चीनी की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर, इथेनॉल बनाना पड़ा भारी, संकट सुलझाने के लिए सरकार की भागदौड़

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भारत का चीनी बाजार इस समय एक असाधारण संकट से गुजर रहा है। देश के खेतों में गन्ने की पर्याप्त फसल है, इथेनॉल प्रोग्राम के लिए सैकड़ों डिस्टिलरियां भी तैयार हैं और घरेलू आपूर्ति बनाए रखने के लिए सरकार ने निर्यात पर पहले ही प्रतिबंध लगा रखे हैं। फिर भी चीनी की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच रही हैं, जिसके कारण केंद्र सरकार को दशकों से टाले जा रहे विकल्प यानी चीनी आयात करने पर विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। विशेषज्ञ इस संकट के लिए मुख्य रूप से इथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने के बढ़ते इस्तेमाल को जिम्मेदार मान रहे हैं।

आयात की दिशा में आगे बढ़ने की पूर्व तैयारी के रूप में, भारत सरकार चीनी पर लगने वाली 100% आयात ड्यूटी हटाने की योजना बना रही होने की रिपोर्ट मंगलवार को रॉयटर्स  द्वारा दी गई थी।

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चीनी की कीमतों में यह उछाल बेहद संवेदनशील समय पर आया है। भारत में त्योहारों का मौसम करीब आ रहा है, जब मिठाइयों और प्रोसेस्ड फूड की मांग में भारी बढ़ोतरी होती है। दूसरी ओर, भारत सरकार E20 लक्ष्य की ओर बढ़ रही है, इसलिए गन्ने का बड़ा हिस्सा इथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ा जा रहा है। इस स्थिति के कारण ईंधन सुरक्षा और खाद्य वस्तुओं की कीमतों के बीच नीतिगत संतुलन बनाए रखना मुश्किल हो गया है।

चीनी के प्रमुख व्यापार केंद्र माने जाने वाले महाराष्ट्र के कोल्हापुर में थोक चीनी की कीमतें अगस्त की शुरुआत से अब तक लगभग 20% बढ़कर क्विंटल प्रति रु. 5,350 के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार मंगलवार को देश में चीनी की औसत खुदरा कीमत किलो प्रति रु. 52.3 दर्ज की गई थी।

कुछ बाजारों में यह उछाल और अधिक तेज रहा है। पंजाब में चीनी की खुदरा कीमत किलो प्रति रु. 65 के आसपास पहुंच गई है, जबकि मुंबई, भोपाल और अन्य बाजारों के कुछ इलाकों में कीमतें रु. 58 से 63 प्रति किलो की रेंज में पहुंच गई हैं।

आने वाले दिनों में गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे प्रमुख त्योहार आने वाले हैं, इसलिए चीनी की कमी त्योहारों में महंगाई का रूप न ले, इसके लिए सरकार तत्काल कदम उठा रही है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल कार्यक्रम से चीनी जैसी खाद्य वस्तुओं की कीमतें प्रभावित न हों, इसके लिए उचित संतुलन बनाए रखना जरूरी है।

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चीनी की कीमतों में हुई इस बढ़ोतरी की जड़ में आपूर्ति की कमी है। कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने और E20 लक्ष्य हासिल करने के लिए भारत ने इथेनॉल बनाने के लिए गन्ने का इस्तेमाल बढ़ाया है। ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन (AIDA) के अनुसार, सरकार ने इस उद्देश्य के लिए पिछले कुछ वर्षों में दर्जनों डिस्टिलरियां स्थापित करने पर जोर दिया है। इसके कारण 2025 के मध्य तक 499 स्थानों पर इथेनॉल उत्पादन क्षमता सालाना लगभग 1,822 करोड़ लीटर तक पहुंच गई है।

AIDA द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, इथेनॉल के कच्चे माल में गन्ने की हिस्सेदारी लगभग 30-35% है, जबकि बाकी मात्रा मक्का और चावल से प्राप्त होती है। गन्ने का यह डायवर्जन चीनी बाजार पर सीधा असर डाल रहा है।

कृषि विशेषज्ञ और लखनऊ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सुधीर पंवार ने बताया कि, इथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने की मात्रा डायवर्ट करने के कारण भारत में चीनी की कीमतें ऊंचे स्तर पर पहुंची हैं। पंवार का मानना है कि चीनी बाजार में इतनी ज्यादा तंगी नहीं होनी चाहिए थी और वे संदेह व्यक्त करते हैं कि उत्पादन के अलावा अन्य कारक भी इस कीमत वृद्धि के लिए जिम्मेदार हैं।

