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अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ लंबे समय तक न खुले तो क्या होगा? 1967 के इतिहास की पुनरावृत्ति वैश्विक आर्थिक महामंदी ला सकती है
जब 1967 में मिस्र और इज़रायल के बीच युद्ध छिड़ा और स्वेज नहर बंद हो गई, तब 15 जहाज़ उसजलमार्ग के भीतर फँस गए थे। युद्ध तो केवल छह दिनों में ही समाप्त हो गया (जिसे 'सिक्स-डे वॉर' कहा जाता है), लेकिन स्वेज नहर पूरे 8 वर्षों तक बंद रही। जब 1975 में इन जहाज़ों को बाहर निकालने की अनुमति मिली, तब उनमें से केवल 2 जहाज़ ही समुद्र में चलने लायक बचे थे, बाकी सभी जंग खा चुके थे और उन्हें 'येलो फ्लीट' (Yellow Fleet) नाम दिया गया था।
इतिहास शायद खुद को हूबहू दोहराता नहीं, लेकिन उसकी लय जरूर मिलती-जुलती होती है। आज अमेरिका-इज़रायल और ईरान के बीच युद्ध के कारण तेल और गैस का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़' (Strait of Hormuz) बंद हुए लगभग 90 दिन होने जा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि स्वेज नहर जैसा इतिहास यहाँ भी दोहराया गया और यह मार्ग लंबे समय तक बंद रहा, तो क्या होगा?
फिलहाल पाकिस्तानी मध्यस्थों के जरिए वॉशिंगटन और तेहरान के बीच युद्ध रोकने और इस चोकपॉइंट (मार्ग) को फिर से खोलने के लिए बातचीत चल रही है। लेकिन, यदि शुरुआती समझौता केवल एक पन्ने के सामान्य करार (MoU) तक सीमित रहेगा, तो क्या यह मार्ग पूरी तरह सुरक्षित हो पाएगा?
इसी आशंका के बीच यूनाइटेड अरब अमीरात (UAE) ने होर्मुज़ मार्ग को बायपास करने वाली अपनी दूसरी पाइपलाइन का काम तेज कर दिया है, जिसे वह 2027 तक शुरू करना चाहता है। यह बात दर्शाती है कि अबू धाबी को आशंका है कि यह समुद्री संकट काफी लंबे समय तक खिंच सकता है।
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अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी और फाइनेंस जगत के विशेषज्ञ मानते हैं कि होर्मुज़ अगले महीने या अधिकतम जुलाई तक खुल जाएगा। उनकी इस उम्मीद के पीछे कारण यह है कि यदि यह मार्ग बंद रहा तो ऊर्जा की कीमतें आसमान छू लेंगी और वैश्विक अर्थव्यवस्था को इतना बड़ा नुकसान होगा जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल है।
अमेरिकी अर्थशास्त्री हर्बर्ट स्टीन का एक प्रसिद्ध नियम है: ‘यदि कोई चीज हमेशा के लिए नहीं चल सकती, तो वह रुक जाएगी।’ आज वॉल स्ट्रीट इस नियम के बदले हुए संस्करण पर भरोसा करके बैठा है कि: ‘होर्मुज़ हमेशा के लिए बंद नहीं रह सकता क्योंकि उससे अत्यधिक आर्थिक नुकसान होगा, इसलिए वह खुल ही जाएगा।’
समस्या यह है कि इस नाकेबंदी से अभी तक दोनों में से किसी भी पक्ष को इतना आर्थिक नुकसान नहीं हुआ है कि वे झुकने के लिए मजबूर हों। ट्रंप के लिए यह युद्ध अभी तक सस्ता साबित हुआ है। अमेरिकी शेयर बाज़ार (S&P 500 इंडेक्स) युद्ध शुरू होने के बाद लगभग 10% बढ़ा है और ऑल-टाइम हाई के करीब है। पेट्रोल के दाम बढ़े हैं लेकिन वे 2022 के रिकॉर्ड स्तर से नीचे हैं। अमेरिका की दूसरी तिमाही की GDP ग्रोथ रेट भी 4% से अधिक रहने का अनुमान है।
ईरान में बेरोज़गारी बढ़ रही है, खाद्य महंगाई चरम पर है और उसकी मुद्रा लगातार गिर रही है। अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी के कारण वह तेल निर्यात नहीं कर पा रहा और उत्पादन घटाना पड़ा है। लेकिन ईरान पहले भी ऐसे बड़े आर्थिक झटके झेल चुका है, खासकर जब अस्तित्व का सवाल हो।

फिलहाल, UAE के वरिष्ठ राजनयिकों ने तत्काल डील होने की संभावना 50-50 बताई है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी बातचीत में 'थोड़ी प्रगति' होने की बात स्वीकार की है। पाकिस्तानी मध्यस्थ इस्लामाबाद और तेहरान के बीच लगातार दौड़धूप कर रहे हैं।
अब तक वैश्विक बाज़ार ने स्थिति को कैसे संभाला?
