क्या संघ फिर एक बार उत्तर प्रदेश में चुनावी रास्ता तैयार करेगा?

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उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर बढ़ती राजनीतिक गर्मी के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत रविवार शाम 3 दिन के दौरे पर लखनऊ पहुंचे। हालांकि RSS प्रमुख संगठन के पूर्वी क्षेत्र के लिए आयोजित एक प्रशिक्षण शिविर में शामिल होने पहुंचे हैं, लेकिन विधानसभा चुनावों से पहले हो रही उनकी इस यात्रा के राजनीतिक महत्व का आकलन किया जा रहा है।

मोहन भागवत के तीन दिवसीय लखनऊ दौरे को आधिकारिक तौर पर RSS की संगठनात्मक गतिविधियों से जुड़ा बताया जा रहा है। प्रशिक्षण शिविर के दौरान वे बौद्धिक मार्गदर्शन देने के साथ-साथ संघ के शताब्दी वर्ष समारोह और विभिन्न चल रहे अभियानों की तैयारियों की समीक्षा करेंगे, ऐसी उम्मीद है; लेकिन संघ प्रमुख की इस यात्रा ने राज्य में राजनीतिक चर्चाओं को जरूर तेज कर दिया है।

उत्तर प्रदेश को देश की ‘सत्ता का प्रवेशद्वार’ कहा जाता है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में RSS की भूमिका हमेशा एक ‘साइलेंट किंगमेकर’ और ‘ग्राउंड इंजीनियर’ की रही है। हालांकि संघ स्वयं को मुख्य रूप से एक सांस्कृतिक संगठन बताता है, लेकिन भारतीय जनसंघ के समय से ही वह भाजपा के लिए राजनीतिक क्षेत्र में सहयोगी भूमिका निभाता आया है। 2017 और 2022 में भाजपा की चुनावी जीत में संघ की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। इसी पृष्ठभूमि में 2027 के चुनावों से पहले मोहन भागवत एक बार फिर यूपी पहुंचे हैं।

मोहन भागवत लखनऊ दौरे पर

RSS प्रमुख मोहन भागवत फिलहाल लखनऊ के तीन दिवसीय दौरे पर हैं और निराला नगर स्थित सरस्वती शिशु मंदिर में ठहरे हुए हैं। वे मंगलवार तक लखनऊ में रहेंगे। शहर में फिलहाल संगठन के अवध, गोरक्ष, काशी और कानपुर प्रांतों के RSS स्वयंसेवकों के लिए प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया जा रहा है। इस दौरान प्रशिक्षण शिविर में बौद्धिक मार्गदर्शन देने के अलावा मोहन भागवत संघ के शताब्दी वर्ष से जुड़ी पहलों और विभिन्न चल रहे अभियानों की प्रगति की समीक्षा करेंगे।

पूर्वी क्षेत्र के कार्यकर्ताओं के साथ बैठकों में मोहन भागवत शताब्दी वर्ष समारोह के तहत चल रहे गृह संपर्क अभियान, हिंदू परिषदों सहित विभिन्न अभियानों तथा शाखा विस्तार पर चर्चा करेंगे और आगामी अभियानों एवं कार्यक्रमों को लेकर दिशा-निर्देश देंगे। संघ प्रमुख अपनी इस यात्रा के दौरान किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लेंगे, लेकिन वे वरिष्ठ RSS कार्यकर्ताओं, भाजपा के प्रमुख पदाधिकारियों और सरकारी प्रतिनिधियों से मुलाकात कर सकते हैं, साथ ही संघ के प्रशिक्षण सत्रों में भी शामिल हो सकते हैं।

क्या वे CM और DYC से मिलेंगे?

लखनऊ दौरे के दौरान सरकारी अधिकारी और भाजपा नेता संघ प्रमुख मोहन भागवत से मुलाकात कर सकते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक सहित यूपी सरकार के कई वरिष्ठ मंत्रियों के उनसे मिलने की संभावना है। इसके अलावा भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी भी दिल्ली से लखनऊ पहुंच चुके हैं। सरकार और भाजपा संगठन के कई प्रमुख लोग संघ प्रमुख से मिलने के लिए निराला नगर जा सकते हैं।

उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में सरकार के प्रदर्शन और 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर भी चर्चा होने की संभावना है। इस संदर्भ में वे राज्य के राजनीतिक परिदृश्य को लेकर अपडेट ले सकते हैं और जमीनी हकीकत को समझने की कोशिश कर सकते हैं। अतीत में भी देखा गया है कि जब भी संघ प्रमुख लखनऊ आते हैं, तब सरकारी प्रशासन से लेकर पार्टी संगठन तक के प्रतिनिधि उनसे मिलने पहुंचते हैं।

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‘ट्रिपल S मॉडल’ से सत्ता की ‘हैट्रिक’

उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत राज्य की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर प्रचारकों और प्रमुख कार्यकर्ताओं से फीडबैक मांग सकते हैं। भाजपा संगठन और सरकार के प्रमुख कार्यकर्ताओं के साथ बैठकों में पार्टी संगठन और प्रशासन के बीच समन्वय से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा होने की संभावना है। इसे ‘ट्रिपल S मॉडल’ कहा जाता है। यह मॉडल पूरी तरह सरकार, संगठन और संघ—इन तीन स्तंभों पर आधारित माना जाता है।

संघ वैचारिक ढांचा और अनुशासित कैडर नेटवर्क उपलब्ध कराता है। भाजपा संगठन चुनावी रणनीति और राजनीतिक गतिशीलता का संचालन करता है, जबकि सरकार अपनी प्रशासनिक कार्यशैली और कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से जनता तक संदेश पहुंचाती है। जब ये तीनों संस्थाएं साथ मिलकर काम करती हैं, तब भाजपा का चुनावी तंत्र बेहद प्रभावशाली माना जाता है। 2014 से भाजपा की चुनावी सफलताओं में इस मॉडल की भूमिका लगातार चर्चा का विषय रही है।

2027 की चुनावी लड़ाई जीतने की योजना

2027 के चुनावों से पहले रणनीति में एक बार फिर ‘ट्रिपल S’ के बीच समन्वय स्थापित कर चुनावी जीत की ‘हैट्रिक’ हासिल करने और सत्ता बनाए रखने का लक्ष्य शामिल है। इसी वजह से होली के बाद उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में संघ और भाजपा के बीच समन्वय बैठकों की एक विस्तृत श्रृंखला आयोजित की गई। इन बैठकों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और पार्टी के राज्य महासचिव (संगठन) धर्मपाल सिंह मौजूद रहे, जबकि संघ के क्षेत्रीय और प्रांतीय स्तर के प्रचारकों ने भी भाग लिया।

राजनीतिक विश्लेषक इन बैठकों को सिर्फ नियमित संगठनात्मक संवाद नहीं मानते, बल्कि 2027 चुनावों से पहले भाजपा की चुनावी रणनीति का प्रारंभिक ब्लूप्रिंट तैयार करने की कवायद मानते हैं। हालांकि यह भी ध्यान देने योग्य है कि भाजपा और संघ के बीच ऐसी समन्वय बैठकें कोई नई बात नहीं हैं। 2019 लोकसभा चुनाव से एक वर्ष पहले भी इसी तरह का संवाद अभियान चलाया गया था। इसके बाद 2022 विधानसभा चुनावों से पहले भी राजनीतिक माहौल तैयार करने के लिए यही रणनीति अपनाई गई थी। संघ और भाजपा के बीच इसी राजनीतिक तालमेल की वजह से वे चुनावी लड़ाइयों में सफल रहे हैं।

उत्तर प्रदेश: संघ-भाजपा की राजनीतिक प्रयोगशाला

उत्तर प्रदेश संघ की राजनीतिक प्रयोगशाला रहा है। 1984 के लोकसभा चुनाव में पूरे देश में भाजपा केवल दो सीटों तक सिमट गई थी। इस हार के बाद संघ के तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहेब देवरस के रणनीतिक मार्गदर्शन में संघ परिवार (विशेषकर विश्व हिंदू परिषद) ने राम मंदिर आंदोलन का नेतृत्व संभाला। इस आंदोलन के जरिए संघ उत्तर प्रदेश के विभाजित हिंदू समाज को एक वैचारिक सूत्र में बांधने में सफल रहा।

संघ के कार्यकर्ता घर-घर गए और गांवों में पत्थर पूजा तथा ‘राम ज्योति’ शोभायात्राओं के माध्यम से हर घर तक पहुंचे। इस वैचारिक आधार निर्माण का राजनीतिक लाभ भाजपा को मिला; लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा और कल्याण सिंह के उदय के साथ पार्टी ने 1991 में पहली बार उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई। हालांकि 2002 से 2012 के बीच भाजपा उत्तर प्रदेश में लगातार कमजोर होती गई और तीसरे-चौथे नंबर की पार्टी बन गई। इसके बाद 2014 लोकसभा चुनाव से पहले संघ ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया।

संघ ने भाजपा के लिए अनुकूल माहौल कैसे बनाया

2002 से 2012 के बीच भाजपा उत्तर प्रदेश में लगातार अपनी जमीन खोती गई और अंततः तीसरे या चौथे स्तर की राजनीतिक ताकत बन गई। इसके बाद 2014 लोकसभा चुनाव से पहले संघ ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया। संघ को समझ में आ गया कि उत्तर प्रदेश में वैचारिक लड़ाई केवल सवर्णों के सहारे नहीं जीती जा सकती। विभिन्न सामाजिक सेवा पहलों के जरिए संघ के सहयोगी संगठनों ने गैर-यादव OBC (जैसे कुर्मी, मौर्य, राजभर आदि) और गैर-जाटव दलित जातियों में मजबूत पकड़ बनाई।

