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सांसदों पर सरकारी खर्च में 66 प्रतिशत की वृद्धि हुई! आपका वेतन कितने प्रतिशत बढ़ा?
महंगाई की मार झेल रहे लाखों भारतीय हर महीने अपने वेतन का इंतज़ार करते हैं और फिर उसी वेतन से अपने घर का बजट, बच्चों की शिक्षा, ईएमआई, बिजली का बिल और अन्य बढ़ते दैनिक खर्चों का प्रबंधन करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि संसद में अपने प्रतिनिधि के रूप में जिन सांसदों को आप चुनकर भेजते हैं, उन पर हर साल कितने पैसे खर्च किए जाते हैं? हाल ही में आरटीआई के माध्यम से सार्वजनिक किए गए आंकड़े चौंकाने वाले हैं।
एक अंग्रेज़ी अख़बार में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, इस आरटीआई में सांसदों के वेतन, भत्तों, मुफ्त सुविधाओं और सरकारी खर्च का विवरण सार्वजनिक किया गया है, जिससे यह सवाल उठ सकता है कि करदाताओं का कितना पैसा इन जनप्रतिनिधियों की सुविधाओं पर खर्च किया जा रहा है। आइए जानते हैं कि यह आरटीआई क्या दिखाती है और सांसदों को दी जाने वाली सुविधाएँ कितनी व्यापक हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर सरकारी खजाने से निकले इन करोड़ों रुपये किस उद्देश्य से खर्च किए जाते हैं? क्या केवल सांसदों के वेतन में वृद्धि के कारण यह आंकड़ा इतना बड़ा हो गया? जवाब है-नहीं। वास्तविकता इससे कुछ अलग है। राज्यसभा सांसदों पर होने वाला खर्च केवल वेतन तक सीमित नहीं है। कुल खर्च में 21 अलग-अलग मदें शामिल हैं, जिनमें वेतन, भत्ते, घरेलू और विदेशी यात्रा, चिकित्सा प्रतिपूर्ति, कार्यालय संचालन और कई अन्य सुविधाएँ शामिल हैं। यही कारण है कि कुल खर्च में तेज़ी से वृद्धि होती जा रही है।
मीडिया सूत्रों के अनुसार, आरटीआई के आंकड़ों के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2024-25 में केवल मूल वेतन पर 25.71 करोड़ रुपये खर्च किए गए। चिकित्सा प्रतिपूर्ति का बिल 8.2 करोड़ रुपये था, जबकि सांसदों की यात्रा पर 24.99 करोड़ रुपये खर्च किए गए। केवल भत्तों पर 33.33 करोड़ रुपये खर्च हुए। इसके बाद 2025-26 में लगभग हर प्रमुख मद में खर्च बढ़ गया। मूल वेतन बढ़कर 44.6 करोड़ रुपये हो गया, चिकित्सा खर्च बढ़कर 9.6 करोड़ रुपये, यात्रा खर्च बढ़कर 36 करोड़ रुपये और विभिन्न भत्ते 58.78 करोड़ रुपये हो गए। इसका मतलब यह है कि सांसदों पर होने वाला खर्च केवल वेतन नहीं, बल्कि विभिन्न सरकारी लाभों का कुल योग है।
लोग अक्सर मानते हैं कि सांसदों को केवल मासिक वेतन मिलता है, लेकिन वास्तविकता बिल्कुल अलग है। वेतन पूरे पैकेज का केवल एक हिस्सा है। जनप्रतिनिधियों को कई प्रकार की सुविधाएँ मिलती हैं, जिनका खर्च सीधे सरकारी खजाने से उठाया जाता है। यही कारण है कि सांसदों पर कुल खर्च आम लोगों की कल्पना से कहीं अधिक दिखाई देता है।
इन सुविधाओं में सरकारी आवास, बिजली और पानी की सुविधा, टेलीफोन, घरेलू और हवाई यात्रा, कार्यालय संचालन के लिए अलग बजट, निर्वाचन क्षेत्र के कार्यों के लिए भत्ते, स्टेशनरी और अन्य प्रशासनिक खर्च शामिल हैं। इसके अलावा सांसदों और उनके मान्यता प्राप्त परिवार के सदस्यों को सरकारी नियमों के तहत चिकित्सा सुविधाएँ भी सार्वजनिक धन से उपलब्ध कराई जाती हैं। इन सभी खर्चों को मिलाकर सांसदों पर कुल सरकारी खर्च हर वर्ष कई सौ करोड़ रुपये तक पहुँच जाता है और यही कारण है कि आरटीआई में सार्वजनिक किया गया यह डेटा अब चर्चा का विषय बन गया है।
समान पैमाने पर तुलना किए जाने पर यह डेटा सबसे अधिक प्रभावशाली दिखाई देता है। इसलिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि 2021 और 2026 के बीच सांसदों पर औसत सरकारी खर्च कितना बढ़ा और इसी अवधि में सरकारी तथा निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की आय किस दर से बढ़ी। यह तुलना किसी एक वर्ग को सही या गलत साबित करने के लिए नहीं, बल्कि बदलाव की गति को समझने के लिए है।