होर्मुज़ बंद होने से प्रतिदिन 2 करोड़ (20 million) बैरल तेल बाज़ार से गायब हो गया है। इसके बावजूद अब तक ऊर्जा संकट क्यों नहीं हुआ? इसके पीछे कारण इस प्रकार हैं:
- युद्ध शुरू होने के समय वैश्विक बाज़ार में तेल की सप्लाई जरूरत से अधिक थी।
- सऊदी अरब और UAE ने अपनी बायपास पाइपलाइनों के जरिए पर्शियन गल्फ का तेल बहता रखा है।
- अमीर देशों ने अपने रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) से स्टॉक निकाला है और अमेरिका ने भी विदेशों में सप्लाई भेजी है।
- चीन ने अचानक अपनी तेल आयात में बड़ा कटौती कर दी है।
- कीमतें बढ़ने के कारण गरीब देशों की खरीद शक्ति घट गई है, जिससे मांग कम हुई है।

यदि होर्मुज़ 2026 के अंत तक या 2027 तक बंद रहे तो?
यदि यह स्थिति लंबी चली तो वैश्विक स्तर पर तेल की ऊँची कीमतें उपभोक्ताओं को खरीदारी बंद करने के लिए मजबूर कर देंगी। शुरुआत में क्रूड ऑयल $200 प्रति बैरल होने की जो भविष्यवाणियाँ गलत साबित हुई थीं, वे सही साबित हो सकती हैं। यदि ईरान इस मार्ग पर आंशिक नियंत्रण बनाए रखेगा, तब भी कीमतें नीचे नहीं आएंगी।
वैश्विक महामंदी का खतरा
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ दुनिया की कुल तेल सप्लाई के 10% से 15% हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। दुनिया इस हिस्से के बिना जी सकती है, लेकिन इसकी कीमत बहुत भारी चुकानी पड़ेगी। स्थायी रूप से इतना बड़ा उपभोग घटाने का सीधा अर्थ 1973 और 1979 जैसी वैश्विक आर्थिक महामंदी (Gloal Recession) का सामना करना होगा।
बायपास के लिए नई पाइपलाइन बनाने में वर्षों लगेंगे। 2027 तक UAE अपनी क्षमता दोगुनी कर लेगा, सऊदी अरब को अभी और समय लगेगा, जबकि कुवैत और इराक को उससे भी अधिक समय लगेगा। कतर के पास तो लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) निर्यात करने के लिए होर्मुज़ के अलावा कोई अन्य व्यावहारिक मार्ग ही नहीं है।
होर्मुज़ का लंबे समय तक बंद रहना इतना विनाशकारी है कि कोई उसके बारे में सोचने तक को तैयार नहीं है। इसी कारण सबसे अधिक संभावना इसी बात की है कि दोनों पक्षों के बीच कोई कामचलाऊ और समझौतापूर्ण शॉर्ट-टर्म डील हो जाए। लेकिन यदि ऐसा नहीं हुआ, तो भविष्य के दृश्य बेहद भयावह हो सकते हैं।