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उन्होंने आगे कहा, चीनी के लिए बाजार का पूर्वानुमान इतना खराब नहीं था, जो दर्शाता है कि स्टॉकिस्टों और खुदरा व्यापारियों द्वारा बाजार में कृत्रिम कमी या सट्टेबाजी की जा रही है। अगर गन्ने को इथेनॉल उत्पादन की ओर नहीं मोड़ा गया होता तो कीमतें नियंत्रण में रहतीं। उनकी मुख्य चिंता यह है कि भारत की फ्यूल पॉलिसी खाद्य पदार्थों की कीमत की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।

उत्तर प्रदेश प्लानिंग कमीशन के पूर्व सदस्य रह चुके पंवार ने बताया कि, इथेनॉल की ओर गन्ने का डायवर्जन चीनी की कीमत पर नहीं होना चाहिए और इससे खाद्य पदार्थों की कीमतें नहीं बढ़नी चाहिए। हमें गन्ने का उत्पादन, भारत की चीनी की जरूरत, साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्थिति और कीमत का सटीक अनुमान चाहिए। इसके अलावा फसल की बीमारी के कारण भी आपूर्ति की स्थिति पर असर पड़ा है। उन्होंने आगे कहा कि, फसल में बीमारी आने के कारण 2025-26 में खासकर उत्तर प्रदेश में गन्ने की उत्पादकता और चीनी की रिकवरी घट गई है। यह स्थिति तब पैदा हुई है जब गन्ने की बुवाई का क्षेत्र बढ़ा था।

'टाइम्स ऑफ इंडिया' की रिपोर्ट के अनुसार, देश में बारिश की कमी के बावजूद, जुलाई में गन्ने की बुवाई अन्य फसलों (जैसे धान, दलहन, कपास और तिलहन) की तुलना में पिछले साल की समान अवधि से 1.5% अधिक थी। यह स्थिति और जटिल सवाल खड़ा करती है: अगर बुवाई का क्षेत्र बढ़ा है, तो फिर आपूर्ति कम क्यों है?

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पंवार के अनुसार इसका जवाब इस बात में छिपा है कि आखिर कितने गन्ने से चीनी बनाई जाती है और कितना इथेनॉल की ओर मोड़ा जाता है।

उन्होंने कहा, जब सरकार ने गन्ने और चीनी के उत्पादन के अनुमान जारी किए थे तब स्थिति इतनी गंभीर नहीं थी। इसका मतलब यह हुआ कि या तो आंकड़े सही नहीं थे, या बाजार में कृत्रिम हेराफेरी हुई है, या इथेनॉल की ओर डायवर्जन असंतुलित था।

सरकार के नीतिगत फैसले दर्शाते हैं कि स्थिति कितनी तेजी से बदली है। भारत ब्राजील के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी निर्यातक देश है। भारत 1960 से चीनी का निर्यात करता है और 2021-22 में उसने रिकॉर्ड 12 मिलियन टन से अधिक चीनी का निर्यात किया था। लेकिन घरेलू उपलब्धता को प्राथमिकता देने के लिए सरकार ने निर्यात नीति पर लगातार अंकुश लगाया है। 2025-26 के चीनी सीजन के लिए सरकार ने केवल 2 मिलियन मीट्रिक टन का निर्यात कोटा मंजूर किया था, जो 2021-22 के 12 मिलियन टन से काफी कम था।

इसके बाद 2026 में स्थिति और कड़ी करते हुए सरकार ने घरेलू आपूर्ति बनाए रखने, कीमतों को नियंत्रित करने और भविष्य के उत्पादन तथा वैश्विक बाजार की अनिश्चितताओं के खिलाफ तैयारी के हिस्से के रूप में 13 मई से 30 सितंबर तक चीनी के निर्यात पर तत्काल प्रभाव से पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था।

