केरल: आखिरी किला भी ढह गया… 49 साल बाद किसी भी राज्य में वामपंथ नहीं, जहां से शुरुआत, अंत भी वहीं

केरल से ही शुरू हुआ था लोकतांत्रिक वाम के शासन का सफर, बाद में कई राज्यों तक पहुंचा

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तिरुवनंतपुरम। केरल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ दर्ज किया है। पिनराई विजयन के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) को हार का सामना करना पड़ा, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) ने 140 में से 90 से अधिक सीटें जीतकर एक दशक बाद सत्ता में वापसी की।

इस हार के साथ ही देश में पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार नहीं बची है। यह स्थिति करीब 49 साल बाद बनी है, जो भारतीय वाम राजनीति के लंबे सफर और उसके क्रमिक पतन को रेखांकित करती है।

वामपंथ की विचारधारा: शुरुआती अस्वीकार से मुख्यधारा तक

दरअसल, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने 1947 में मिली आजादी को अधूरी और समझौतों का परिणाम बताते हुए उसे ‘झूठी आजादी’ कहा था। पार्टी ने इसे पूरी तरह स्वीकार करने में पांच साल से अधिक का समय लिया। 1948 में बीटी रणदिवे के नेतृत्व में पार्टी ने आक्रामक और कट्टर रुख अपनाया। इस दौरान संविधान का विरोध किया गया और नेहरू सरकार को हिंसक तरीके से हटाने का आह्वान किया गया। 1948-49 की यह रणनीति असफल रही, जिसके बाद 1950 में नेतृत्व परिवर्तन हुआ और पार्टी ने अपनी लाइन बदली।

1957: केरल से शुरू हुआ लोकतांत्रिक वाम शासन

1956 में त्रावणकोर, कोचीन और मालाबार को मिलाकर केरलम राज्य का गठन हुआ। 1957 के पहले विधानसभा चुनाव में सीपीआई ने 60 सीटें जीतकर सरकार बनाई। ईएमएस नंबूदरीपाद के नेतृत्व में बनी यह सरकार दुनिया की पहली लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई कम्युनिस्ट सरकार थी। सरकार ने भूमि सुधार और शिक्षा सुधार जैसे बड़े कदम उठाए। भूमि सुधार कानून ने बटाईदार किसानों को जमीन खरीदने का अधिकार दिया और जमीन की सीमा तय की गई। शिक्षा सुधारों के जरिए निजी संस्थानों पर नियंत्रण के लिए सख्त नियम बनाए गए। केरल के स्कूलों से गांधी की तस्वीर हटाकर माओ और स्टालिन की तस्वीर लगाई जाने लगीं। सरकार के फैसलों के खिलाफ व्यापक विरोध हुआ।  तब केरलम के गांधी कहे जाने वाले मन्नथ पिल्लई की अगुवाई में लाखों लोग सड़क पर उतर गए। हजारों लोगों को जेल में डाल दिया गया। हिंसा, लाठीचार्ज और एक गर्भवती महिला की मौत के बाद हालात बिगड़ते गए। 31 जुलाई 1959 को केंद्र सरकार ने केरल की कम्युनिस्ट सरकार को बर्खास्त कर दिया।

1962 का भारत-चीन युद्ध: विभाजन और वैचारिक संघर्ष

1962 के भारत-चीन युद्ध ने कम्युनिस्ट आंदोलन को अंदर से तोड़ दिया। एक धड़ा सरकार के साथ था, जबकि दूसरा चीन के खिलाफ रुख लेने को तैयार नहीं था। इस वैचारिक संघर्ष के परिणामस्वरूप 1964 में पार्टी दो हिस्सों सीपीआई और सीपीआई(एम) में बंट गई।

बंगाल: वामपंथ का स्वर्णकाल और पतन

पश्चिम बंगाल में 1967 में पहली बार वामपंथ सत्ता में आया। 1977 में भारी बहुमत के साथ सरकार बनी और इसके बाद 34 वर्षों तक लगातार वाम शासन रहा। ज्योति बसु इस दौर के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे। हालांकि, सिंगूर और नंदीग्राम जैसे भूमि विवादों के बाद 2011 में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने वामपंथ को सत्ता से बाहर कर दिया।

त्रिपुरा और केरल: अंतिम स्तंभों का गिरना

त्रिपुरा में 25 वर्षों तक सत्ता में रहने के बाद 2018 में वामपंथ को हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद केरल ही उसका अंतिम मजबूत गढ़ बचा था। 2026 में केरल में मिली हार ने इस आखिरी स्तंभ को भी गिरा दिया।

केंद्र की राजनीति में प्रभाव और दूरी

2004 के लोकसभा चुनावों में वामपंथी दलों ने 80 सीटें जीतकर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यूपीए-1 सरकार वाम दलों के समर्थन पर टिकी थी। मनरेगा और आरटीआई जैसे कानूनों को लागू कराने में उनकी अहम भूमिका रही।
हालांकि, 2008 में भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के विरोध में वाम दलों ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया। इसके बाद से वे केंद्र की सत्ता से दूर होते गए।

प्रधानमंत्री पद के मौके ठुकराने की कहानी

1990 के दशक में ज्योति बसु को तीन बार प्रधानमंत्री बनने का प्रस्ताव मिला, लेकिन हर बार पार्टी के निर्णय के कारण उन्होंने इनकार कर दिया। 1996 में यूनाइटेड फ्रंट सरकार के समय भी यह मौका आया, जिसे बाद में खुद बसु ने ऐतिहासिक भूल बताया।

एक दौर का अंत, नई राजनीति की शुरुआत

केरल में 2026 की हार सिर्फ एक चुनावी पराजय नहीं, बल्कि भारतीय वामपंथ के एक लंबे राजनीतिक अध्याय का समापन है। 1957 में जिस राज्य से लोकतांत्रिक वाम शासन की शुरुआत हुई थी, वहीं से उसका अंत होना प्रतीकात्मक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण है। अब सवाल यह है कि क्या वामपंथ नए सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों के साथ खुद को पुनर्गठित कर पाएगा, या भारतीय राजनीति में उसकी भूमिका और सीमित होती जाएगी।

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