लाख टन कच्ची चीनी का ड्यूटी-फ्री आयात
चीनी की उपलब्धता बढ़ाने और कीमतों पर लगाम लगाने के लिए केंद्र ने 20 अगस्त को बड़ा फैसला लिया। सरकार ने 31 अक्टूबर 2026 तक 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री आयात की अनुमति दी है। यह कदम घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ाने और त्योहारी सीजन में कीमतों पर दबाव कम करने के लिए उठाया गया है। इस आयात के लिए चीनी मिलों और रिफाइनरियों से 21 से 28 अगस्त तक आवेदन मांगे गए हैं। आयात की गई कच्ची चीनी को रिफाइन कर तैयार चीनी का घरेलू बाजार में 31 अक्टूबर तक बिक्री करना जरूरी होगा।
तीन महीने में 19 रुपए तक महंगी हुई चीनी
देश के कई शहरों में चीनी का खुदरा भाव करीब 70 रुपए किलो तक पहुंच गया है। पिछले तीन महीनों में इसके दाम करीब 40% यानी लगभग 19 रुपए प्रति किलो तक बढ़े हैं। हालांकि, उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 18 अगस्त को देश का औसत खुदरा भाव 52.30 रुपए किलो था, जो एक साल पहले 46.34 रुपए किलो था। यानी राष्ट्रीय औसत स्तर पर भी सालाना आधार पर करीब 13% की बढ़ोतरी दर्ज हुई।
चीनी के साथ गुड़ करीब 24%, चावल 16% और मक्के का आटा 11% तक महंगा हुआ है। बाजार में चीनी की तेजी की एक वजह मिलों के पास बचे स्टॉक में कमी को भी माना जा रहा है। पिछले सीजन में पेराई शुरू होने से पहले मिलों के पास करीब 47 लाख टन चीनी थी, जबकि इस बार यह घटकर करीब 32 लाख टन रह गई है।
सरकार ने एथेनॉल को वजह मानने से किया इनकार
केंद्र सरकार ने चीनी की कीमतों में तेजी के लिए एथेनॉल उत्पादन को जिम्मेदार मानने से इनकार किया है। खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा के मुताबिक देश में घरेलू जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त चीनी उपलब्ध है। सरकार का कहना है कि हालिया तेजी के पीछे मिलों की ओर से कीमत बढ़ाना, जमाखोरी और सट्टेबाजी प्रमुख कारण हैं। सरकार ने कीमतों पर असर डालने वाली दूसरी वजहों में घरेलू उत्पादन में कमी, त्योहारों से पहले मांग बढ़ना, मौसम की वजह से गन्ने की फसल को नुकसान और अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई का दबाव भी गिनाया है।
क्या एथेनॉल में चीनी का इस्तेमाल कम हुआ है?
खाद्य सचिव के मुताबिक एथेनॉल में चीनी का इस्तेमाल पहले की तुलना में कम हुआ है। 2022-23 में एथेनॉल के लिए डायवर्ट की गई चीनी की हिस्सेदारी करीब 12% थी, जो 2025-26 में घटकर लगभग 9% रह गई। मौजूदा सीजन में एथेनॉल के लिए करीब 28 लाख टन चीनी डायवर्ट की गई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, एथेनॉल उत्पादन में मक्के का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ा है।
उत्पादन अनुमान भी घटा
इस सीजन में देश में चीनी उत्पादन करीब 306 लाख मीट्रिक टन (MT) रहने का अनुमान है। शुरुआती अनुमान 343 लाख MT था। रेड रॉट और टॉप बोरर जैसी बीमारियों के अलावा ज्यादा बारिश के कारण खेतों में पानी भरने से उत्पादन प्रभावित हुआ है। हालांकि, मंत्रालय का कहना है कि अक्टूबर में नया पेराई सीजन शुरू होने तक घरेलू खपत पूरी करने के लिए पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी चीनी की कीमतों में तेजी आई है। 2026-27 में वैश्विक स्तर पर करीब 33 लाख MT चीनी की कमी का अनुमान है। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय कीमत 30 जून के 474 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 20 अगस्त को 552 डॉलर प्रति टन हो गई। यानी दो महीने से भी कम समय में 16% से अधिक की बढ़ोतरी हुई।
जमाखोरी रोकने के लिए स्टॉक लिमिट
सरकार ने घरेलू बाजार में कृत्रिम कमी और सट्टेबाजी रोकने के लिए चीनी डीलरों पर स्टॉक लिमिट लागू की है। 1 अगस्त से 30 नवंबर तक डीलरों को अपने स्टॉक की जानकारी सरकार के ऑनलाइन पोर्टल पर हर सप्ताह अपडेट करनी होगी। सरकार के मुताबिक हालिया तेजी मांग-आपूर्ति की वास्तविक स्थिति के अनुरूप नहीं है और कुछ कारोबारियों की जमाखोरी तथा सट्टेबाजी से कीमतों में अस्थिरता बढ़ी है। इसके अलावा, हर महीने 10 टन से ज्यादा चीनी इस्तेमाल करने वाले थोक उपभोक्ताओं के लिए 1 सितंबर से 15 दिन की स्टॉक सीमा लागू होगी। सरकार और राज्यों की संयुक्त टीमें चीनी मिलों में जाकर स्टॉक की जांच भी कर रही हैं।
10 लाख टन आयात से क्या चीनी की कीमतें काबू में आएंगी?
इस तरह केंद्र एक तरफ घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ाने के लिए 10 लाख टन कच्ची चीनी के आयात का रास्ता खोल चुका है, वहीं दूसरी तरफ जमाखोरी और सट्टेबाजी पर नियंत्रण के जरिए कीमतों को काबू में करने की कोशिश कर रहा है। अब त्योहारों के दौरान मांग बढ़ने के बीच यह देखना अहम होगा कि आयातित चीनी बाजार में आने के बाद खुदरा कीमतों पर कितना असर पड़ता है।

