पश्चिम बंगाल: एसआईआर के बाद ममता बनर्जी के लिए चुनौती बढ़ गई, जीत अब इतना आसान नहीं रह गया

50 से ज्यादा सीटों का बदला समीकरण, जीत के लिए भाजपा एड़ी-चोटी का जोर लगा रही

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कोलकाता। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव में अब केवल 10 दिन शेष रह गए हैं। इस बीच मुद्दे भी बदलते जा रहे हैं। अब यहां विकास से ज्यादा बड़ा मुद्दा एसआईआर(स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) बन गया है। एसआईआर का काम पूरा होने के बाद वोटर लिस्ट में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। फाइनल सूची में 90 लाख से ज्यादा लोगों के नाम कट गए हैं। मतदाता सूची में यह बदलाव कई सीटों पर हार-जीत का गणित बदल सकता है। इसका सबसे ज्यादा   असर तृणमूल कांग्रेस पार्टी पर दिखेगा। इस तरह नए चुनावी समीकरणों के बीच पश्चिम बंगाल का चुनाव पारंपरिक मुद्दों से हटकर एक नए विवाद स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के इर्द-गिर्द घूम रहा है। नई मतदाता सूची को लेकर उठे सवालों ने सियासी माहौल को और गर्म कर दिया है।

ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि राज्य के करीब 90.8 लाख यानी लगभग 11.9% मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं। उन्होंने इसे गंभीर मुद्दा बताते हुए अदालत में चुनौती देने की बात कही। उनके अनुसार, केवल भवानीपुर सीट से ही लगभग 51 हजार वोट कम हुए हैं। इस मुद्दे ने चुनावी बहस को नया मोड़ दे दिया है। जहां पहले भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था प्रमुख मुद्दा थे अब एसआईआर के मुद्दा ने जोर पकड़ लिया है। 

भाजपा ने एसआईआर प्रक्रिया को बताया सामान्य

इधर, ममता के आरोपों पर जवाब देते हुए भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने कहा कि मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया सामान्य है और इसमें किसी विशेष समुदाय को निशाना नहीं बनाया गया है। उन्होंने कहा कि मृत, स्थानांतरित या अनुपस्थित लोगों के नाम हटाना जरूरी होता है और इसमें मुसलमानों के साथ-साथ राजवंशी, मतुआ और अन्य समुदाय भी शामिल हैं।

एसआईआर से ममता के लिए कितना बदल जाएगा जीत का समीकरण

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एसआईआर का असर चुनावी नतीजों पर जरूर पड़ेगा। करीब 50 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस के लिए मुकाबला कठिन हो सकता है, लेकिन जीत असंभव नहीं है। दरअसल, राज्य की 49 सीटों पर 90% से अधिक हिंदू वोट हैं, जहां 2021 में तृणमूल ने 29 और भाजपा ने 20 सीटें जीती थीं। वहीं, 25% या उससे अधिक मुस्लिम वोट वाली 146 सीटों में तृणमूल ने 131 सीटों पर जीत हासिल की थी। उनका मानना है कि एसआईआर के बाद मुस्लिम वोट और अधिक मजबूती से ममता बनर्जी के पक्ष में एकजुट हो सकते हैं।

ग्रामीण इलाकों में ममता की पकड़ अभी भी मजबूत

ग्रामीण क्षेत्रों की बात करें तो तृणमूल की स्थिति यहां अभी भी मजबूत है। करीब 163 ग्रामीण सीटों में से 126 पर पार्टी को पिछली बार जीत मिली थी, जबकि भाजपा 36 सीटों तक सीमित रही थी। वहीं शहरी इलाकों में स्थिति अलग नजर आती है। शहरी क्षेत्रों में ममता सरकार के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी दिखाई दे रही है। हालांकि, ग्रामीण इलाकों में सरकार की योजनाओं का असर मजबूत बना हुआ है। 

टीएमसी का आरोप- भाजपा के प्रभाव में काम कर रहा निर्वाचन आयोग

तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रिजू दत्ता ने एसआईआर को चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बताते हुए निर्वाचन आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाया। उनका कहना है कि आयोग निष्पक्ष नहीं रहा और भाजपा के प्रभाव में काम कर रहा है। 

प्रधानमंत्री सीधे ममता बनर्जी पर कर रहे पलटवार

इधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब सीधे ममता बनर्जी सरकार पर हमला कर रहे हैं। उन्होंने पश्चिम बंगाल में चुनावी रैली के दौरान तृणमूल कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि राज्य अब परिवर्तन के लिए तैयार है और भाजपा इसे विकास की नई ऊंचाइयों पर ले जाने का संकल्प रखती है। उन्होंने तृणमूल सरकार के 15 साल के कार्यकाल पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस दौरान राज्य में भय और अव्यवस्था का माहौल बना रहा। उन्होंने भरोसा दिलाया कि भाजपा की सरकार बनने पर पारदर्शी और भयमुक्त प्रशासन स्थापित किया जाएगा। प्रधानमंत्री ने किसानों, उद्योग और रोजगार के मुद्दों पर भी जोर दिया। उन्होंने वादा किया कि किसानों को केंद्र की योजना के अलावा राज्य की ओर से अतिरिक्त आर्थिक सहायता दी जाएगी। जूट उद्योग को पुनर्जीवित करने और कृषि क्षेत्र को मजबूत बनाने की भी बात कही गई।

यानी अब कई सीटों पर मुकाबला दिलचस्प होगा

पश्चिम बंगाल का यह चुनाव अब सिर्फ राजनीतिक दलों के बीच मुकाबला नहीं रह गया है, बल्कि मतदाता सूची, पहचान और प्रतिनिधित्व जैसे संवेदनशील मुद्दों का केंद्र बन गया है। एसआईआर ने चुनावी गणित को बदलने की क्षमता दिखाई है, जिससे कई सीटों पर मुकाबला और दिलचस्प हो गया है। अब देखना होगा कि यह विवाद चुनावी नतीजों को किस हद तक प्रभावित करता है।

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