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मेघराज ने खोली सूरत पालिका और प्रशासन की पोल, बारिश ने दिखा दी हकीकत
डायमंड सिटी, टेक्सटाइल हब और गुजरात की आर्थिक राजधानी के रूप में पहचाना जाने वाला सूरत शहर एक बार फिर मेघराज के प्रकोप के सामने असहाय खड़ा है। जुलाई 2026 के पहले सप्ताह में हुई मूसलाधार बारिश से कुछ इलाकों में 18 इंच तक वर्षा हुई, जिसने पूरे शहर को पानी में डुबो दिया। रिंग रोड, कतारगाम, रांदेर, अडाजन, कापोद्रा और सेंट्रल ज़ोन सहित कई क्षेत्रों में तीन से चार फुट तक पानी भर गया। मुख्य खाड़ियां ओवरफ्लो हो गईं। हजारों लोगों को विस्थापित होना पड़ा, मौतें दर्ज हुईं और व्यापार-उद्योग को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। यह आपदा प्राकृतिक है, लेकिन इसका प्रभाव और व्यापकता मानव निर्मित है। मेघराज ने सूरत की जनता का ध्यान रखते हुए पालिका और प्रशासन की पोल खोल दी है।

वर्षों से सूरत महानगरपालिका हर साल प्री-मानसून कार्यों की घोषणा करती है। ड्रेनेज लाइनों की सफाई, पंप लगाने, अंडरपास की सफाई और खाड़ियों की सफाई यह सब अधिकांशतः कागज़ों पर ही हुआ होगा, इसका अंदाज़ा वर्तमान स्थिति देखकर लगाया जा सकता है। वास्तविकता अलग है। केवल 15 मिनट की बारिश में ही सड़कें स्विमिंग पूल बन जाती हैं। इस बार अनगिनत स्थानों पर जलभराव हुआ। कई हेवी-ड्यूटी पंप चलाने के बावजूद पानी नहीं निकल सका। ड्रेनेज लाइनों में कीचड़, प्लास्टिक और कचरे का इतना जमाव था कि पानी की निकासी असंभव हो गई। यह कैसी तैयारी है? क्या पालिका केवल फाइलें भरकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेती है?

सूरत का भूगोल सर्वविदित है। ताप्ती नदी, खाड़ियाँ और निचले क्षेत्रों के कारण यह शहर बाढ़-प्रवण है। 2006 की भीषण बाढ़ के बाद हजारों करोड़ रुपये के कार्य किए गए। ड्रेनेज प्रणाली का विस्तार किया गया, पंपिंग स्टेशन बनाए गए, खाड़ियों पर काम हुआ, लेकिन ये कार्य कितने प्रभावी हैं? हर साल उन्हीं स्थानों पर पानी भर जाता है। अंडरपास पानी में डूब जाते हैं। झुग्गी-बस्तियों से लेकर पॉश सोसायटियों तक सभी को समान परेशानी झेलनी पड़ती है। यह दर्शाता है कि योजना में मूलभूत खामियां हैं। विकास के नाम पर सड़कें चौड़ी की जाती हैं, इमारतें ऊँची होती हैं, लेकिन पानी की निकासी की व्यवस्था की अनदेखी की जाती है। कंक्रीट के जंगल तो बढ़ गए, लेकिन प्राकृतिक जलप्रवाह अवरुद्ध हो गया।
प्रशासन की लापरवाही और भी चौंकाने वाली है। भारी बारिश की चेतावनी होने के बावजूद स्कूल बंद करने का निर्णय देर से लिया जाता है। बस स्टेशनों और पानी में फँसे लोगों के बचाव कार्य में भी देरी देखने को मिली। उद्योगों, विशेषकर टेक्सटाइल सेक्टर को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ। छोटे व्यापारियों की दुकानें पानी में डूब गईं। आम नागरिकों के घरों में पानी घुस गया, बिजली काटनी पड़ी और पीने का पानी दूषित हो गया। यह सब देखकर सवाल उठता है कि पालिका और जिला प्रशासन की जिम्मेदारी कहाँ है? यदि पार्षदों और अधिकारियों के आवासीय क्षेत्रों में भी पानी भर गया हो, तो आम नागरिकों की क्या हालत हुई होगी?

सबसे बड़ी आलोचना पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी को लेकर है। बाढ़ के बाद सहायता की घोषणा होती है, मंत्री दौरा करते हैं, तस्वीरें खिंचवाई जाती हैं, लेकिन मूल समस्या का समाधान कहाँ है? वर्षों बीत जाते हैं, फिर भी वही गलतियाँ दोहराई जाती हैं। भ्रष्टाचार और कामचलाऊ व्यवस्था के आरोप बार-बार लगते हैं। यदि प्री-मानसून कार्य वास्तव में गुणवत्तापूर्ण हुए होते, तो शहर इतनी जल्दी पानी में क्यों डूब जाता? क्या केवल बजट खर्च करना ही उद्देश्य है या वास्तव में काम करना भी?
सूरत के लोग सहनशील हैं। आपदा के समय वे एक-दूसरे की मदद करते हैं। लेकिन उनकी सहनशीलता का लाभ उठाकर प्रशासन निष्क्रिय बना रहे और भ्रष्टाचार करता रहे, यह उचित नहीं कहा जा सकता। एक आधुनिक शहर में आधुनिक ड्रेनेज प्रणाली होनी चाहिए। स्मार्ट सिटी के नाम पर कैमरे और ऐप तो लगाए जाते हैं, लेकिन मूलभूत अवसंरचना कमजोर क्यों रहती है? खाड़ियों की नियमित सफाई, वैज्ञानिक ड्रेनेज मैपिंग, निर्मित क्षेत्रों में पानी के प्रवाह के लिए पर्याप्त स्थान और कड़ी निगरानी आवश्यक है। यदि कहीं कमी रह जाती है, तो उसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों और निर्वाचित प्रतिनिधियों पर कार्रवाई होनी चाहिए या नहीं?

मेघराज प्रकृति के संदेशवाहक हैं। उन्होंने सूरत की जनता को याद दिलाया है कि यदि विकास के नाम पर बुनियादी सुविधाओं की अनदेखी की जाएगी, तो आपदा अवश्य आएगी। पालिका और प्रशासन को अब कागज़ी कार्यों को छोड़कर वास्तविक जनहितकारी दृष्टिकोण के साथ योजना बनानी चाहिए, अन्यथा हर वर्ष मेघराज आएँगे और उनकी पोल खोलते रहेंगे। यह आलोचना केवल आरोप नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। यदि इस बार भी सबक नहीं लिया गया, तो अगले वर्ष इसकी और भी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।

