पुत्रदा एकादशी क्यों है इतना खास: संतान सुख और वंश वृद्धि के लिए किया जाने वाला यह व्रत साल की आखिर एकादशी है

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साल-2025 की आखिर एकादशी कई मायनों में बहुत खास महत्व रखता है। यह मंगलवार से शुरू होकर बुधवार को खत्म होगा। पौष मास के शुक्ल पक्ष की इस एकादशी को पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है। ये व्रत संतान सुख और सौभाग्य की कामना से किया जाता है। मान्यता है कि इस व्रत से संतान संबंधी सभी परेशानियां दूर हो सकती हैं। माना जाता है कि इस व्रत से भगवान विष्णु की कृपा मिलती है और घर-परिवार में सुख-समृद्धि आती है। एकादशी व्रत करने वाले अधिकतर भक्त दिनभर निराहार रहते हैं, जो लोग भूखे नहीं रह पाते हैं, वे एक समय फलाहार और दूध का सेवन करते हैं। महाभारत में भी पुत्रदा एकादशी के बारे में बताया गया है।

पौराणिक कथा है कि भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं इस व्रत का महत्व धर्मराज युधिष्ठिर को बताया था। भगवान ने कहा था कि पुत्रदा एकादशी का व्रत करने से भक्त के सभी पाप नष्ट होते हैं। ये व्रत दीर्घायु और संस्कारी संतान देने वाला है। भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार पहले के समय में भद्रावतीपुरी में राजा सुकेतुमान राज्य करते थे। उनकी रानी का नाम चंपा था। इनकी कोई संतान नहीं थी, इसलिए वे दुखी रहते थे। इसी दुख की वजह से एक दिन राजा सुकेतुमान वन की ओर निकल पड़े। वन में जब उन्हें प्यास लगी, तो वे एक सरोवर के पास पहुंचे। वहां राजा को कई ऋषि-मुनि दिखाई दिए, राजा ने सभी को प्रणाम किया और अपनी समस्या बताई। तब मुनियों ने बताया कि पौष मास के शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी के बारे में बताया। मुनियों ने राजा को बताया कि इस दिन विधिपूर्वक व्रत करने से योग्य संतान प्राप्त होती है। मुनियों की आज्ञा मानकर राजा सुकेतुमान ने पुत्रदा एकादशी का व्रत किया। कुछ ही समय बाद रानी चंपा ने एक पुत्र को जन्म दिया।

पुत्रदा एकादशी पर भगवान विष्णु और महालक्ष्मी की करें पूजा

पुत्रदा एकादशी पर भगवान और महालक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके भगवान के सामने व्रत और पूजा करने का संकल्प लेना चाहिए। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। पूजा में सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण करें। फिर विष्णु भगवान को जल, पंचामृत, चंदन, पुष्प, तुलसी दल अर्पित करें। माता लक्ष्मी को कमल या लाल पुष्प, सिंदूर और इत्र अर्पित करें। धूप-दीप जलाएं और विष्णु सहस्रनाम, लक्ष्मी स्तोत्र या ऊं नमो नारायणाय मंत्र का जप करें। अंत में एकादशी व्रत कथा सुनें या पढ़ें। पूजा के बाद आरती करें और क्षमा प्रार्थना करें।

व्रत करने वाले भगवान विष्णु के नाम का जप करें 

एकादशी व्रत करने वाले को वैसे तो निराहार रहना चाहिए, लेकिन अगर भूखे रहना संभव न हो तो फलाहार कर सकते हैं। फल, दूध का सेवन कर सकते हैं। भक्त को अन्न, चावल, गेहूं, दालें और उनसे बने व्यंजन का त्याग करना चाहिए। व्रत करने वाले व्यक्ति को भगवान विष्णु का नाम जप करें, भजन-कीर्तन और व्रत कथा का पाठ करें। झूठ, क्रोध, निंदा और हिंसा से दूर रहें। अगले दिन द्वादशी तिथि पर विधिपूर्वक पारण के बाद व्रत पूरा होता है।

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