राहुल गांधी नेहा बोरा को इतना महत्व क्यों दे रहे हैं?

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नेताओं में नेहा बोरा एकमात्र युवा नेता थीं, जो प्रियंका गांधी के साथ हाथ में हाथ डालकर सोमवार को राहुल गांधी के साथ दिल्ली की सड़कों पर मार्च कर रही थीं। नेहा ने यह जगह पिछले चार महीनों की कड़ी मेहनत से हासिल की है। कांग्रेस के छात्र और युवा संगठनों के नेताओं को शायद उनसे ईर्ष्या हो रही होगी और वे सोच रहे होंगे कि वे खुद ऐसा क्यों नहीं कर पाए। 2015-2016 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) छात्र संघ के चुनाव के दौरान, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन की छात्र इकाई ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की ओर से शेहला रशीद उपाध्यक्ष बनी थीं।

वहीं, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) की छात्र इकाई ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (AISF) से कन्हैया कुमार ने अध्यक्ष पद का चुनाव जीता था। कन्हैया के साथ शेहला भी काफी लोकप्रिय थीं और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाती थीं। बाद में शेहला AISA से अलग हो गईं और मोदी सरकार के प्रति सहानुभूति रखने लगीं। दूसरी ओर, कन्हैया कुमार कांग्रेस में शामिल हो गए।

JNU में कम्युनिस्ट पार्टियों के छात्र संगठनों के नेताओं का कांग्रेस में शामिल होना कोई नई बात नहीं है, लेकिन शेहला रशीद का रुख चौंकाने वाला था। ऐसे में सवाल उठता है कि नेहा बोरा कौन-सा रास्ता अपनाएंगी? दूसरा सवाल यह है कि कांग्रेस नेहा बोरा को इतना महत्व क्यों दे रही है? तीसरा सवाल यह है कि कांग्रेस के भीतर नेहा बोरा या कन्हैया कुमार जैसे नेता क्यों नहीं उभर पाते?

क्या नेहा कांग्रेस में शामिल होंगी?

CPI(ML) के पोलित ब्यूरो सदस्य और नक्सल आंदोलन के जनक चारु मजूमदार के पुत्र अभिजीत मजूमदार का कहना है कि नेहा वही काम कर रही हैं, जिस पर पार्टी के भीतर सहमति बनी है या जो पार्टी के निर्देशों के मुताबिक है। नेहा के साहस को पार्टी भी बढ़ावा दे रही है। ऐसा नहीं है कि वह पार्टी से अलग होकर काम कर रही हैं। उनका कहना है कि नेहा अकेली नहीं हैं। हो सकता है कि उनका साहस और जोश इस समय सबसे ज्यादा सामने आ रहा हो। उन्हें मीडिया कवरेज भी मिल रहा है। नेहा ने कभी यह नहीं कहा कि वह पार्टी से अलग हैं। हम एक लोकतांत्रिक आंदोलन में शामिल हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम कम्युनिस्ट नहीं हैं।

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अभिजीत मजूमदार कहते हैं कि प्रियंका गांधी का नेहा के कंधे पर हाथ रखकर चलने का मतलब यह नहीं है कि नेहा अगले दिन कांग्रेस में शामिल हो जाएंगी। पार्टी को लेकर नेहा के मामले में ऐसा कोई डर नहीं है। अगर कोई अतीत के अनुभवों के आधार पर ऐसा सोच रहा है, तो उसके पास अपनी बात कहने का आधार हो सकता है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियां बिल्कुल अलग हैं।

उनके मुताबिक, नेहा को सुनकर कभी ऐसा महसूस नहीं होता कि वह अपना प्रचार कर रही हैं। उनमें यह गुण बिल्कुल नहीं है। वह कम्युनिस्ट विचारधारा की विरासत को ही आगे बढ़ा रही हैं। CPI(M) की छात्र इकाई स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) की नेता दीप्सिता धर भी मानती हैं कि इस मामले में नेहा, कन्हैया से अलग हैं, क्योंकि वह व्यक्तिवादी नहीं हैं।

