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पुत्रदा एकादशी 23 अगस्त को…यह साल में दो बार आती है, लेकिन सावन की पुत्रदा एकादशी क्यों है ज्यादा खास
सावन में इस दिन भगवान शिव के साथ भगवान विष्णु का भी पूजन करें, संतान की उन्नति-खुशहाली के लिए विशेष है यह व्रत
सावन में भगवान शिव की आराधना के बीच इस बार भगवान विष्णु की उपासना का भी विशेष दिन आ रहा है। 23 अगस्त, रविवार को श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी होगी, जिसे पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यता में इस एकादशी को संतान से जुड़ी मनोकामनाओं के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपती के साथ-साथ माता-पिता बच्चों की सफलता, सुख और उज्ज्वल भविष्य की कामना से भी यह व्रत करते हैं। सावन में आने के कारण इस दिन विष्णु पूजा के साथ शिव आराधना भी की जा सकती है।
पंचांग के अनुसार इस वर्ष श्रावण शुक्ल एकादशी तिथि 23 अगस्त से शुरू होकर 24 अगस्त सुबह 4:18 बजे तक रहेगी। सामान्य गृहस्थों के लिए व्रत 23 अगस्त को रखा जाएगा। हालांकि वैष्णव परंपरा में एकादशी की गणना अलग होने के कारण कुछ स्थानों पर 24 अगस्त को भी यह व्रत रखा जा सकता है।
आइए जानते हैं…पुत्रदा एकादशी का नाम क्यों पड़ा
हिंदू धार्मिक परंपरा में साल की 24 एकादशियों में से दो को पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। एक सावन शुक्ल पक्ष में और दूसरी पौष शुक्ल पक्ष में आती है। 'पुत्रदा' का अर्थ संतान प्रदान करने वाली माना गया है। इसी वजह से इस व्रत को विशेष रूप से संतान सुख की कामना से जोड़ा गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार एकादशी व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है। इस दिन श्रद्धालु भगवान विष्णु की पूजा कर परिवार की सुख-शांति, संतान की उन्नति और मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करते हैं। संतान वाले माता-पिता बच्चों की शिक्षा, करियर और अच्छे भविष्य की कामना से भी पूजा करते हैं।
सावन में शिव और विष्णु दोनों की पूजा
सावन भगवान शिव को समर्पित माना जाता है, जबकि एकादशी भगवान विष्णु की आराधना का दिन है। इसलिए इस दिन दोनों देवताओं की पूजा करने की परंपरा है। भगवान शिव को जल, बिल्व पत्र, धतूरा और आंकड़े के फूल अर्पित किए जा सकते हैं। भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल चढ़ाया जाता है। ध्यान रखने वाली बात यह है कि तुलसी दल भगवान विष्णु को चढ़ाया जाता है, लेकिन शिव पूजा में तुलसी का इस्तेमाल नहीं किया जाता। दोनों देवताओं की पूजा की सामग्री अलग रखकर पूजा करना उचित माना जाता है।
22 अगस्त से ही शुरू हो जाएगी तैयारी
एकादशी व्रत की शुरुआत केवल पूजा वाले दिन से नहीं मानी जाती। दशमी यानी 22 अगस्त की शाम से ही व्रत की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। इस दिन हल्का और सात्विक भोजन करने की परंपरा है। तामसिक भोजन से बचना चाहिए और अगले दिन के व्रत के लिए मन को तैयार करना चाहिए। 23 अगस्त की सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। इसके बाद घर के मंदिर और पूजा स्थल की सफाई करके भगवान विष्णु के सामने दीप जलाएं। पूजा में फूल, माला, धूप, दीप, रोली, अक्षत और नैवेद्य रखें। भगवान विष्णु को तुलसी दल अर्पित करें। इसके बाद विष्णु मंत्र का जाप या एकादशी की कथा का पाठ किया जा सकता है।
क्या इस दिन भूखे रहना जरूरी है…
एकादशी के व्रत में हर व्यक्ति की क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार नियम अलग हो सकते हैं। जो लोग निराहार व्रत कर सकते हैं, वे पूरे दिन अन्न ग्रहण नहीं करते। वहीं स्वास्थ्य और क्षमता के अनुसार फलाहार करने की भी परंपरा है। व्रत में सामान्य तौर पर अनाज और दालों से परहेज किया जाता है। फल, दूध और व्रत में इस्तेमाल होने वाली दूसरी सामग्री का सेवन किया जा सकता है। साबूदाना, सिंघाड़ा, शकरकंद, आलू और मूंगफली जैसे खाद्य पदार्थ कई घरों में फलाहार के रूप में लिए जाते हैं। व्रत के भोजन को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में परंपराएं होने के कारण अपने घर की परंपरा का पालन किया जा सकता है।
पूजा के साथ मन को भी रखें शांत
एकादशी का उद्देश्य केवल भोजन का त्याग करना नहीं माना जाता। धार्मिक परंपरा में इस दिन भगवान विष्णु का ध्यान, मंत्र जाप, कथा श्रवण और धार्मिक पाठ करने पर जोर दिया जाता है। दिनभर मन को शांत रखने और नकारात्मक विचारों से दूर रहने की कोशिश की जाती है। शाम के समय भगवान विष्णु की दोबारा पूजा करके दीप जलाएं। सावन के कारण इसी समय भगवान शिव का जलाभिषेक और बिल्व पत्र अर्पण भी किया जा सकता है।
द्वादशी को होगा व्रत का पारण
एकादशी का व्रत अगले दिन द्वादशी तिथि में पारण के साथ पूरा किया जाता है। इस साल एकादशी तिथि 24 अगस्त की सुबह समाप्त होगी। पारण का सही समय स्थान और पंचांग के अनुसार अलग हो सकता है, इसलिए अपने शहर के पंचांग में दिए गए समय को देखना चाहिए।
पारण से पहले स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें और व्रत पूरा करने की प्रार्थना करें। इसके बाद भोजन ग्रहण किया जाता है। धार्मिक मान्यता में जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराने या सामर्थ्य के अनुसार दान करने के बाद स्वयं भोजन करने को भी शुभ माना गया है।
दीपदान और दान से जुड़े हैं कई धार्मिक विश्वास
पुत्रदा एकादशी पर पूजा के साथ दान और दीपदान की परंपरा भी रही है। श्रद्धालु नदी, सरोवर या किसी पवित्र जलस्रोत पर जाकर स्नान और दीपदान करते हैं। यदि ऐसा संभव नहीं हो तो घर पर स्नान करते समय पानी में गंगाजल मिलाकर भगवान विष्णु का स्मरण किया जा सकता है। इस दिन जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र और उपयोगी वस्तुएं दान करने की परंपरा है। धार्मिक दृष्टि से दान को सेवा का माध्यम माना जाता है।
इस दिन क्या करें
- सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें।
- विष्णुजी को तुलसी दल अर्पित करें।
- सावन के कारण भगवान शिव को जल और बिल्व पत्र चढ़ाएं।
- अपनी क्षमता के अनुसार निराहार या फलाहार व्रत रखें।
- एकादशी की कथा सुनें या पढ़ें।
- शाम को दीप जलाकर भगवान विष्णु का स्मरण करें।
- जरूरतमंद व्यक्ति को अन्न, वस्त्र या उपयोगी वस्तु दान करें।
- अगले दिन द्वादशी में निर्धारित समय पर व्रत का पारण करें।