यह इन्फोग्राफिक यही अंतर दिखाता है। एक ओर राज्यसभा के एक सांसद पर औसत वार्षिक सरकारी खर्च है, जबकि दूसरी ओर केंद्र सरकार के कर्मचारियों की औसत वेतन वृद्धि और मध्यम स्तर के निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की सामान्य वेतन वृद्धि दिखाई गई है। आंकड़े बताते हैं कि सांसदों पर औसत खर्च लगभग 65 से 70 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि केंद्र सरकार के कर्मचारियों की आय में मुख्य रूप से महंगाई भत्ते (डीए) और नियमित संशोधनों के कारण लगभग 15 से 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। दूसरी ओर निजी क्षेत्र में वेतन वृद्धि मुख्य रूप से कर्मचारियों के प्रदर्शन और कंपनी की वित्तीय स्थिति पर निर्भर रही, जहाँ औसत वार्षिक वृद्धि 8 से 12 प्रतिशत के बीच रही।
इस अंतर को सरल शब्दों में समझने के लिए नीचे दिए गए तालिका पर एक नज़र डालें। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि पिछले पाँच वर्षों में विभिन्न क्षेत्रों का आर्थिक विकास समान नहीं रहा है।
यदि आरटीआई में सार्वजनिक किए गए आंकड़ों को आम लोगों के जीवन के संदर्भ में देखा जाए, तो चर्चा के लिए एक बड़ा प्रश्न सामने आता है। सार्वजनिक धन की प्राथमिकताएँ क्या होनी चाहिए? जब राज्यसभा के एक सांसद पर औसत वार्षिक सरकारी खर्च 2 करोड़ रुपये से अधिक हो, तो लोगों के लिए इसकी तुलना शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सार्वजनिक सेवाओं पर होने वाले खर्च से करना स्वाभाविक है।
यही कारण है कि सांसदों के वेतन और सुविधाओं पर होने वाला खर्च अक्सर चर्चा का विषय बनता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक धन का प्रत्येक रुपया अंततः करदाताओं की जेब से आता है, इसलिए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि शिक्षा, सरकारी अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, ग्रामीण सड़कों और अन्य बुनियादी ढाँचे पर कितना निवेश किया जा रहा है और जनप्रतिनिधियों पर कितना खर्च हो रहा है। ऐसे प्रश्न लोकतंत्र में सरकारी खर्च की जवाबदेही और पारदर्शिता से सीधे जुड़े हुए हैं।
इसी कारण सांसदों के वेतन, भत्तों और सुविधाओं का डेटा सार्वजनिक होते ही चर्चा केवल राशि तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इस बात पर भी होती है कि सीमित सरकारी संसाधनों को किस प्रकार प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इस आरटीआई के बाद यह बहस और अधिक तेज़ हो गई है।
इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू केवल करोड़ों रुपये का खर्च नहीं, बल्कि उसकी पारदर्शिता और जवाबदेही है। आखिर लोगों के टैक्स के पैसे से होने वाले इस खर्च की निगरानी कैसे की जाती है? क्या सांसदों के वेतन, भत्तों, यात्रा, चिकित्सा प्रतिपूर्ति और अन्य लाभों का विवरण जनता के लिए उतनी आसानी से उपलब्ध है, जितना होना चाहिए? आरटीआई द्वारा सार्वजनिक किए गए आंकड़ों ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि सार्वजनिक धन के उपयोग के लिए जवाबदेही को और मज़बूत बनाए जाने की आवश्यकता है।
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों को सुविधाएँ उपलब्ध कराना व्यवस्था का एक हिस्सा है, लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इन सुविधाओं पर होने वाला पूरा खर्च पारदर्शी हो और समय-समय पर सार्वजनिक समीक्षा के लिए उपलब्ध कराया जाए। आखिरकार यह पैसा सरकारी खजाने का नहीं, बल्कि लाखों करदाताओं की मेहनत की कमाई का है। इसलिए सवाल केवल सांसदों के वेतन और भत्तों का नहीं, बल्कि उस भरोसे का भी है जिसके आधार पर जनता अपना पैसा सरकार को सौंपती है। शायद यही कारण है कि जब भी ऐसे आंकड़े सार्वजनिक होते हैं, तब चर्चा केवल खर्च तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सुशासन, पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही पर भी शुरू हो जाती है।