दीप्सिता कहती हैं, 'मुझे उम्मीद है कि नेहा कांग्रेस में शामिल होने के बजाय कम्युनिस्ट आंदोलन को मजबूत करेंगी। वह कम्युनिस्ट आंदोलन के प्रति प्रतिबद्ध हैं और मैं उन्हें कन्हैया से बिल्कुल अलग नजरिए से देखती हूं। कम्युनिस्ट नेता कांग्रेस में इसलिए शामिल होते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि कम्युनिस्ट संगठन में रहकर चुनाव जीतना मुश्किल है। मुझे उम्मीद है कि कांग्रेस भविष्य में भी नेहा को उनकी कम्युनिस्ट भावना के कारण स्वीकार करेगी, न कि एक कांग्रेसी नेता के रूप में।'

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अभिजीत मजूमदार कहते हैं कि नेहा को कन्हैया के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। कन्हैया और नेहा का राजनीतिक परिवेश बिल्कुल अलग है। कन्हैया कुमार जब लोकप्रिय हुए, तो वह CPI से दूर होते चले गए। दूसरी ओर, नेहा AISA को मजबूत बना रही हैं। वह खुद को पार्टी से बड़ा नहीं मानतीं। उनके मुताबिक, नेहा कन्हैया से ज्यादा प्रतिबद्ध हैं। दीपांकर खुद कहते हैं कि उनके मुकाबले नेहा के फॉलोअर्स ज्यादा हैं। लेकिन यह हमारे लिए चिंता का विषय नहीं, बल्कि हमारी उपलब्धि है। नेहा ने एक युवा कम्युनिस्ट नेता के रूप में अपनी पहचान बनाई है। शेहला के मामले में हम खुद से सवाल करते हैं कि क्या हम उनमें प्रतिबद्धता का वह स्तर विकसित नहीं कर पाए, जिसकी जरूरत थी?

राहुल गांधी ने नेहा को इतना महत्व क्यों दिया?

जुलाई में जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन खत्म होने के बाद राहुल गांधी ने वामपंथी संगठनों के कार्यकर्ताओं से मुलाकात की थी। नेहा भी उनमें शामिल थीं। उस समय भी राहुल ने CJP के नेताओं से दूरी बनाए रखी थी। ऐसे में सवाल उठता है कि राहुल गांधी नेहा को इतना महत्व क्यों दे रहे हैं? अभिजीत मजूमदार कहते हैं कि राहुल गांधी के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है। शुरुआत में कांग्रेस CJP को एक खतरे के रूप में देखती थी। अन्ना हजारे के आंदोलन की यादें अभी तक कांग्रेस के मन से नहीं मिटी हैं। अभिजीत और आशुतोष AAP से जुड़े रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस को लगा कि इन सबके पीछे RSS की कोई रणनीति हो सकती है।

इसके उलट, नेहा और दूसरे युवा कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं के साथ खड़े होने में राहुल गांधी को कोई जोखिम नजर नहीं आया। नेहा जिस तरह से अपनी आवाज उठा रही हैं, उसे देखते हुए उनके साथ हाथ मिलाना उचित लगा।

अभिजीत कहते हैं कि राहुल गांधी के भीतर एक अलग तरह की सोच भी दिखाई देती है। कभी-कभी उनकी बातों में वामपंथी विचारधारा की झलक मिलती है। हालांकि, राहुल गांधी और उनकी अपनी पार्टी के बीच कितना तालमेल है, इस पर उन्हें संदेह है। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक अपूर्वानंद कहते हैं कि आजादी के बाद पिछले 60-70 वर्षों में कांग्रेस ज्यादातर समय सत्ता में रहने वाली पार्टी रही है। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि कांग्रेस संघर्ष करने वाली पार्टी नहीं रही है।

उनके मुताबिक, कांग्रेस ने लंबे समय तक सत्ता का आनंद लिया है और उसे किसी मुद्दे के लिए लगातार संघर्ष नहीं करना पड़ा। इंसान तब सोचता है, जब वह संघर्ष करता है। संघर्ष के दौरान ही उसकी बौद्धिक क्षमता विकसित होती है। आमतौर पर देखा गया है कि जब कोई सत्ता में होता है, तो उसकी बौद्धिक सक्रियता कमजोर पड़ने लगती है। इसके उलट, संघर्ष में शामिल होने पर उसकी सोच और समझ ज्यादा विकसित होती है।