2014 लोकसभा चुनाव और 2017 व 2022 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान संघ ने भाजपा के ‘पन्ना प्रमुख’ मॉडल को प्रभावी तरीके से जमीन पर लागू किया। चुनाव के दिनों में ‘पहले मतदान, फिर जलपान’ के नारे के साथ संघ के स्वयंसेवकों ने मतदाताओं को संगठित करने और उन्हें सुबह-सुबह मतदान के लिए घरों से बाहर निकालने की जिम्मेदारी संभाली। इस तरह संघ भाजपा के लिए राजनीतिक जीवनरेखा बन गया। भाजपा 2014 से लगातार चुनावी जीत दर्ज करती रही।

2017 में भाजपा 15 वर्षों के राजनीतिक वनवास के बाद सत्ता में लौटी और मुख्यमंत्री पद योगी आदित्यनाथ को सौंपा गया। पांच वर्षों के कार्यकाल के बाद 2022 चुनावों से पहले चित्रकूट में RSS की एक महत्वपूर्ण समन्वय बैठक आयोजित की गई थी। इस बैठक में संघ प्रमुख मोहन भागवत से लेकर सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले तक कई शीर्ष पदाधिकारी शामिल हुए थे।

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उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरने और सामाजिक समीकरणों को प्रभावी ढंग से संतुलित करने के लिए RSS ने अपने वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को सीधे मैदान में उतारा। संघ के सहयोगी संगठनों (जैसे विभिन्न सेवा समूह और किसान संगठन) ने मतदाता जागरूकता और मतदान बढ़ाने के लिए घर-घर अभियान चलाया। इस प्रकार भाजपा भारी बहुमत के साथ दोबारा सत्ता में लौटने में सफल रही और लंबे समय बाद पहली बार कोई राजनीतिक दल सत्ता में वापसी कर पाया।

संघ: भाजपा का संकट प्रबंधक

उत्तर प्रदेश की राजनीति में जब भी भाजपा को चुनावी मोर्चे पर झटका लगता है या अंदरूनी कलह बढ़ती है, तब RSS कमान अपने हाथ में ले लेता है। 2024 लोकसभा चुनाव के बाद भी ऐसा देखने को मिला, जब आंतरिक मतभेदों के बीच भाजपा ने उत्तर प्रदेश में कई सीटें गंवाईं। ऐसे में संघ ने 2025 और 2026 के दौरान राज्यभर में अपनी सक्रियता काफी बढ़ा दी है।

2027 विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए संघ ने पूरे उत्तर प्रदेश को 6 अलग-अलग क्षेत्रों (अवध, काशी, गोरखपुर, पश्चिम यूपी, कानपुर और ब्रज) में विभाजित किया है और मैराथन समन्वय बैठकों की श्रृंखला शुरू की है, ताकि विपक्ष के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) नैरेटिव का जवाब तैयार किया जा सके। इन क्षेत्रों में कई जिले शामिल हैं और संघ के अधिकांश जमीनी कार्यकर्ता इसी संगठनात्मक ढांचे के माध्यम से काम करते हैं।

इन समन्वय बैठकों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि सरकार को सीधे जमीनी हालात की जानकारी मिलती है। आमतौर पर राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासनिक तंत्र के बीच कई स्तर होते हैं, जिससे समय के साथ फीडबैक बदल जाता है या फिल्टर हो जाता है। इसलिए सरकार के लिए यह समझना आसान हो जाता है कि जमीन पर किस प्रकार के मुद्दे उठ रहे हैं और लोगों में किस प्रकार की नाराजगी या अपेक्षाएं हैं।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और संघ नेतृत्व के बीच संवाद लगातार बढ़ रहा है। पिछले नवंबर में मुख्यमंत्री योगी ने अयोध्या में संघ प्रमुख मोहन भागवत के साथ लगभग डेढ़ घंटे तक बंद कमरे में बैठक की थी। इसके बाद दोनों नेता फरवरी में लखनऊ में फिर मिले थे।

इसके अलावा नवंबर में ही संघ के कई वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने विभिन्न सरकारी विभागों के प्रदर्शन और कार्यप्रणाली का आकलन करने के लिए लखनऊ में राज्य मंत्रियों के साथ अलग-अलग समीक्षा बैठकें की थीं। क्षेत्रीय बैठकों के बाद अब मोहन भागवत उत्तर प्रदेश की राजधानी पहुंचे हैं, तो मुख्यमंत्री योगी के साथ उनकी मुलाकात हो सकती है। ऐसे में क्या संघ, संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने के लिए कोई नई रणनीति तैयार की जा सकती है?

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