यह प्रतिबंध इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पहले भारत ने लंबे समय के पूर्ण प्रतिबंध के बजाय निर्यात पर सीमा (कोटा) या निश्चित मात्रात्मक नियंत्रणों का इस्तेमाल किया था। पिछले प्रतिबंधों के दौरान भी अमेरिका और यूरोपीय संघ सहित देशों को कोटा-आधारित और प्राथमिकता वाले निर्यात जारी रहे थे। इतने कड़े कदमों के बावजूद घरेलू बाजार में कीमतें लगातार बढ़ रही हैं।

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ऑल इंडिया शुगर ट्रेड एसोसिएशन (AISTA) के अनुसार, मौजूदा 2025-26 के मार्केटिंग वर्ष में फरवरी तक भारत ने 2,01,547 टन चीनी का निर्यात किया था, जिसमें संयुक्त अरब अमीरात प्रमुख आयातक देश रहा था।

अब रिपोर्टों के अनुसार, सरकार चीनी पर आयात ड्यूटी घटाने के अगले कदम पर विचार कर रही है। इस फैसले से लगभग एक दशक में पहली बार विदेशी चीनी भारतीय बाजार में आ सकेगी, जिससे त्योहारों की शुरुआत में ही घरेलू आपूर्ति बढ़ाई जा सके।

बॉम्बे शुगर मर्चेंट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक जैन ने रॉयटर्स को बताया कि, घरेलू स्तर पर चीनी की आपूर्ति बहुत कम है। त्योहारों के मौसम में आपूर्ति बढ़ाने और कीमतें घटाने में केवल आयात ही मदद कर सकता है।

अंतरराष्ट्रीय चीनी बाजार में भारत की वापसी का वैश्विक स्तर पर भी असर पड़ सकता है। दुनिया के सबसे बड़े चीनी उपभोक्ताओं में से एक होने के नाते, भारत के आयात से लंदन और न्यूयॉर्क के चीनी बेंचमार्क भाव को समर्थन मिल सकता है, भले ही इससे नई दिल्ली को देश के भीतर कीमतों को नियंत्रण में रखने में मदद मिले।

चीनी की कीमतों में मौजूदा उछाल रातोंरात नहीं आया है। भारत में चीनी की खुदरा कीमत 2023 की शुरुआत में किलो प्रति रु. 40-45 थी, जो अगस्त 2026 तक बढ़कर रु. 50 के पार चली गई है (हालांकि विभिन्न राज्यों, गुणवत्ता और बाजारों के अनुसार कीमतों में अंतर है)। कीमतों में बढ़ोतरी की यह गति पिछले कुछ महीनों में बहुत तेज हुई है।

अगस्त 2026 के मध्य तक, पूरे भारत की दैनिक औसत खुदरा कीमत किलो प्रति रु. 51.7 से 52.3 तक पहुंच गई थी। जो एक महीने में लगभग 7-8% की और अगस्त 2025 के औसत रु. 46.3 प्रति किलो की तुलना में सालाना आधार पर 12-13% की बढ़ोतरी दर्शाती है। त्योहारों के मौसम से पहले आए इस तेज उछाल ने केंद्र सरकार को तत्काल कदम उठाने के लिए मजबूर किया है।

इसलिए अधिकारी केवल आयात पर ही नहीं, बल्कि थोक व्यापारियों द्वारा चीनी के भंडारण पर सीमा लगाने पर भी विचार कर रहे हैं, ताकि सट्टेबाजी और जमाखोरी से कमी और गंभीर न हो। इससे पहले, अधिकारी इथेनॉल की ओर डायवर्ट किए जाने वाले गन्ने की मात्रा घटाकर चीनी उत्पादन को प्राथमिकता देने के विकल्प पर भी विचार कर रहे थे। रॉयटर्स की 10 अगस्त की रिपोर्ट के अनुसार, इस मुद्दे पर सितंबर के अंत तक फैसला लिए जाने की संभावना है।

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भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने 'द इंडियन एक्सप्रेस' में लिखे सह-लेखित आर्टिकल में सुझाव दिया था कि, पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग करते समय सरकार को 'खाद्य बनाम ईंधन' के बीच संतुलन पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। 17 अगस्त को प्रकाशित इस लेख में उन्होंने लिखा था कि, भारत जब तक खाद्य और ईंधन के बीच आर्थिक और सामाजिक लागत का पूरी तरह आकलन नहीं कर लेता, तब तक सरकार को E20 स्तर पर ही रुक जाना चाहिए और इससे अधिक ब्लेंडिंग की ओर आगे नहीं बढ़ना चाहिए।

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