अपूर्वानंद कहते हैं कि यह बात सोवियत संघ के इतिहास में भी देखी जा सकती है। सोवियत संघ में कम्युनिस्ट पार्टी के सत्ता में आने से पहले के दौर पर नजर डालें। 1905 से 1917 के बीच कई लेखक, कवि और कलाकार कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़े थे। लेखक, कलाकार और बुद्धिजीवी अक्सर सत्ता का विरोध करने वाली भूमिका में दिखाई देते हैं। लेकिन सवाल यह है कि कन्हैया कुमार, उमर खालिद और नेहा बोरा जैसी शख्सियतें पिछले 12 वर्षों के दौरान इसी सरकार के कार्यकाल में उभरी हैं। फिर कांग्रेस में ऐसा क्यों नहीं हुआ?

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प्रोफेसर अपूर्वानंद कहते हैं कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण कांग्रेस का स्वभाव ऐसा हो गया था कि वह अब भी खुद को विपक्ष की पार्टी के रूप में पूरी तरह ढाल नहीं पाई है। राहुल गांधी को कांग्रेस को संघर्ष करने वाली पार्टी बनाने में करीब 13-14 साल लग गए। हाल के समय तक कांग्रेस के पूरे व्यवहार को देखें, तो वह अब भी सत्ता का आनंद लेने वाली पार्टी ही दिखाई देती थी।

कांग्रेस को लगता है कि अगर बीजेपी सत्ता से बाहर हो जाएगी, तो अगली सरकार कांग्रेस की ही बनेगी। यानी कांग्रेस खुद को सत्ता में आने वाली पार्टी के रूप में देखती है। ऐसे में राहुल गांधी को पार्टी के भीतर यह विश्वास पैदा करने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ी कि उसका काम केवल सत्ता में आना नहीं, बल्कि जनता के मुद्दों के लिए संघर्ष करना भी है। प्रोफेसर अपूर्वानंद कहते हैं कि जब कन्हैया कांग्रेस में शामिल हुए, तो उनके बोलने का अंदाज और स्वभाव बदल गया। वह कन्हैया पर कोई आरोप नहीं लगा रहे हैं, बल्कि एक राजनीतिक बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं।

सवाल यह है कि क्या कन्हैया ने किसी तरह का समझौता किया है? क्या उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों से समझौता किया है? क्या उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों से समझौता किया है? यही सवाल महत्वपूर्ण हैं। कुछ लोग कह सकते हैं कि कन्हैया अब धार्मिक दिखाई देने लगे हैं। लेकिन धार्मिक दिखने की बात करें, तो राहुल गांधी भी खुद को शिवभक्त बताते हैं।

अपूर्वानंद के मुताबिक, सड़कों पर आंदोलन करने वाले नेता के रूप में कन्हैया की पहचान कमजोर हुई है, क्योंकि कांग्रेस में शामिल होने के बाद उन्हें दूसरी जिम्मेदारियां मिल गईं। कम्युनिस्ट पार्टियों की राजनीति का आधार आज भी वर्ग संघर्ष और वर्गीय राजनीति है। वर्गीय राजनीति का मतलब किसी खास वर्ग के मुद्दों को उठाना बनकर रह गया है। हालांकि, लोकतांत्रिक राजनीति में आगे बढ़ने के लिए व्यापक स्तर पर संवाद और समझौते की गुंजाइश बनानी पड़ती है।

अगर आपका राजनीतिक भाषण केवल एक खास वर्ग तक सीमित रहता है और उससे आगे नहीं बढ़ता, तो यह समस्या सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टियों तक सीमित नहीं है। सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाली पार्टियों के सामने भी ऐसी ही चुनौती है। इसका उदाहरण देते हुए अपूर्वानंद लालू यादव और मुलायम सिंह यादव का जिक्र करते हैं। उनके मुताबिक, मुलायम सिंह यादव का आत्मविश्वास बढ़ा, लेकिन आखिरकार वह भी डगमगा गए।

यही वजह है कि कम्युनिस्ट पार्टियों से उभरने वाले नेताओं को कई बार वहां सीमित महसूस होता है, क्योंकि उन्हें लगता है कि वहां व्यापक लोकतांत्रिक राजनीति के लिए पर्याप्त जगह नहीं है।

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