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सूरत की विशेष शाकोत्सव परंपरा; प्रसाद ग्रहण करने के लिए भक्तों का उमड़ता है सैलाब, बैंगन की सब्जी होती है खास
सूरत। सूरत की पहचान केवल डायमंड और टेक्सटाइल उद्योग से ही नहीं बल्कि यहां की धार्मिक परंपराएं इसकी पहचान को और मजूबती देती हैं। सूरत की मान्यताएं, यहां की संस्कृति और लोगों का समाज सेवा के प्रति भाव भी इसे अन्य शहरों से अलग बनाता है। ऐसी ही एक पुरानी परंपरा की बात करें तो यह है भव्य शाकोत्सव। सूरत के सरथाणा क्षेत्र में स्थित एंथम सर्कल के पास भक्तिबाग मैदान में स्वामिनारायण ‘धर्मकुल आश्रित सत्संग समाज’ द्वारा एक अलौकिक शाकोत्सव का आयोजन किया गया। इस धार्मिक महोत्सव में लगभग 1.50 लाख से अधिक हरिभक्तों ने एकत्रित होकर महाप्रसाद का लाभ लिया। इस दिव्य शाकोत्सव में स्वामिनारायण संप्रदाय के अनेक उच्च संतों और महानुभावों की गरिमामयी उपस्थिति रही। विशेष रूप से लालजी महाराज, वैष्णव संप्रदाय के युवराज कुमार तथा महामंडलेश्वर भारद्वाज महाराज ने उपस्थित रहकर भक्तों को आशीर्वचन प्रदान किए। संतों के दर्शन और आशीर्वाद से पूरा वातावरण भक्तिमय बन गया। यहां का माहौल ऐसा हो गया कि जैसे देवलोक जमीन पर उतर आया हो।
2000 से अधिक स्वयंसेवकों ने इतने बड़े आयोजन को संभाला
इतने बड़े स्तर पर आयोजित कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए 2000 से अधिक स्वयंसेवकों ने दिन-रात मेहनत कर व्यवस्था को अच्छी तरीके से संभाला। शाकोत्सव की पूर्व संध्या पर ही सभी तैयारियां पूरी कर ली गई थीं। अनुशासन के साथ हजारों लोगों को प्रसाद वितरण किया गया। भक्तों ने भी अनुशासित रहकर प्रसाद ग्रहण किया और बड़े ही शांतिपूर्ण माहौल में शोकत्सव महोत्सव का समापन हुआ।
भोजन तैयार करने के लिए पारंपरिक देसी चूल्हे का इस्तेमाल किया गया
इस शाकोत्सव के लिए विशाल रसोई तैयार की गई थी। इसमें आधुनिक उपकरणों के बजाय पारंपरिक देसी चूल्हों पर भोजन तैयार किया गया। प्रसाद की सामग्री की बात करें तो 12 सौ किलो आटे से शुद्ध और गरमागरम बाजरे की रोटियां बनाई गईं। वहीं, 20,000 किलो बैंगन की सब्जी के लिए लगभग 1,875 किलो घी और मसालों का उपयोग हुआ। इसके अलावा 10,000 किलो खिचड़ी और 4,500 लीटर स्वादिष्ट कढ़ी का प्रसाद तैयार किया गया।
शाकोत्सव का ऐतिहासिक महत्व
शकोत्सव परंपरा के पीछे भगवान स्वामिनारायण का महिमा जुड़ा हुआ है। दरअसल, वर्ष 1887 में लोया गांव में भगवान स्वामिनारायण दो महीने तक रुके थे। उस समय उन्होंने स्वयं अपने हाथों से बैंगन की सब्जी बनाकर भक्तों को भोजन कराया था। भगवान की इस लीला और स्मृति को जीवंत रखने के लिए स्वामिनारायण संप्रदाय द्वारा हर वर्ष शीत ऋतु में ‘शाकोत्सव’ का भव्य आयोजन किया जाता है। इसमें बड़ी संख्या में भक्त इस प्रसाद को ग्रहण करने के लिए पहुंचते हैं।

